Friday, December 29, 2023

बाजार से गुजरा हूं

बाजार से गुजरा हूं

समय के अटपटेपन और विडंबनाओं से सजा है बाजार

लेखक,चिंतक, सामाजिक, सांस्कृतिक और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता श्री सुरेश उपाध्याय की नई किताब 'बाजार से गुजरा हूं' भले ही व्यंग्य लेखों के संग्रह के रूप में आई है लेकिन एक तरह से इसे उनके  वैचारिक आलेखों की पिछली दो पुस्तकों 'हाशिये की आवाज' और 'अति सर्वत्र विराजिते' की वैचारिक श्रृंखला की व्यंग्य विनोद भाषा में लिखी  अगली कड़ी के रूप में भी देखा जा सकता है।


इस संग्रह में वर्तमान समय के विभिन्न प्रसंगों,आर्थिक, सामाजिक,राजनैतिक स्थितियों के पीछे के सवालों और विडंबनाओं पर सहज सरल विनोदपूर्ण भाषा में  लेखक अपनी पीड़ा भी व्यक्त करते हैं और अतीत की सुखद स्मृतियों को भी पाठक के समक्ष रखने की तुलनात्मक कोशिश करते हैं।

हिंदी व्यंग्य के प्रचलित लोकप्रिय मुहावरे में उनके ये लेख पाठक को आपबीती सी महसूस होते हैं और वह उनसे जुड़ता चला जाता है।

बाजार से गुजरा हूं संग्रह  इसलिए भी दृष्टव्य है कि ये आलेख समाज में उपस्थित और घटित विविध विषयों पर एक जागरूक नागरिक की टिप्पणी की तरह आते हैं। और जब ट्रेड यूनियन, साहित्य-कला और सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र से लम्बे समय से गहराई से संलग्न सुरेश उपाध्याय जैसा विचारवान कार्यकर्ता अपना नजरिया प्रस्तुत करता है या वक्रोक्ति करता है तो उसके निश्चित ही कुछ मायने होते हैं,उसके पीछे क्षोभ और पीड़ा की छटपटाहट भी महसूस की जा सकती है।


संग्रह में लेखक के नए,पुराने,छोटे,बड़े,कुल छत्तीस व्यंग्य लेख संकलित हैं। किताब में विषयों का एक ऐसा विविधतापूर्ण बाजार सजा है जहां समय और समाज के हर क्षेत्र के अटपटेपन और विसंगतियों पर टॉर्च की खोजी और व्यंग्यात्मक रोशनी डालने की कोशिश लेखक ने की है।


संग्रह की अधिकांश रचनाएं पत्र पत्रिकाओं के हास्य,व्यंग्य,वक्रोक्ति जैसे विविध स्तंभों में प्रकाशित हुई हैं। इन रचनाओं में समुचित चुटकियां हैं, वक्रोक्तियां हैं,खरी खरी है,देशज जुमलों,बोलचाल के शब्दों और लोकोक्तियों के संदर्भ हैं। भाषा पाठक को रुचिकर और सहज लगती है परंतु विषयवस्तु के भीतर उतरते ही पाठक के मन को उद्वेलित करती है,विचार करने को विवश भी करने लगती है। यही इन व्यंग्य रचनाओं की खूबी और पहचान है। इसे लेखक की रचनात्मक सफलता भी कहा जा सकता है। लेखक श्री सुरेश उपाध्याय को बहुत बधाई और शुभकामनाएं।





(व्यंग्य संग्रह : बाजार से गुजरा हूं ,लेखक : सुरेश उपाध्याय, प्रकाशक : ऋषि मुनि प्रकाशन, उज्जैन, मूल्य : ₹ 250 हार्ड बाउंड )


समीक्षक -

ब्रजेश कानूनगो

पिता के साये में जीवन

पिता के साये में जीवन : संवेदनाओं से भरी कविताएं

सोशल मीडिया पर यों तो अनेक साहित्य समूह सक्रिय हैं जहां नियमित रचनात्मक चर्चाएं,कार्यशालाएं और विमर्श और नई पुरानी रचनाओं का प्रसारण और टिप्पणियां होती रहती हैं लेकिन जिन चंद समूहों में बहुत अनुशासित और नवोन्मेष तरीकों से यह सब होता है उनमें 'साहित्य की बात ' याने ' साकीबा ' को बहुत मान्यता मिली है।

इस समूह के भौतिक रूप से भी वार्षिक कार्यक्रम होते हैं,मिलन समारोह में सम्मान,पुरस्कार,रचनापाठ के अलावा पुस्तकों का विमोचन आदि भी होता है। विदिशा के सक्रिय समकालीन कवि श्री ब्रज श्रीवास्तव की अगुवाई वाले इस समूह में अनेक ख्यात, वरिष्ठ और युवा रचनाकार साथी जुड़े हुए हैं। समूह समय समय पर कई पुस्तकों के प्रकाशन का माध्यम बना है। पिछले वर्ष में मां पर लिखी कविताओं का एक संग्रह आया था, 'धरती होती है मां'। साहित्य जगत में इसका भरपूर स्वागत हुआ है। और अब हमारे हाथ में आया है पिता पर लिखी कविताओं का एक और महत्वपूर्ण संग्रह 'पिता के साये में जीवन'।

बोधि प्रकाशन जयपुर से आए इस संग्रह का संपादन कवि श्री ब्रज श्रीवास्तव ने किया है। संपादन सहयोगी हैं कवयित्री सुश्री खुदेजा खान और मधु सक्सेना जी।


संग्रह में कुल सत्तावन कवियों की कविताओं को पांच खंडों में प्रस्तुत किया गया है। संपादन की यह रचनात्मक और नवोन्मेषी पहल है कि इन पांच खंडों को महत्वपूर्ण कवियों की किताबों के शीर्षकों ,काल तुझे होड़ है मेरी, उदाहरण के लिए, कविता की पुकार, जमीन पाक रही है, नए इलाके में से सजाया गया है। यह न सिर्फ अपने वरिष्ठों को मान और आदर देने का यह वंदनीय और अनुकरणीय प्रयास है बल्कि इससे खंड में शामिल कविताओं के रचनाकारों का भी एक संदर्भ बनता है।

 

जहां इस किताब के विभिन्न खंडों के शीर्षकों के जरिए सर्वश्री नरेंद्र जैन,शमशेर बहादुर सिंह,अरुण कमल,शलभ श्रीराम सिंह,और केदारनाथ सिंह की उपस्थिति है वहीं शामिल कविताओं से सर्वश्री अज्ञेय,निराला, भवानी प्रसाद मिश्र, विष्णु खरे,मंगलेश डबराल,कुमार अंबुज जैसे महत्वपूर्ण समकालीन कवि पुस्तक की आभा में वृद्धि कर रहे हैं।

संग्रह के सभी कवियों की कविताओं में पिता,पितृत्व और उससे जुड़ी संवेदनाएं अभिव्यक्त हुई है जो पाठकों के भीतर इस कठिन समय में अपने पिताओं को कई अलग अलग कोणों से जानने,समझने,महसूस करने को जागृत कर देती हैं।

मां पर केंद्रित किताब के बाद पिता पर केंद्रित यह किताब एक पूर्णता देती है। सुकून देती है।

साहित्य की बात समूह की प्रकाशन श्रृंखला में श्री नरेश अग्रवाल जी ने अपनी माताजी श्रीमती गायत्री देवी के सहयोग से इस पुनीत कार्य को साकार किया है। उनका अभिनंदन है। इस किताब के सुंदर आवरण के लिए प्रस्तर कला की जानी मानी कलाकार और कवयित्री सुश्री अनीता दुबे जी को साधुवाद।




(पुस्तक: पिता के साये में जीवन, संपादन : ब्रज श्रीवास्तव, उप संपादक: खुदेजा ख़ान, सह संपादक: मधु सक्सेना, प्रकाशक : बोधि प्रकाशन,जयपुर, कीमत: ₹ 225/ )


समीक्षक : ब्रजेश कानूनगो

Wednesday, August 23, 2023

जवाहर चौधरी के चर्चित व्यंग्य : फूलों पर नहीं कीचड़ पर लिखी रचनाएं !

जवाहर चौधरी के चर्चित व्यंग्य : फूलों पर नहीं कीचड़ पर लिखी रचनाएं !

'आप फूलों पर लिखा करो यार। आते ही उन्होंने आदेश सा दिया।

फूलों पर ही क्यों?

क्योंकि फूल भी है संसार में। खिल रहे हैं चारों तरफ। सरकार पर ही भिड़े रहोगे तो फूलों पर कौन लिखेगा?  कवियाें और लेखकों को प्रकृति प्रेमी होना चाहिए। लगा कुछ नाराज हैं।

ऐसा ही है भाईजी, लेखक वो लिखता है जो प्राथमिक रूप से जरूरी समझता है।

अपने को सुधारो जरा। नजरों में खोट हो तो आदमी बुरा बुरा ही देखता है। अच्छी नजरें वह होती हैं जो कीचड़ में भी कमल को ही देखते हैं।'


उपर्युक्त व्यंग्यांश वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री जवाहर चौधरी जी के नए व्यंग्य संग्रह 'चर्चित व्यंग्य रचनाएं' की एक रचना से उद्धरित किया है। जवाहर चौधरी जी के इस नवीनतम संग्रह में पिछले कुछ समय में लिखी गईं वे रचनाएं हैं जो बहुत चर्चित रचनाएं तो हैं लेकिन उन विषयों पर खुले तौर पर पाठक बात करने में कतरा सकता है। लेखक को सलाह भी दे सकता है कोई शुभचिंतक कि भाई क्यों खतरा मोल ले रहे इन विषयों पर लिखकर। क्यों आ बैल मुझे मार करके ट्रोलरों को न्योता दे रहे हो। लिखना ही है तो फूलों पर लिखो,और लोग भी यही कर रहे हैं।


बहरहाल, जवाहर चौधरी सच्चे और पक्के व्यंग्यकार हैं और उन्होंने समकाल की विडंबनाओं और पाखंड के तात्कालिक प्रसंगों,आचरणों और मूर्खताओं से भरे विषयों पर कलम चलाई है। कुछ रचनाएं पत्र,पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं तो कुछ उनके सोशल मीडिया के पाठकों तक पहुंच कर बहुत चर्चित हुई हैं। ये चर्चित रचनाएं हैं पर उनके पुराने समग्र व्यंग्यकर्म से चयनित होकर नहीं आई हैं। वे बिल्कुल ताजा और चर्चित रचनाएं ही हैं।


वर्तमान समय में किसी भी सत्ता शीर्ष पर बैठे व्यक्तियों और उनकी चालाक हरकतों या प्रवृत्तियों की विसंगति और अटपटेपन पर कटाक्ष अथवा व्यंग्य रचना बहुत कम लोगों के लेखन में अब शामिल है। यह साहस का काम है बल्कि कुछ संदर्भों में दुस्साहस भी कहा जा सकता है। इन रचनाओं में यह जोखिम उठाकर व्यंग्यकार ने व्यंग्य विधा का प्रतिबद्ध सिपाही होने का प्रमाण प्रस्तुत किया है। व्यंग्यकार और रचनाओं की यही ताकत भी है जो इन्हें चर्चित होने का विशेषण प्रदान करती हैं।


इसके साथ ही चौधरी जी समाज के अन्य क्षेत्रों की विसंगतियों और नागरिकों की अपनी मूर्खताओं और बेढंग आचरणों पर व्यंग्य करने में कभी भी चूकते नहीं हैं। चौधरी जी अपनी रचनाओं में समाज सरोवर में खिले हुए कमल पर आकर्षित या मुग्ध नहीं होते बल्कि तालाब की गंदगी और कीचड़ पर उनकी नजर जाती है।  वे उसे साफ करना चाहें भी तो कर नहीं सकते किंतु व्यंग्य की रचनात्मक टॉर्च से उस अंधेरे की ओर इशारा जरूर करते हैं।


जवाहर चौधरी कहानीकार और नाटककार भी हैं। उनकी व्यंग्य रचनाओं में इन विधाओं के तत्व बहुत शिद्दत से शामिल होते हैं। उनके अधिकतर व्यंग्य संवाद प्रधान होते हैं। भाषा में स्थानीयता, मिमिक्री और रोचकता की खासी गुंजाइश होती है। कुशल नाट्य वाचक उनकी रचनाओं को प्रभावी रूप से श्रोताओं के सम्मुख प्रस्तुत कर सकता है। इन सभी रचनाओं में यह खूबी रही है। संग्रह को पाठक इस बात को ध्यान में रखकर पढ़ता है तो चौधरी जी की अभिव्यक्ति का कायल हुए बगैर रह ही नहीं सकता।

मुझे विश्वास है, प्रबुद्ध पाठक इस नए व्यंग्य संग्रह को पढ़कर निसंदेह उद्वेलित होगा। बहुत बधाई और शुभकामनाएं रचनाकार श्री जवाहर चौधरी जी को।


( पुस्तक : चर्चित व्यंग्य रचनाएं, लेखक : जवाहर चौधरी, प्रकाशक : अद्विक पब्लिकेशन,दिल्ली, कीमत : 200 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो



गिद्धों का प्रजातंत्र : खरा खरा साहसी व्यंग्य

गिद्धों का प्रजातंत्र : खरा खरा साहसी व्यंग्य

व्यंग्य संग्रह ' गिद्धों का प्रजातंत्र ' वरिष्ठ व्यंग्यकार श्रीयुत श्रीकांत चौधरी जी का पहला किंतु अदभुत संग्रह है। उम्र के 76 वर्ष पूर्ण किए और पचास वर्षों से लगातार लिख रहे श्री चौधरी की प्रकाशित इस कृति की रचनाएं जल्दबाजी में पढ़ने लायक नहीं हैं। रोके रखती हैं। लंबे समय तक हमें भीतर तक झकझोडती रहती हैं। छोड़ती ही नहीं कि अगली की ओर बढ़ा जा सके। समय की विडंबनाओं और मूर्खताओं को समेटे हुए हमारी नागरिकता और विवेक पर सीधे प्रहार करती हैं। प्रबुद्ध पाठक भी हतप्रभ हो जाता है,गुस्से और असहायता से भरने लगता है। एक तरह से इन रचनाओं में वह लेखकीय साहस और बेबाकपन दिखाई देता है जो वर्तमान दौर में प्रायः खुलकर न कह पाने या बच बचाकर निकल जाने वाली विधा की सुरक्षित पगडंडी पर नहीं होता। चौधरी व्यंग्य के राजपथ पर इंकलाब का नारा बुलंद करते हुए बेखौफ गुजरते हैं। नागरिकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। झूठ और पाखंड  के मुखौटों को हटाते हैं और कोशिश करते हैं कि आंखें मूंदे या जमीन में मुंह गड़ाए लोग सच्चाई से रूबरू हों।

श्रीकांत जी का कहना है, 'संग्रह में आज से 40 साल पहले लिखी गई व्यंग्य रचनाएं भी शामिल हैं आज भी कम से कम डेढ़ सौ व्यंग्य रचनाएं, लघुकथाएं रखी हुई हैं जिन्हें  प्रकाशित नहीं करवाया। अब वक्त नहीं है ना इच्छा, लिखना छोड़ नहीं सकता। जो नैसर्गिक  लेखक होगा, संवेदनशील व्यक्ति होगा और बुद्धिजीवी भी, तो फिर वह राजनीति हो या धर्म या व्यक्तिगत या सामाजिक जहां कुछ गलत असंगत और अनुचित अन्यायपूर्ण लगेगा, वह अपनी सीधी सीधी या फिर व्यंग्य में प्रतिक्रिया जरूर करेगा, चुप नहीं बैठेगा।'

संग्रह की रचनाओं को पढ़ते हुए लेखक की यह चेतना महसूस की जा सकती है। भूतकाल और वर्तमान की राजनीतिक बेहूदगियों पर उन्होंने प्रहार किए हैं। कई बार व्यंजना के परदे को चीरते हुए उनकी रचनाएं सीधे सीधे लक्ष्य को भेदती हैं,चोट पहुंचाती हैं। मूक नागरिक और बेबस पाठक के भीतर की आवाज बन जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो वे शासन,सरकार के शीर्षजनों को खरी खरी सुनाती हैं। श्रीकांत चौधरी जी की व्यंग्य रचनाओं की यही खासियत है,वे गुदगुदाने की बजाए जरूरी आक्रोश को जन्म देने का प्रयास कर पाठक को उद्वेलित करती हैं।

गिद्धों का प्रजातंत्र संग्रह में चौधरी जी ने कई शैलियों में व्यंग्य लिखे हैं।निबंध,साक्षात्कार,फेंटेसी और लघु व्यंग्य कथाएं इसमें शामिल हैं। रचनाएं लंबी भी हैं और कुछ स्तंभ लेखन की शब्द सीमाओं के अधीन भी,लेकिन अपने विषय का समुचित निर्वाह करती हैं। विषय कोई भी रहा हो,लेखक एक जागरूक नागरिक की अपनी राजनीतिक,सामाजिक दृष्टि से तनिक भी विचलित नहीं हुए हैं।

यद्यपि वरिष्ठ व्यंग्यकार डा प्रेम जनमेजय ने पुस्तक की भूमिका में लेखक की रचनात्मकता और पुस्तक प्रकाशन के पीछे की उनकी व्यक्तिगत प्रवृत्ति के साथ विधागत विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डाला है, तथापि स्वयं लेखक ने 'था तो बहुत कहने को लेकिन...' शीर्षक से अपनी बात कही है। यह आलेख श्रीकांत चौधरी जी के सम्पूर्ण कृतित्व और व्यक्तित्व को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मेरा आग्रह रहेगा कि सबसे पहले इसे ही पढ़ा जाना चाहिए।

संग्रह के आलेखों से मैं प्रायः उदाहरणार्थ अंश उद्धृत नहीं करता, उनकी आत्मा तक पहुंचने की कोशिश रहती है। यही यहां भी किया है। पाठक इस संग्रह को पढ़ेंगे तो न सिर्फ समय की विडंबनाओं, मूर्खताओं,छद्मताओं,पाखंडों को उधड़ता पाएंगे बल्कि एक संवेदनशील लेखक के आक्रोश और ईमानदार साहसी लेखन को भी जान सकेंगे। श्री श्रीकांत चौधरी जी को बहुत बधाई।


(पुस्तक : गिद्धों का प्रजातंत्र, व्यंग्यकार : श्रीकांत चौधरी, प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स प्रा लि, नोएडा, कीमत : 275 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो






पोटली : संवेदनाओं का रेखांकन

पोटली : संवेदनाओं का रेखांकन 

सीमा व्यास एक ऐसी संवेदनशील कथाकार हैं जो रोजमर्रा के हर क्षण में किसी लघुकथा को सृजित करने की सामर्थ्य रखती हैं। 

'पोटली' सीमा जी का पहला लघुकथा संग्रह है जिसमें उन्होंने जीवन का सफर करते हुए ऐसे कुछ प्रसंगों, आचार - व्यवहार और संवादों को रेखांकित किया है जिनसे उनका भावुक मन संवेदित हुआ है। 

अपने भीतर उभरे क्षोभ और अनुभूतियों को वे कई बार हूबहू हमारे सामने रख देती हैं। किसी बड़ी कहानी के किसी बहुत मार्मिक या व्यंजनापूर्ण अंश को कुछ इस तरह अभिव्यक्त करती हैं कि पाठक उनकी अनुभूतियों को अपनी अनुभूति महसूस करने लगता है। 

कलागुरु विष्णु चिंचालकर जी के बारे में कहा जाता है कि वे दीवारों पर निकले पोपड़ों या बिखरी चीजों के आसपास कुछ ऐसी रेखाएं खींच देते थे कि वे घेरे किसी कलाकृति का रूप धर लेती थीं। सीमा व्यास जीवन के प्रसंगों को अपनी संवेदनाओं और शब्दों से ऐसे ही चिन्हित कर खूबसूरत और सार्थक लघुकथाओं में बदल देती हैं। लघुकथाओं की यही विशिष्ठता उन्हे अन्यों से अलग पहचान देती हैं।

उनकी लघुकथाओं का पाठ हमारे भीतर किसी कहानी के विस्तार की तरह खुलने लगता है। यह अनुभव पाठक को 'पोटली' खोलने के बाद ही मिल सकता है।

इस संग्रह की एक विशेषता यह भी है कि वनिका प्रकाशन,बिजनौर से प्रकाशित इस पुस्तक का अर्थपूर्ण आवरण प्रसिद्ध चित्रकार और कार्टूनिस्ट श्री इस्माइल लहरी जी ने तैयार किया है। वरिष्ठ साहित्यकार पद्मासिंह लिखित भूमिका लेखक के सृजन को रेखांकित करने और पाठक को लघुकथाओं के मर्म तक पहुंचने में मदद करती है।

संग्रह की सुंदर लघुकथाओं के लिए सीमा व्यास जी को बधाई और शुभकामनाएं। 


(पुस्तक : पोटली, लेखिका : सीमा व्यास, प्रकाशक : वानिका प्रकाशन, बिजनौर, कीमत : 180 रुपए) 


ब्रजेश कानूनगो



Monday, June 12, 2023

पुस्तक चर्चा : लोकतंत्र का स्वाद

पुस्तक चर्चा :

लोकतंत्र का स्वाद

पिछले दिनों ऐसा योग बैठा कि छत्तीसगढ़ के व्यंग्यकारों की पुस्तकों से गुजरता रहा। सर्वश्री विनोद साव, राजशेखर चौबे और वीरेंद्र सरल की रचनाएं पढ़ने के बाद अब छत्तीसगढ़ की पहली महिला व्यंग्यकार स्नेहलता पाठक जी के व्यंग्य संग्रह 'लोकतंत्र का स्वाद' का आनंद उठाया है।

इससे पूर्व उनका पहला उपन्यास 'लाल रिबन वाली लड़की' गत वर्ष पढ़ा था। उस बढ़िया उपन्यास पर अपनी पाठकीय टिप्पणी लिख भी चुका हूं। आज उनके नवीनतम व्यंग्य संग्रह के प्रभाव में हूं।

स्नेहलता पाठक जी काफी पुरानी और वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं। उनकी व्यंग्य रचनाओं को धर्मयुग जैसे प्रतिष्ठित और हिंदी की धरोहर पत्रिका के समय से पढ़ते रहे हैं।  संदर्भित संकलन को पढ़ते हुए सबसे पहले मुझे यही महसूस हुआ कि उनकी भाषा इतनी प्रवाहमय और आम है कि पाठक उसमे बहता चला जाता है। विसंगतियों और अटपटेपन के विषयगत रोड़े भी स्निग्धता में लुढ़कते रहते हैं। उनके कटाक्ष भी कई बार विनोद की चाशनी से सरोबार रहते हैं। व्यंग्य होते हुए भी वह चुभता नहीं लेकिन काम कर जाता है। शायद स्नेहलता जी की इसी भाषा को रेशमी दुशाला कहते होंगे, जिसके भीतर व्यंग्य की चर्म पादुका छुपी होती है।

दूसरी खास बात मुझे लगी वह यह कि स्नेहलता जी की रचनाओं में राजनीति और राजनीतिक विषयों पर व्यंग्य तो होता है लेकिन उन्हें राजनीतिक व्यंग्य की श्रेणी में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। वे राजनीतिक व्यंग्यकार नहीं हैं, वे एक सामाजिक व्यंग्यकार के रूप में नजर आती हैं जो प्रत्येक क्षेत्र की विसंगतियों को चाहे वह आर्थिक हो, टेक्नोलॉजिकल हो, राजनीतिक हो या दैनंदिनी की कोई साधारण पारिवारिक प्रसंग से निकलकर आई हो, स्नेहलता जी उसे अपनी आम सामाजिक,पारिवारिक दृष्टि से परखती हैं और लोकप्रिय शब्दावली में बहुत स्वीकार्य भाषा में आम पाठकों को परोसने में सफल हो जाती हैं। वे बहुत पठनीय होती हैं,बांधे रखती हैं, उनका पाठक वर्ग इसीलिए काफी बढ़ जाता है, और लोकतंत्र का जायका उनकी रचनाओं में रिसने लगता है। पहली ही रचना मेरा देश बदल रहा है या शीर्षक रचना लोकतंत्र का स्वाद जैसी कई अन्य रचनाओं को पढ़कर इस बात की पुष्टि की जा सकती है,जब हम आनंद से भी भर जाते हैं।

फेसबुक प्रेम का तहलका,त्रासदी व्यंग्य लेखिका के पति की,सफेद बालों का सुख ,व्यंग्यकार के घर में लक्ष्मी जैसी कई रचनाएं स्नेहलता जी ने परिवार या अपने आसपास के जीवन से विषय चुनकर बड़े मजे लेकर लिखीं हैं। पाठक को खूब गुदगुदाती हैं और आपबीती सी लगने लगती हैं। ऐसी और भी कई विनोदपूर्ण रचनाएं संकलन में शामिल हैं।

यद्यपि भूमिका में डॉ संजीव कुमार ने बहुत विस्तार से व्यंग्य लेखन पर बात करते हुए स्नेहलता जी की रचनाओं पर बहुत सटीक और विश्लेषणात्मक टिप्पणी की है। इससे बेहतर और कुछ कोई क्या कहेगा तथापि रचनाओं को पढ़कर मेरे भीतर जो ऊपर कही गई खूबियां का अहसास मुझे हुआ उसे स्नेहलता जी की इस पुस्तक का डीएनए भी कहा जा सकता है।

पाठकों को लोकतंत्र का असली स्वाद लेने के लिए इस किताब को अवश्य खरीद लेना चाहिए।वे निराश नहीं होंगे। आदरणीय स्नेहलता पाठक जी को इस संग्रह के लिए बहुत बधाई और शुभकामनाएं।

(व्यंग्य संग्रह : लोकतंत्र का स्वाद, लेखिका : स्नेहलता पाठक, प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स प्रा. लि.,मूल्य : 350 रुपए )

ब्रजेश कानूनगो



Thursday, June 8, 2023

पुस्तक चर्चा : भांति भांति के चमचे ब्रजेश कानूनगो

पुस्तक चर्चा :

भांति भांति के चमचे

ब्रजेश कानूनगो


'भांति भांति के चमचे' व्यंग्यकारों की खास पहचान वाले शहर लखनऊ की सक्रिय व्यंग्यकार वीना सिंह की पहल और उन्ही के संपादन में गुजरात के बहुभाषी ई प्रकाशन संस्थान शोपिजेन से हाल ही में हार्डकॉपी संस्करण में आया व्यंग्य संग्रह है।


इस व्यंग्य संग्रह की खासियत यह है कि कुल तीस रचनाओं में आधे से अधिक याने पंद्रह सोलह शीर्षक के इर्दगिर्द याने चमचे विषय पर केंद्रित हैं। संग्रह में जहां शरद जोशी, सूर्यबाला, सुभाष चंदर, जवाहर चौधरी जैसे जाने माने व्यंग्यकारों के व्यंग्य शामिल हैं वहीं आज भी लगातार लिख रहे मध्य आयु के बेहतरीन लेखकों की रचनाओं के अलावा अलंकार रस्तोगी, मुकेश राठौर और देवेंद्रसिंह  सिसौदिया जैसे युवा व्यंग्यकारों की सहभागिता भी हुई है।


इसमें कोई शक नहीं है कि सारी रचनाएं बहुत अच्छी हैं लेकिन यह स्वीकारने में मुझे कोई संकोच नहीं हो रहा कि रचनाकारों के श्रेष्ठतम में से निकलकर ये इस संग्रह में नहीं आई हैं। दरअसल ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि रचनाओं के चयन का आधार विषय केंद्रित रहा। जिसके पास चमचा विषय पर जो उपलब्ध रहा हो या मांग पर लिखा गया हो उसे संकलन में सीधे शामिल करने से व्यंग्य का व्यापक कैनवास थोड़ा सीमित हो गया है। मुझे व्यक्तिगत रूप से ऐसा महसूस हुआ है।


एक ही विषय याने चमचे जैसे लोकप्रिय और बहुलिखित विषय पर व्यंग्यकार के विशिष्ठ निर्वाह और शैली की भिन्नता के अलावा कोई कितना भिन्न हो सकेगा। फिर भी संपादक ने चयन में एकरूपता या अधिक दोहराव को थोड़ा कम अवश्य किया है और शीर्षक विषय से हटकर भी आधी रचनाओं को शामिल कर बोझिलता और एकरसता को कम करने का प्रयास किया है।


यद्यपि संकलित व्यंग्य रचनाओं का मजा तो सारे व्यंग्य पढ़कर ही लिया जा सकता है लेकिन कुछ पंक्तियां यहां देने की कोशिश कर रहा हूं। इससे निश्चित ही रूचिवान पाठक इस किताब को मंगवाकर पढ़ना चाहेंगे और वे निराश भी नहीं होंगे।


निर्मल गुप्त : चाटुकारिता के लिए बहुप्रचारित रूपक चमचा है... यदि इनको शाब्दिक परिभाषा के दृष्टिकोण से व्याख्यायित किया जाए तो स्पष्ट होगा कि वह शब्द बाण से मानव मस्तिष्क को शब्द की गहराई नापने और शब्द भावों से हृदय को स्पर्श की मारक क्षमता की अनुभूति कराता है। व्यंग्य लेखन में वाक्य विन्यास कौशल प्रमुख होता है। (पुस्तक की भूमिका)


शरद जोशी : कल तक जो मंत्री और मुख्यमंत्री थे एकाएक पटरी पर आ जाते हैं। कल तक जो बंगलों में विराजते थे उन्हें आज ढूंढे से रहने के लिए मकान नहीं मिलता।  कल तक जिनके आंगन में कार रहती थी, आज गैया भी मुंह नहीं मारती...साया साथ नहीं देता, चमचे चले जाते हैं।  (चमचागिरी का यह मुबारक दौर)


सुभाष चंदर:  चेले ने मामले की गांठ खोली। पुरस्कार की रेवड़ी बांटी,जरूर चेले की ओर  जाएगी। और इसके लिए समिति बनेगी जिसमें गुरु चेले के सभी संगी साथी निर्णायक बनेंगे।पुरस्कार का नाम होगा, गुरु घंटाल गौरव पुरस्कार। (गुरुजी चेला और मेंढक)


सूर्यबाला : ऊंटों  के बारे में दो बातें मशहूर हैं, एक तो यह जब तक पहाड़ नहीं चढ़े होते, बहुत बलबलाते हैं और दूसरे जब पहाड़ चढ़ चुके होते हैं तो किस करवट बैठेंगे पता करना बहुत मुश्किल होता है। वैसे ऊंटों की यह पॉलिसी सरकारी, गैर सरकारी, साहित्य, गैर साहित्यक क्षेत्र में बहुत पॉपुलर हो रही है। (चोटी पर न पहुंचे लोग)


पूरन शर्मा : जो लोग चमचे नहीं पालते वे जीवन में दुख पालते हैं। जिन्होंने चमचों की अनदेखी की है वह परेशान हुआ है। (इति चमचा पुराण)


सुभाष काबरा : यह हमारे दौर का दुर्भाग्य ही तो है कि यहां जिसने चार पंक्तियां लिख लें,वह लेखक हो गया,जिसने आठ पंक्तियां पढ़ लीं वह पाठक हो गया और जिसने न कुछ लिखा,न पढ़ा वह संपादक हो गया। ( अपना अपना बसंत)


डा स्नेहलता पाठक : चमचा नेता के लिए उस आधार कार्ड की तरह होता है जिसके बिना राजनीति का चारागाह दूर की कौड़ी बन जाता है। (जग घुमया थारे जैसा न कोई )


शशांक दुबे : बड़ा मौलिक होता है बचत के मामले में हिंदुस्तानी।  पेट्रोल बचाने के लिए वह सुबह दस बजे चौराहे पर जेब में हाथ डाल कर खड़ा हो जाएगा और किसी भी दोस्त या अनजान लेकिन शरीफ से दिखाई देते आदमी की फटफटी पर सवार होकर रास्ते भर हाथ हिला हिला कर बात करते हुए आसपास से गुजर रहे ट्रैफिक को भ्रमित करते हुए मंजिल तक पहुंच जाएगा।  ( कंजूस के आगे हर कोई हारा )


जवाहर चौधरी : सोचता हुआ आदमी अक्सर खामोशी अख्तियार कर लेता है। अपना देवीलाल याद है... जिसने पिछले साल आत्महत्या कर ली थी...  लेकिन किसी के चाहने भर से क्या होता है भले ही वह कोई आयोग फायोग ही क्यों ना हो। सभाएं और भोंगे बंद हो जाते हैं लेकिन टीवी चालू रहता है, और आप जानते हैं कि अपने आगे वह किसी को सोचने कहां देता है, एंकर का जलवा इतना कि वह चुनाव आयोग के सर पर भी चीखती रहती है। नतीजा यह कि न वोटर  सोच पाता है नहीं आयोग। लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट है कि जनता को कोई भी सोचने नहीं देता है। ( चिकना सोचो, चिकना बोलो, चिकना लिखो )


ब्रजेश कानूनगो : जब समय सूचक घड़ियां नहीं होती थी, तब मुर्गियों से ज्यादा मुर्गे का महत्व हुआ करता था। उसकी आवाज उसी तरह सुनी जाने की परंपरा रही है जैसे आज लाल किले की प्राचीर से हम भारतीय प्रधानमंत्री को सुनते हैं। किसी ऊंचे टीले पर चढ़कर लाल कलगी वाला   मुर्गा रात भर सूरज के निकलने की टोह लिया करता था। जब उसे आभास होता कि बस अब  उजाला होने को ही है, वह तुरंत जोरदार बांग लगा देता ताकि सब जाग जाएं। (महंगाई का मुर्गा और पॉपकॉर्न)


अख्तर अली : चमचे खड़े भी होते हैं तो ऐसा लगता है कि सजदे में हैं। ये भैया से जाने की अनुमति भी ऐसे मांगते हैं मानों अल्लाह से दुआ मांग रहे हों। ( चमाचम चमकते चमचे )


मुकेश नेमा : मर्तबान तभी खास होता है जब वह लोगों की पहुंच से दूर हो। ऊंचे ताक पर रखा हो। वहीं वर्तमान इज्जत पाता है जिस तक समझदार लंबे हाथ पहुंच सके और आजकल उन्हीं हाथों को समझदार माना जाता है जो वाया चमचा ही मर्तबान तक पहुंचने का कायदा जानते हैं। चमचों को राजी कर लेना ही घी तक पहुंच पाना है। (चमचा संस्कृति)


प्रभा शंकर उपाध्याय : कुशल यस मैन कभी नुकसान में नहीं रहता। वह अपने सरपरस्त का मूड देखता है और उसके अनुरूप व्यवहार करता है। सदा  प्रिय वचन बोलने वाला, हवा का रुख देख अपनी छतरी सेट करने वाला, यस मैन  हमेशा मजे में रहता है। आदर्श यस मैन का स्वर होता है, मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा। (फिर तेरे हाथ में सोने के निवाले होंगे)


अर्चना चतुर्वेदी :  प्रभु , आपने प्रकृति बनाई, पेड़ पौधे बनाए, रंग बिरंगे फूल फल बनाए, सुंदर पक्षी, जानवर, तितलियां, नदियां, झरने….. सच में आप की बनाई दुनिया तो बहुत ही खूबसूरत और नयनाभिराम है.... नयनाभिराम और खूबसूरत बस तभी तक है जब तक हमने मनुष्य नहीं बनाया था, पार्वतीजी बोलीं । ( आत्मघाती मानव जाति)


राजेंद्र वर्मा :  चमचे का  विनियोजित व्यवहार सत्ता की चादर का ताना है तो उसके दैनंदिनी कार्यकलाप उसका बाना। इसलिए चमचे के बिना सत्ता के ताने-बाने की कल्पना नहीं की जा सकती। सत्ता नहीं तो लोककल्याण नहीं। अतः लोक कल्याण के लिए चमचे का होना परम आवश्यक है। (च से चमचा )


बुलाकी शर्मा :  चमचागिरी करना खाला का घर नहीं है। बहुत रिस्की कला है या इसके लिए चतुराई और काइयांपन का होना बहुत आवश्यक है। सामने वाले को इसका अहसास ही नहीं होना चाहिए कि आप उसकी चमचागिरी कर रहे हैं वरन यह लगना चाहिए कि आप समर्पित भाव से उसके अनुयाई हैं और सच्चे मन से उसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा करते रहे हैं। ( चमचागीरी और चाणक्य नीति )


प्रभात गोस्वामी :  सीमेंट के बने पुल की ढहने या दरारें पड़ने की संभावनाएं बनी रहती हैं लेकिन जीभ से बांधे जाने वाले तारीफ के पुल चट्टानों से भी ज्यादा मजबूत होते हैं, ऐसा चमचा मंडली का दावा है। (चमचों की जीभ पर सवार अफसरान )


सुनील जैन राही :  केबिन में ठंड बढ़ जाती है तब गरम मुद्दे की बात होती है। मुद्दा अभी बार में था। बार जहां मुवक्किल नहीं जा सकता। बार में वे ही जाते हैं जिनके पास मुद्दे को ठंडा करने की बर्फ होती है। (फैसला बार में होगा)


डा पंकज साहा : हिंदी आलोचना को गड्ढे में गिराने में चमचों की बहुत बड़ी भूमिका है। बेचारे आलोचक महोदय अपने चमचों को जितना ऊपर उठाते हैं,उतना ही वे नीचे गिरते जाते हैं। (चम्मच महिमा ) 


डा प्रदीप उपाध्याय : चमचा सर्वगुण संपन्न होता है। अपने नाम के अनुरूप  चरितार्थ होता है। वक्त और हालात के हिसाब से वह अपने को बदल लेता है। (अगले जनम मोहे चमचा ही कीजै) 


सुनीता सानू : चमचा कुछ करे न करे,गुणगान इतना कर देता है कि पतीली के भीतर क्या पक रहा है,जग जाहिर कर सकता है। ( सभ्यता के प्रतीक चमचे) 


मुकेश राठौर : विधायक जी उनतीस फरवरी की तरह हर चौथे साल अपने इलाके में आधे बुलावे पर हर छोटे बड़े कार्यक्रमों में पहुंचते। नाले में पानी हो तो जुगाड की नाव में बैठकर, गांव में बिजली न हो तो टॉर्च जलाकर,गलियों में कीचड़ हो तो पजामा खोसकर, जूते हाथ में उठाकर...लेकिन आते जरूर। (गुमशुदा माननीय की तलाश) 


हनुमान मुक्त : यदि हड्डियों पर चिपके मांस को चूसना है तो आपको भेड़िए का चमचा बनना होगा। (चमचे पर शोध) 


अनूप शुक्ल : मार्क्सवादी आदमी रिपेयर होकर आया तो उसके दिमाग से दास कैपिटल गायब हो गई उसकी जगह एक के बदले चार फ्री तथा सीमित आफर,जल्दी करें की तमाम स्कीमें भर गई हैं। (आदमी रिपेयर सेंटर) 


वीना सिंह : लोकतंत्र है तो सरकार है। सरकार है तो विपक्ष है। विपक्ष है तो असहमति है।असहमति है तो विवाद है। विवाद है तो विरोध है। धरना,प्रदर्शन है,रैली है। रैली चमचों की भीड़ से ही बनती है। (चमचे हैं तो रैली है) 


कुछ व्यंग्यकारों की रचनाओं से मैं उद्धरण नही चुन पाया क्योंकि कुछ पंक्तियों से बात बन नही पाती क्योंकि उनके कहन में विस्तार है। पैराग्राफ बड़े होते हैं लेकिन समग्रता से प्रभावित करते हैं।


बहरहाल, सभी शामिल रचनाकारों और संपादक सुश्री वीना सिंह को हार्दिक बधाई। निश्चित ही यह संग्रह पाठकों द्वारा खूब पढ़ा जाएगा।


(व्यंग्य संग्रह : भांति भांति के चमचे, संपादक : वीना सिंह, प्रकाशक : शोपिजेन,अहमदाबाद, मूल्य : 245 रुपए। )


ब्रजेश कानूनगो



Tuesday, May 30, 2023

भिया के तेजस्वी पंखे

स्थानीय तेवरों में व्यंग्य की गुनगुनी मार : भिया के तेजस्वी पंखे 


भूपेंद्र भारतीय के पहले व्यंग्य संग्रह 'भिया के तेजस्वी पंखे' शीर्षक देखकर कोई यह भी समझ सकता है कि भैया यह कौनसा पंखा है जो इतना तेजस्वी है? यदि स्वयं पंखे में इतनी तेजस्विता है तो फिर वह गर्मियों में किसी बंदे को ठंडक किस तरह पहुंचा पाता होगा? दरअसल मालवा के छोटे कस्बों में गली मोहल्ले की भाषा में छूट भैय्या नेताओं के पिछलग्गुओं को कहीं छर्रे और कहीं पंखे संबोधन से भी पुकारा जाता है। ऐसे ही कुछ देशज और बोलचाल में प्रयुक्त होने वाले शब्दों और ठेठ स्थानीय तेवरों में व्यंग्य और हास्य का तड़का लगाना भूपेंद्र भारतीय के लेखन की एक विशिष्ठ पहचान कही जा सकती है। 


भूपेंद्र भारतीय के व्यंग्य संग्रह की पांडुलिपि पढ़ते हुए वर्तमान में बहुतायत से सामने आ रहे व्यंग्य लेखन पर कुछ बातें कहने का मन हो रहा है। इस संग्रह की भूमिका लिखने की पृष्ठभूमि में इनकी चर्चा होना न सिर्फ प्रासंगिक होगा बल्कि वर्तमान दौर में स्तंभ लेखन में आने वाली रचनाओं के संदर्भ में भी संभवतः विमर्श की दृष्टि से भी उपयोगी होगा। 


पत्र पत्रिकाओं में इन दिनों सामान्य पाठकों की रुचि के लेखों को खूब स्थान मिल रहा है। चर्चित विषयों पर रोचक सामग्री को ध्यान में रखकर कुछ पत्रों में हास्य,विनोद और व्यंग्य स्तंभ नियमित रूप से प्रकाशित किए जाते हैं। व्यंग्य,विनोद अथवा किसी अन्य शीर्षक से इन्हे वर्गीकृत किया जाता है। अधबीच, खरी खरी, तिरछी नजर, तरकश,नश्तर,तीखी नजर  आदि कुछ ऐसे ही अखबारी स्तंभ हैं जिनमें दिलचस्प आलेखों को स्थान मिलता रहता है। कई बार इनमें ऐसे लेख भी छपते हैं जो साहित्य की व्यंग्य विधा में गुणवत्ता की कसौटी पर शायद उतने खरे नहीं कहे जा सकते किंतु इन रचनाओं में जो सबसे महत्वपूर्ण बात होती है वह यह कि इनकी विषयवस्तु अधिकांशतः अखबारों की सुर्खियों अथवा किसी चर्चित प्रसंग,तात्कालिक सामाजिक विसंगति पर केंद्रित होती है। इनमें सामयिक घटनाओं और प्रसंगों पर कटाक्षपूर्ण या व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया,टिप्पणी अथवा परिहास सहजता से देखा जा सकता है। 


अखबारों के पाठकों के बीच ये काफी रूचि से पढ़े भी जाते हैं। कुछ पाठक तो सबसे पहले इन्हें ही पढ़ना पसंद करते हैं। इस व्यावसायिक समय में पत्र पत्रिकाओं से साहित्य पृष्ठ भले ही नदारद होते जा रहे हों मगर इन लघु टिप्पणियों की मांग बरकरार है। 


इसका एक अर्थ यह भी है कि सामयिक व्यंग्य लेखों की पठनीयता उनके तात्कालिक सन्दर्भों की वजह से अधिक हैं। यह भी सही है कि इनका पाठक वर्ग भी बड़ा है। कविता की तरह यह तंज यहां लागू नहीं होता कि 'कवि ही कविता पढ़ते हैं और कवि ही कविता लिखते हैं'।  सामयिक सन्दर्भों और विषयों पर लिखे गए की लोकप्रियता आम पाठकों में बहुत ज्यादा होती है। इनकी एक महत्वपूर्ण भूमिका यह भी है कि इन्ही को पढ़ते हुए पाठक गंभीर साहित्य और  व्यंग्य पढ़ने को लालायित होने लगता है।  


नए रचनाकारों के लिए यह स्तंभ लेखन एक कार्यशाला की तरह होता है जिसमे अभ्यास करते हुए वह अपने आपको मांजता है,बेहतर करने का प्रयास करता है। 


युवा रचनाकार भूपेंद्र भारतीय एक संवेदनशील, कस्बाई जीवन में पले बड़े  व्यक्ति हैं। पेशे से वकील हैं, महाविद्यालय में पढ़ाते भी हैं और पत्रकारिता में भी उनकी रुचि रही है। एक नागरिक के तौर पर गांव,कस्बे,देश,प्रदेश और समाज के बीच जो कुछ घटित होता है, उन पर उनकी जागरूक नजर हमेशा बनी रहती है। नीतियों, योजनाओं,घटनाओं, प्रसंगों, नेताओं के बयानों और समाज में जब भी कुछ अटपटा या असंगत महसूस होता है, उनकी कलम व्याकुल हो उठती है। अभिव्यक्ति का सहज माध्यम अखबारों के वही स्तंभ होते हैं जो सामान्य पाठकों में बहुत लोकप्रिय हैं और पढ़े जाते रहे हैं। 


इस संग्रह की ज्यादातर रचनाएं पिछले तीन चार वर्षों में कोरोना महामारी के दौर में लिखी गई हैं, इसलिए इस कालखंड में घटित विषयों पर पर्याप्त रचनाएं इस संकलन में शामिल हैं। कुछ में साहित्य संसार को भी लक्ष्य किया गया है। कुछ रचनाओं में राजनीतिक बेहुदगियों के संदर्भ में चुटीली टिप्पणियां है। कुछ ज्वलंत मुद्दों मसलन  आरक्षण और जातिवाद पर भी युवा लेखक अपने विचार व्यक्त करते हैं। यद्यपि कुछ रचनाओं से पाठकों को वैचारिक असहमति या मतांतर भी हो सकता है, बावजूद इसके लेखक को अपने दृष्टिकोण से विषय को समझने और अपनी तरह से निर्वाह की स्वतंत्रता मिलना ही चाहिए। ज्यादातर रचनाओं में भूपेंद्र विषय को रोचकता से निभाने में सफल हुए हैं। यद्यपि विषयों में कई जगह दोहराव भी हुआ है लेकिन पठनीयता बांधे रखती है। 


मुझे लगता है व्यंग्य विधा के सागर से मोती ढूंढ लाने में कुशल गोताखोरी के लिए तैराकी में इस तरह का नियमित अभ्यास बहुत जरूरी होता है। व्यंग्य लेखन में भूपेंद्र बहुत ईमानदारी से यह प्रयास और अभ्यास करते दिखाई देते हैं। 


जैसा मैंने आरंभ में कहा है उनकी कुछ रचनाओं में देशज शब्दों और स्थानीय लहजे का प्रयोग रचना को अलग पहचान देता है। रचनाओं में कुछ हद तक चुटकियां,हास्य,व्यंजना, कटाक्ष है लेकिन सामान्यतः वे तीखा प्रहार नहीं करते। रंजक टिप्पणियां जरूर करते हैं। 


हमें विश्वास है लेखक व्यंग्य के औजारों पर थोड़ी धार अधिक तेज करेंगे और व्यंग्य भाषा को संवारते रहेंगे। लेखन में सामाजिक सरोकारों और नागरिक बोध से भरी उनकी व्यंग्य दृष्टि लगातार बेहतर रचने की आकांक्षा और संकल्प के साथ व्यंग्य सागर से अनेक मोती चुन लाने में अवश्य सफल होगी। भूपेंद्र भारतीय की यह पहली किताब है। संग्रहित आलेखों को उसी नजरिए से पढ़ा जाना चाहिए। 

इस संग्रह की रचनाएं स्तंभ लेखन की सीमाओं के बावजूद खासा प्रभावित करती हैं। रचनाओं को पढ़कर हमें उनसे और भी शानदार रचनाओं की उम्मीद बंध जाना स्वाभाविक है।  व्यंग्य संग्रह ' भिया के तेजस्वी पंखे ' के लिए उन्हें हार्दिक बधाई और बेहतरीन लेखन के लिए शुभकामनाएं... 


ब्रजेश कानूनगो




Monday, May 29, 2023

पुस्तक चर्चा : रूदादे-सफ़र

पुस्तक चर्चा : 

रूदादे-सफ़र : मार्मिक फ़िल्म सा आनंद

ब्रजेश कानूनगो


कथाकार पंकज सुबीर का नया उपन्यास 'रूदादे-सफ़र' अंत तक पाठक को बाँधे रखता है। इसकी बेहद सहज भाषा ने इस उपन्यास की पठनीयता को इतना बढ़ा दिया है कि किसी फ़िल्म की बेहतरीन पटकथा की तरह हम कहानी में बहते चले जाते हैं। इसके यह मायने कतई नहीं हैं कि आम लोकप्रिय उपन्यासों की तरह इसमें गंभीर साहित्य के तत्व कम दिखाई देते हैं। पठनीयता में लोकप्रिय लेखन की ख़ूबियों के बावजूद इसमें संवेदनाओं की गहराई, समाज के तात्कालिक और समकालीन जीवन के उतार-चढ़ाव, रिश्तों की आत्मीयता को लेकर जो ताना-बाना बुना गया है, उससे साहित्य का गंभीर पाठक लेखक के कहन की गहराई और भावनात्मक अभिव्यक्ति का क़ायल हुए बगैर नहीं रह सकता।


दरअसल, पंकज सुबीर के उपन्यासों में समाज की रोज़मर्रा की कहानी के बावजूद कुछ ऐसा अलग और विशिष्ट भी होता है जिसके विषय में आम पाठक को पहले से ज़्यादा जानकारी नहीं होती। पिछले उपन्यासों में वैश्विक व भारतीय इतिहास, धर्म, सांप्रदायिकता, रीति, नीति और अनेक गूढ़ तथ्य उनकी कहानियों के प्रसंगों में खोजपूर्ण जानकारी के साथ समाविष्ट होते रहे हैं। निश्चित रूप से इन्हें कहानियों में बेवजह नहीं लाया गया होता है, बल्कि कहानी की पृष्ठभूमि से इनका गहरा संबंध और महत्त्व होता है। लेखक को इसके लिए काफी खोज, अध्ययन और सार्थक तारतम्य भी बैठाना होता है। पंकज सुबीर की इस पूर्व तैयारी का मैं बहुत क़ायल हूँ।


'रूदादे-सफ़र' में इस बार चिकित्सा विज्ञान कुछ इसी तरह से कहानी के साथ एकाकार हुआ है। किसी चिकित्सक पात्र के चित्रण में शायद ही कभी इतने विस्तार से और गहनता से कोई हिंदी लेखक तकनीकी विषय के विवेचन सहित पाठकों को भी इतना संपन्न कर पाया होगा। ख़ास तौर से एनोटॉमी, शवदान, शव संरक्षण आदि और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं को संभवतः मेरे जैसे अनेक पाठकों ने पहली बार ही जाना होगा। वह भी मूल कहानी के साथ बहते हुए। लेखक इस श्रम के लिए सचमुच बहुत प्रशंसा के योग्य हैं।


एक बेटी का पिता होने के कारण शायद कई बार मेरी आँखें भर आईं इसे पढ़ते हुए। गला रुँध गया। कई बार किताब अलग रखकर कुछ और काम करके अपने को सहज बनाने का प्रयास किया। थोड़ी देर बाद फिर किताब उठाने से स्वयं को रोक नहीं पाया। पिता-पुत्री के रिश्ते वैसे ही बहुत मार्मिक और समर्पित होते हैं, और जब पुत्री पिता की ही लगभग छाया हो, तो बात कुछ और अधिक संवेदनामय हो जाती है। 'रूदादे-सफ़र' की कहानी के केंद्र में पिता और पुत्री का स्नेह और जिम्मेदारियों का इंद्रधनुष मुस्कुराता रहता है। 


कहानी में कई मार्मिक दृश्य हैं। मेडिकल कॉलेज के प्रसंग हैं। छात्रों और शिक्षक, चिकित्सकों, सहयोगियों के साथ तकनीकी, चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के साथ साथ संबंधों और आत्मीय रिश्तों में स्नेह की, संस्कारों की, गीत, संगीत और कला जगत् की झलकियाँ हैं। प्रेम है, तो त्याग भी है। समर्पण है, तो प्रेम की आकांक्षा भी है इसमें। नया, पुराना भोपाल है, इंदौरी पोहे का आनंद है, बहुत कुछ है इसमें, जो इसे रोचक बनाए रखता है। इस अनुभव को उपन्यास पढ़कर ही समझा जा सकता है।


कई जगह मुझे उपन्यास की प्रस्तुति किसी पुरानी आदर्शवादी फ़िल्म की तरह भी लगती रही। एवीएम या जैमिनी प्रोडक्शन की भावनापूर्ण पुरानी फ़िल्में देखने वाले अनुभव से गुज़रता रहा। सीख और संदेशों को बहुत सुंदर ढंग से संवादों में पिरोया गया है। खासतौर से पिता और पुत्री के संवादों से प्रसंग बहुत मार्मिक हो उठते हैं। अंत तो बिलकुल अप्रत्याशित ही कहा जाएगा। हालाँकि मैंने उसका अनुमान पूर्व में ही लगा लिया था, किंतु पंकज सुबीर ने उसका निर्वाह इतनी ख़ूबसूरती से किया है कि पाठक दंग रह जाता है।


अंतिम पंक्तियों में पूरे उपन्यास की आत्मा जैसे निकलकर आ जाती है, ...हम सभी की जिंदगी की यही हक़ीक़त है कि हमारे रूदादे-सफ़र वही होती है, जो वक़्त तय कर देता है, हमारे पहले से तय करने से कुछ नहीं होता। हम सबकी रूदादे सफर अंततः वक़्त ही लिखता है।

अब जहाँ भी हैं वहीं तक लिखो रूदादे-सफ़र,

हम तो निकले थे कहीं और ही जाने के लिए...!

निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल के इस शेर के साथ पंकज सुबीर का यह उपन्यास समाप्त हो जाता है। आँखें भीगी रह जाती हैं।

बहुत बधाई इस ख़ूबसूरत उपन्यास के लिए। सफ़र ऐसे ही जारी रहे पंकज भाई।


(पुस्तक : रूदादे - सफ़र, लेखक : पंकज सुबीर, प्रकाशक : शिवना प्रकाशन,सीहोर, मूल्य : 300 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो




पुस्तक चर्चा : निठल्लों का औजार सोशल मीडिया

पुस्तक चर्चा :

निठल्लों का औजार सोशल मीडिया : प्रतिरोध की आवाज में व्यंग्यकार का जरूरी सुर

ब्रजेश कानूनगो


'निठल्लों का औजार सोशल मीडिया' व्यंग्यकार राजशेखर चौबे के व्यंग्य आलेखों की तीसरी किताब है। इस संकलन में उनके कुल पचास छोटे छोटे आलेख हैं जो गत चार,पांच वर्षों में घटित प्रसंगों, नीतियों,स्थितियों और विसंगतियों पर उनकी व्यंग्यात्मक टिप्पणियां हैं। कही कहीं उनकी पीड़ा और आक्रोश बहुत सीधे सीधे अभिव्यक्त होने लगता है। शरद जोशी जी ने एक बार निजी बातचीत में कहा भी था कि जब हम किसी विडंबना या मूर्खता पर आक्रोश में खरा खरा भी लिख दें तो वह भी एक तरह का व्यंग्य माना जा सकता है। राजशेखर चौबे की रचनाओं में यह बहुत जगह दिखाई देने लगता है। हालात ही कुछ ऐसे हैं कि हर व्यक्ति अपने मन की बात कहने को उद्यत और व्याकुल होता है।


इस संदर्भ में मुझे एक कविता के अंश बड़े मौजू लगते हैं। कवि के नाम को लेकर भ्रम की स्थिति बनी है लेकिन इसके रचनाकार के रूप में ज्यादातर लोग गोरख पाण्डेय को मान्यता देते रहे हैं। बहरहाल कविता कुछ इस तरह है -

राजा बोला रात है/ रानी बोली रात है/मंत्री बोला रात है/ संत्री बोला रात है/ हर कोई बोला रात है/ यह सुबह सुबह की बात है...


राजशेखर चौबे जी के भीतर कहन की यही व्याकुलता है। ऐसी ही अजीबोगरीब स्थितियों के कारण उनका मन क्षोभ और पीड़ा से भरा हुआ दिखाई देता है। चारों तरफ जी हुजूरी और जय जयकार के बीच गलत और सही के बीच का अंतर ओझल है। सच्चाई के आकर्षक रैपर में जब झूठ की चॉकलेटें प्रस्तुत की जा रही हों तो प्रतिरोध और व्यंग्य में सीधे सीधे हमले स्वाभाविक भी हो जाते हैं। कहीं अधिक तो कहीं ये तेवर व्यंजना और फैंटेसी  के रूप में भी अभिव्यक्त हुए हैं। चौबे जी इसी तेवर को इस संकलन में प्रमाणित करते हैं। संकलन के प्रारंभ  में चौबे जी अपनी बात में इसी चीज को स्वीकारते हैं और रचनात्मक रूप से अपनी रचना 'तोता और आम आदमी ' के माध्यम से प्रभावी रूप से अभिव्यक्त भी करते हैं।


जब सोशल मीडिया नया और झूठा इतिहास रचने में व्यस्त हो, विश्लेषण और तर्कों का अभाव हो और उसे बिना अध्ययन,श्रमहीन,विचारहीन दस्तावेजों से पाट दिया जा रहा हो तो उसे 'निठल्लों का औजार ' ही कहा जाएगा। इस मायने में लेखक ने किताब का शीर्षक ठीक ही दिया है। किंतु यह भी एक तथ्य है कि जब भी इस औजार का विवेकपूर्ण उपयोग हुआ है,साहित्य,समाज और संस्कृति के भले के लिए किसी चिकित्सक के औजारों की तरह इस्तेमाल हुआ है,यही सोशल मीडिया अपनी अलग और सकारात्मक भूमिका में भी दिखाई देता है। झूठ की वाट्स एप यूनिवर्सिटी के प्रपंच को छोड़ दें तो मुख्य मीडिया के समांतर इस वैकल्पिक माध्यम का खासा असर अब सहजता से स्वीकार भी किया जाने लगा है।


इतिहास लेखन में उस समय के साहित्य में इतिहासकार तत्कालीन सच्चाइयों और स्थितियों के सूत्र तलाशते हैं। भविष्य में जब भी नया इतिहास लेखन होगा तब भी पुस्तकें पढ़ी जाएंगी। राजशेखर चौबे जी की किताब में इस दौर की कई ऐसी बातें शामिल हैं जिनसे आज की स्थितियों,परिस्थितियों,नीतियों,मूर्खताओं और विडंबनाओं की झलक अवश्य उपलब्ध होगी।

कोरोना महामारी के दौर के समय के कई प्रसंग, राजनेताओं के आचरण, बेढंगी आर्थिक नीतियां और समाज और प्रशासन में व्याप्त आडंबर, पाखंड और भ्रष्टाचार पर चौबे जी ने अपने तरीके से जन प्रतिरोध की सामूहिक आवाज में अपना ईमानदार सुर भी मिलाया है।

श्री राजशेखर चौबे जी को इस व्यंग्य संग्रह के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।


(व्यंग्य संग्रह : निठल्लों का औजार सोशल मीडिया, लेखक : राजशेखर चौबे, प्रकाशक : वंश पब्लिकेशन,भोपाल, मूल्य : 250 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो





पुस्तक चर्चा : भोंगपुर 30 कि. मी

पुस्तक चर्चा :

भोंगपुर 30 कि. मी. : दिलचस्प व्यंग्य उपन्यास

ब्रजेश कानूनगो


मैं यह अपनी पाठकीय चेतना में कोई कमी ही मानता हूं कि श्री विनोद साव जी के वर्ष 2007 में आए व्यंग्य उपन्यास 'भोंगपुर 30 कि. मी.' को  इतने वर्षों बाद पढ़ पाया।


रायपुर में हिंदी साहित्य एवं व्यंग्य संस्थान द्वारा मार्च 2023 में आयोजित परसाई सम्मान कार्यक्रम में दुर्ग निवासी वरिष्ठ व्यंग्यकार विनोद साव जी से आत्मीय भेंट हुई तो इस पुस्तक का स्नेह उपहार दे कर उन्होंने मुझे संपन्न कर दिया।


हमारे हिंदी पाठक जगत में आमतौर पर यह होता रहता है कि किसी भी विधा के चार पांच नाम ही बाजार में तैरते रहते हैं। नए पाठकों द्वारा पुस्तकें भी उन्ही की खरीदी,पढ़ी जाती रहती हैं। चर्चा में भी कुछ ही प्रमुख शीर्षक बने रहते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि अन्य कई प्रतिभा संपन्न रचनाकार अपने बेहतरीन काम में लगे होते हैं।

श्री विनोद साव सदा से एक बेहतरीन व्यंग्यकार रहे हैं। यही कारण है कि 2007 में इस उपन्यास के आने के समय तक ही उनके चार व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। उनकी रचनाएं  पहल, ज्ञानोदय,वागर्थ, अक्षर पर्व,समकालीन भारतीय साहित्य, लोकायत जैसी साहित्य की प्रमुख पत्रिकाओं में लगातार छप रही थीं, पत्र पत्रिकाओं के स्तंभ लेखन से अब भी यह क्रम जारी है। अट्टहास,वागीश्वरी,जगन्नाथ राय शर्मा पुरस्कारों से हुआ सम्मान भी उनकी रचनात्मक गुणवत्ता और श्रेष्ठता का एक ईमानदार प्रमाण भी  है।


यद्यपि हाल ही में मैंने समग्र रूप से 'भोंगपुर...'  पढ़ा है लेकिन बरसों से उनकी व्यंग्य रचनाओं को पढ़ता आया हूं। उनकी वैचारिकी मेरी अपनी समझ से बहुत निकट बैठती है। व्यंग्य के प्रति उनका दृष्टिकोण और सटीक निर्वाह हमें बहुत प्रभावित करता है।


छत्तीसगढ़ के दुर्ग शहर और उससे 30 किलोमीटर दूर भोंगपुर जैसे देहाती क्षेत्र के इर्द गिर्द शिक्षण संस्थाओं और विद्यार्थियों के बीच की रोचक स्थितियों और अटपटे आचरण के माध्यम से पूरा कथाक्रम भले ही चलता है किंतु हर प्रसंग अपने आपमें संक्षिप्त होकर भी सटीक व्यंग्य की पूर्णता का निर्माण करता है। रोजमर्रा की गतिविधियों के निरीक्षण को साव जी ने बहुत ही दिलचस्प शब्दों में, कई जगह ठेठ देशज संदर्भों में बहुत ही खूबसूरती से चित्रित किया है। उनकी अभिव्यक्ति में उनके नाम के अनुरूप विनोद तो होता ही है किंतु व्यंग्य की तीक्ष्णता या धार भी बनी रहती है। चलें गांव की ओर के पथ पर चलते हुए लेखक पाठकों को दुर्ग, भोंगापुर के रास्ते शिक्षण व्यवस्था, विद्यालय के भीतर और वहां के वातावरण के भीतर तक ले जाकर व्यापक मूर्खताओं, चालाकियों,तिकड़मों,बदमाशियों,राजनीतिक कुटिलताओं के आस्वाद से रूबरू करवाने में सफल होता है।


उपन्यास को पढ़ते हुए हम अपने आपको छत्तीसगढ़ के कस्बाई माहौल के बीच पाते हैं,उसे जीने लगते हैं। यही इस उपन्यास की विशेषता कही जा सकती है कि इसे बहुत गहरे उतर कर बहुत मजे लेकर रचा गया है। इसकी भाषा और रोचक निर्वाह ही इसकी वह सहजता भी है जिससे पाठक भी मजे लेकर इसे पढ़ता जरूर है लेकिन व्यंग्य की भीतरी बनावट उसे उद्वेलित करती है।


यदि पाठकों ने इसे अब तक नहीं देखा पढ़ा है तो अवश्य ही इसे ढूंढ कर अवश्य पढ़ लें। मेरे जैसा विलंब न कर दें। वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री विनोद साव जी को इस रचना के लिए बधाई देता हूं। शुभकामनाएं।


( व्यंग्य उपन्यास : भोंगपुर 30 कि. मी., लेखक: विनोद साव, प्रकाशक : पंकज बुक्स,दिल्ली, मूल्य :150 रुपए हार्डबाउंड 2007)


ब्रजेश कानूनगो



पुस्तक चर्चा : तुम चंदन हम पानी

पुस्तक चर्चा :

तुम चंदन हम पानी : व्यंग्य स्प्रिट की रचनाएं

ब्रजेश कानूनगो


'तुम चंदन हम पानी' छत्तीसगढ़ के बोडरा जैसे छोटे से गांव में शिक्षक के रूप में कार्यरत तथा चुपचाप अपने रचनाकर्म में रत श्री वीरेन्द्र सरल का नवीनतम और चौथा संग्रह है। इस संग्रह का विमोचन हाल ही में रायपुर में हिंदी साहित्य एवं व्यंग्य संस्थान द्वारा आयोजित परसाई सम्मान समारोह में हुआ है। व्यक्तिगत रूप से वहीं उनसे भेंट हुई थी, उनकी सादगी और सरलता से परिचित भी हुआ था। उसी कार्यक्रम में मुझे उन्होंने यह व्यंग्य संग्रह स्नेहपूर्वक भेंट किया था। अब संग्रह की रचनाएं पढ़ने के बाद उनकी रचनात्मकता से भी प्रभावित होना स्वाभाविक ही था।


संदर्भित संकलन में उनकी कुल पच्चीस व्यंग्य रचनाएं शामिल हैं। व्यंग्य के विषय निश्चित ही देश दुनिया और समाज की उन्ही तात्कालिक विसंगतियों,आचरण और अटपटे प्रसंगों से निकलकर आते हैं किंतु इन रचनाओं को उस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता जो प्रतिदिन पत्र पत्रिकाओं में मात्र व्यंग्य की खानापूर्ति के लिए लिखा और छापा जाता है।  भले ही संग्रह की कुछ रचनाएं अखबारों के तथाकथित व्यंग्य स्तंभों में प्रकाशित हुई होंगी किंतु इनमें व्यंग्य की वह चमक अलग से नजर आ जाती है, जिसमें मनुष्य और समाज के प्रति लेखक के सरोकार और विडंबनाओं के कारण भीतर का उद्वेलन और आक्रोश,दुख व्यंजना के रूप में रिसता है।


वीरेंद्र सरल की भाषा शैली भी स्तंभ लेखन से अलहदा है। अपनी रचनाओं को वे शब्दों की सीमा में बांधने का प्रयास नहीं करते। खुलकर विस्तार देते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनका विश्वास रचनाओं में व्यंग्य को विधा की बजाए उसे स्प्रिट के रूप में शामिल करने का  रहता है। आलेख की तरह शुरू करते हुए भी वे कहानी की ओर मुड़ जाते हैं। यह गौरतलब और प्रशंसनीय भी है कि निबंध या आलेख की तुलना में किस्सागोई या कहानी पाठक को ज्यादा रुचिकर और ग्राह्य होती है। संग्रह में सरल जी की अधिकांश रचनाएं या तो कहानी की तरह हैं या आगे बढ़ते बढ़ते कहानी में बदलती जाती है। ज्यादातर रचनाएं लंबी हैं लेकिन बांधे रखती हैं। इन्हे पढ़ते हुए लगता है कि वीरेंद्र सरल को उपन्यास की दिशा में भी अपने कदम बढ़ाना चाहिए।


आमतौर पर मैं किसी पुस्तक पर अपनी टिप्पणी में उदाहरण के लिए कोई अंश उद्धृत नहीं करता क्योंकि रचना में निहित संवेदना, अथवा उद्वेलन तो संपूर्ण रचना का आस्वाद लेने के बाद ही महसूस किया जा सकता है।

सरल जी की व्यंग्य रचना के संदर्भ में यह कहना ठीक ही होगा कि जब लेखक कोई स्टेंडअप कॉमेडी या किसी मंच के श्रोता की तालियों के लिए लिख ही नहीं रहा, विसंगतियों और विडंबनाओं,मूर्खताओं के प्रति उसके भीतर आक्रोश है,करुणा और दुख रिस रहा हो तब चुटकियों की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। यद्यपि वीरेंद्र सरल अपनी रचनाओं में चुटकियों, तंज,कटाक्ष और विनोदपूर्ण कथनों से कोई परहेज भी नहीं करते लेकिन वह सब व्यंग्य की रचनात्मक स्प्रिट में बहता चला आता है।

संकलन की रचनाओं में वीरेंद्र सरल ने वर्तमान समय के राजनीतिक और धर्म के नाम पर राजनीति के पाखंड पर भी प्रहार किया है तो सरकारी योजनाओं के भ्रष्टाचार को भी फेंटेसी प्रारूप में रेखांकित करने की कोशिश की है। कुछ रचनाएं इस संदर्भ में महत्वपूर्ण कही जा सकती हैं। वह चाहे योजना बहनजी हो या बाबागिरी के फायदे। एक रचना में  केशलेस की तर्ज पर 'घोपलेस ' शब्द का प्रयोग कर वे चौका देते हैं। आगे पता चलता है उनका आशय  'घोषणा पत्र लेखक संघ' से है। अलग हटकर वे कई रचनाओं में दिखाई देते हैं। पूजा फ्रॉम होम, डाकू की शोक सभा, व्हाट्सएप ज्ञानमृत समूह, इंद्रलोक में नेता जीव आदि आदि।  शीर्षक रचना तुम चंदन हम पानी भी अपने लक्ष्य तक पहुंचती है,इस वक्त में इसे एक जरूरी एवं साहसिक रचना भी कहा जा सकता है।

वीरेंद्र सरल ने अपने व्यंग्य और व्यंग्य के सरोकारी स्वरूप पर विनोदपूर्ण शैली में विनम्रता पूर्वक ' अपनी बात ' ईमानदारी से कही है। यह आलेख भी किसी व्यंग्य रचना से कम नहीं है।

किताब में ख्यात व्यंग्य आलोचक डा रमेश तिवारी जी की भूमिका और श्रवण कुमार उर्मलिया जी के शुभकामना संदेश से संग्रह समृद्ध हुआ है। ये दोनो आलेख सरल जी की रचनाओं तक ठीक से पहुंचने में पाठक की मदद करते हैं।

निश्चित ही वीरेंद्र सरल के इस व्यंग्य संग्रह का हिंदी व्यंग्य पाठक जगत में भरपूर स्वागत होगा। शुभकामनाएं।


(व्यंग्य संग्रह : तुम चंदन हम पानी, लेखक : वीरेंद्र सरल, प्रकाशक : कल्पना प्रकाशन,दिल्ली, मूल्य : 450 रुपए ,हार्ड बाउंड)


ब्रजेश कानूनगो