Monday, May 29, 2023

पुस्तक चर्चा : निठल्लों का औजार सोशल मीडिया

पुस्तक चर्चा :

निठल्लों का औजार सोशल मीडिया : प्रतिरोध की आवाज में व्यंग्यकार का जरूरी सुर

ब्रजेश कानूनगो


'निठल्लों का औजार सोशल मीडिया' व्यंग्यकार राजशेखर चौबे के व्यंग्य आलेखों की तीसरी किताब है। इस संकलन में उनके कुल पचास छोटे छोटे आलेख हैं जो गत चार,पांच वर्षों में घटित प्रसंगों, नीतियों,स्थितियों और विसंगतियों पर उनकी व्यंग्यात्मक टिप्पणियां हैं। कही कहीं उनकी पीड़ा और आक्रोश बहुत सीधे सीधे अभिव्यक्त होने लगता है। शरद जोशी जी ने एक बार निजी बातचीत में कहा भी था कि जब हम किसी विडंबना या मूर्खता पर आक्रोश में खरा खरा भी लिख दें तो वह भी एक तरह का व्यंग्य माना जा सकता है। राजशेखर चौबे की रचनाओं में यह बहुत जगह दिखाई देने लगता है। हालात ही कुछ ऐसे हैं कि हर व्यक्ति अपने मन की बात कहने को उद्यत और व्याकुल होता है।


इस संदर्भ में मुझे एक कविता के अंश बड़े मौजू लगते हैं। कवि के नाम को लेकर भ्रम की स्थिति बनी है लेकिन इसके रचनाकार के रूप में ज्यादातर लोग गोरख पाण्डेय को मान्यता देते रहे हैं। बहरहाल कविता कुछ इस तरह है -

राजा बोला रात है/ रानी बोली रात है/मंत्री बोला रात है/ संत्री बोला रात है/ हर कोई बोला रात है/ यह सुबह सुबह की बात है...


राजशेखर चौबे जी के भीतर कहन की यही व्याकुलता है। ऐसी ही अजीबोगरीब स्थितियों के कारण उनका मन क्षोभ और पीड़ा से भरा हुआ दिखाई देता है। चारों तरफ जी हुजूरी और जय जयकार के बीच गलत और सही के बीच का अंतर ओझल है। सच्चाई के आकर्षक रैपर में जब झूठ की चॉकलेटें प्रस्तुत की जा रही हों तो प्रतिरोध और व्यंग्य में सीधे सीधे हमले स्वाभाविक भी हो जाते हैं। कहीं अधिक तो कहीं ये तेवर व्यंजना और फैंटेसी  के रूप में भी अभिव्यक्त हुए हैं। चौबे जी इसी तेवर को इस संकलन में प्रमाणित करते हैं। संकलन के प्रारंभ  में चौबे जी अपनी बात में इसी चीज को स्वीकारते हैं और रचनात्मक रूप से अपनी रचना 'तोता और आम आदमी ' के माध्यम से प्रभावी रूप से अभिव्यक्त भी करते हैं।


जब सोशल मीडिया नया और झूठा इतिहास रचने में व्यस्त हो, विश्लेषण और तर्कों का अभाव हो और उसे बिना अध्ययन,श्रमहीन,विचारहीन दस्तावेजों से पाट दिया जा रहा हो तो उसे 'निठल्लों का औजार ' ही कहा जाएगा। इस मायने में लेखक ने किताब का शीर्षक ठीक ही दिया है। किंतु यह भी एक तथ्य है कि जब भी इस औजार का विवेकपूर्ण उपयोग हुआ है,साहित्य,समाज और संस्कृति के भले के लिए किसी चिकित्सक के औजारों की तरह इस्तेमाल हुआ है,यही सोशल मीडिया अपनी अलग और सकारात्मक भूमिका में भी दिखाई देता है। झूठ की वाट्स एप यूनिवर्सिटी के प्रपंच को छोड़ दें तो मुख्य मीडिया के समांतर इस वैकल्पिक माध्यम का खासा असर अब सहजता से स्वीकार भी किया जाने लगा है।


इतिहास लेखन में उस समय के साहित्य में इतिहासकार तत्कालीन सच्चाइयों और स्थितियों के सूत्र तलाशते हैं। भविष्य में जब भी नया इतिहास लेखन होगा तब भी पुस्तकें पढ़ी जाएंगी। राजशेखर चौबे जी की किताब में इस दौर की कई ऐसी बातें शामिल हैं जिनसे आज की स्थितियों,परिस्थितियों,नीतियों,मूर्खताओं और विडंबनाओं की झलक अवश्य उपलब्ध होगी।

कोरोना महामारी के दौर के समय के कई प्रसंग, राजनेताओं के आचरण, बेढंगी आर्थिक नीतियां और समाज और प्रशासन में व्याप्त आडंबर, पाखंड और भ्रष्टाचार पर चौबे जी ने अपने तरीके से जन प्रतिरोध की सामूहिक आवाज में अपना ईमानदार सुर भी मिलाया है।

श्री राजशेखर चौबे जी को इस व्यंग्य संग्रह के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।


(व्यंग्य संग्रह : निठल्लों का औजार सोशल मीडिया, लेखक : राजशेखर चौबे, प्रकाशक : वंश पब्लिकेशन,भोपाल, मूल्य : 250 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो





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