पुस्तक चर्चा :
भोंगपुर 30 कि. मी. : दिलचस्प व्यंग्य उपन्यास
ब्रजेश कानूनगो
मैं यह अपनी पाठकीय चेतना में कोई कमी ही मानता हूं कि श्री विनोद साव जी के वर्ष 2007 में आए व्यंग्य उपन्यास 'भोंगपुर 30 कि. मी.' को इतने वर्षों बाद पढ़ पाया।
रायपुर में हिंदी साहित्य एवं व्यंग्य संस्थान द्वारा मार्च 2023 में आयोजित परसाई सम्मान कार्यक्रम में दुर्ग निवासी वरिष्ठ व्यंग्यकार विनोद साव जी से आत्मीय भेंट हुई तो इस पुस्तक का स्नेह उपहार दे कर उन्होंने मुझे संपन्न कर दिया।
हमारे हिंदी पाठक जगत में आमतौर पर यह होता रहता है कि किसी भी विधा के चार पांच नाम ही बाजार में तैरते रहते हैं। नए पाठकों द्वारा पुस्तकें भी उन्ही की खरीदी,पढ़ी जाती रहती हैं। चर्चा में भी कुछ ही प्रमुख शीर्षक बने रहते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि अन्य कई प्रतिभा संपन्न रचनाकार अपने बेहतरीन काम में लगे होते हैं।
श्री विनोद साव सदा से एक बेहतरीन व्यंग्यकार रहे हैं। यही कारण है कि 2007 में इस उपन्यास के आने के समय तक ही उनके चार व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। उनकी रचनाएं पहल, ज्ञानोदय,वागर्थ, अक्षर पर्व,समकालीन भारतीय साहित्य, लोकायत जैसी साहित्य की प्रमुख पत्रिकाओं में लगातार छप रही थीं, पत्र पत्रिकाओं के स्तंभ लेखन से अब भी यह क्रम जारी है। अट्टहास,वागीश्वरी,जगन्नाथ राय शर्मा पुरस्कारों से हुआ सम्मान भी उनकी रचनात्मक गुणवत्ता और श्रेष्ठता का एक ईमानदार प्रमाण भी है।
यद्यपि हाल ही में मैंने समग्र रूप से 'भोंगपुर...' पढ़ा है लेकिन बरसों से उनकी व्यंग्य रचनाओं को पढ़ता आया हूं। उनकी वैचारिकी मेरी अपनी समझ से बहुत निकट बैठती है। व्यंग्य के प्रति उनका दृष्टिकोण और सटीक निर्वाह हमें बहुत प्रभावित करता है।
छत्तीसगढ़ के दुर्ग शहर और उससे 30 किलोमीटर दूर भोंगपुर जैसे देहाती क्षेत्र के इर्द गिर्द शिक्षण संस्थाओं और विद्यार्थियों के बीच की रोचक स्थितियों और अटपटे आचरण के माध्यम से पूरा कथाक्रम भले ही चलता है किंतु हर प्रसंग अपने आपमें संक्षिप्त होकर भी सटीक व्यंग्य की पूर्णता का निर्माण करता है। रोजमर्रा की गतिविधियों के निरीक्षण को साव जी ने बहुत ही दिलचस्प शब्दों में, कई जगह ठेठ देशज संदर्भों में बहुत ही खूबसूरती से चित्रित किया है। उनकी अभिव्यक्ति में उनके नाम के अनुरूप विनोद तो होता ही है किंतु व्यंग्य की तीक्ष्णता या धार भी बनी रहती है। चलें गांव की ओर के पथ पर चलते हुए लेखक पाठकों को दुर्ग, भोंगापुर के रास्ते शिक्षण व्यवस्था, विद्यालय के भीतर और वहां के वातावरण के भीतर तक ले जाकर व्यापक मूर्खताओं, चालाकियों,तिकड़मों,बदमाशियों,राजनीतिक कुटिलताओं के आस्वाद से रूबरू करवाने में सफल होता है।
उपन्यास को पढ़ते हुए हम अपने आपको छत्तीसगढ़ के कस्बाई माहौल के बीच पाते हैं,उसे जीने लगते हैं। यही इस उपन्यास की विशेषता कही जा सकती है कि इसे बहुत गहरे उतर कर बहुत मजे लेकर रचा गया है। इसकी भाषा और रोचक निर्वाह ही इसकी वह सहजता भी है जिससे पाठक भी मजे लेकर इसे पढ़ता जरूर है लेकिन व्यंग्य की भीतरी बनावट उसे उद्वेलित करती है।
यदि पाठकों ने इसे अब तक नहीं देखा पढ़ा है तो अवश्य ही इसे ढूंढ कर अवश्य पढ़ लें। मेरे जैसा विलंब न कर दें। वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री विनोद साव जी को इस रचना के लिए बधाई देता हूं। शुभकामनाएं।
( व्यंग्य उपन्यास : भोंगपुर 30 कि. मी., लेखक: विनोद साव, प्रकाशक : पंकज बुक्स,दिल्ली, मूल्य :150 रुपए हार्डबाउंड 2007)
ब्रजेश कानूनगो
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