गिद्धों का प्रजातंत्र : खरा खरा साहसी व्यंग्य
व्यंग्य संग्रह ' गिद्धों का प्रजातंत्र ' वरिष्ठ व्यंग्यकार श्रीयुत श्रीकांत चौधरी जी का पहला किंतु अदभुत संग्रह है। उम्र के 76 वर्ष पूर्ण किए और पचास वर्षों से लगातार लिख रहे श्री चौधरी की प्रकाशित इस कृति की रचनाएं जल्दबाजी में पढ़ने लायक नहीं हैं। रोके रखती हैं। लंबे समय तक हमें भीतर तक झकझोडती रहती हैं। छोड़ती ही नहीं कि अगली की ओर बढ़ा जा सके। समय की विडंबनाओं और मूर्खताओं को समेटे हुए हमारी नागरिकता और विवेक पर सीधे प्रहार करती हैं। प्रबुद्ध पाठक भी हतप्रभ हो जाता है,गुस्से और असहायता से भरने लगता है। एक तरह से इन रचनाओं में वह लेखकीय साहस और बेबाकपन दिखाई देता है जो वर्तमान दौर में प्रायः खुलकर न कह पाने या बच बचाकर निकल जाने वाली विधा की सुरक्षित पगडंडी पर नहीं होता। चौधरी व्यंग्य के राजपथ पर इंकलाब का नारा बुलंद करते हुए बेखौफ गुजरते हैं। नागरिकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। झूठ और पाखंड के मुखौटों को हटाते हैं और कोशिश करते हैं कि आंखें मूंदे या जमीन में मुंह गड़ाए लोग सच्चाई से रूबरू हों।
श्रीकांत जी का कहना है, 'संग्रह में आज से 40 साल पहले लिखी गई व्यंग्य रचनाएं भी शामिल हैं आज भी कम से कम डेढ़ सौ व्यंग्य रचनाएं, लघुकथाएं रखी हुई हैं जिन्हें प्रकाशित नहीं करवाया। अब वक्त नहीं है ना इच्छा, लिखना छोड़ नहीं सकता। जो नैसर्गिक लेखक होगा, संवेदनशील व्यक्ति होगा और बुद्धिजीवी भी, तो फिर वह राजनीति हो या धर्म या व्यक्तिगत या सामाजिक जहां कुछ गलत असंगत और अनुचित अन्यायपूर्ण लगेगा, वह अपनी सीधी सीधी या फिर व्यंग्य में प्रतिक्रिया जरूर करेगा, चुप नहीं बैठेगा।'
संग्रह की रचनाओं को पढ़ते हुए लेखक की यह चेतना महसूस की जा सकती है। भूतकाल और वर्तमान की राजनीतिक बेहूदगियों पर उन्होंने प्रहार किए हैं। कई बार व्यंजना के परदे को चीरते हुए उनकी रचनाएं सीधे सीधे लक्ष्य को भेदती हैं,चोट पहुंचाती हैं। मूक नागरिक और बेबस पाठक के भीतर की आवाज बन जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो वे शासन,सरकार के शीर्षजनों को खरी खरी सुनाती हैं। श्रीकांत चौधरी जी की व्यंग्य रचनाओं की यही खासियत है,वे गुदगुदाने की बजाए जरूरी आक्रोश को जन्म देने का प्रयास कर पाठक को उद्वेलित करती हैं।
गिद्धों का प्रजातंत्र संग्रह में चौधरी जी ने कई शैलियों में व्यंग्य लिखे हैं।निबंध,साक्षात्कार,फेंटेसी और लघु व्यंग्य कथाएं इसमें शामिल हैं। रचनाएं लंबी भी हैं और कुछ स्तंभ लेखन की शब्द सीमाओं के अधीन भी,लेकिन अपने विषय का समुचित निर्वाह करती हैं। विषय कोई भी रहा हो,लेखक एक जागरूक नागरिक की अपनी राजनीतिक,सामाजिक दृष्टि से तनिक भी विचलित नहीं हुए हैं।
यद्यपि वरिष्ठ व्यंग्यकार डा प्रेम जनमेजय ने पुस्तक की भूमिका में लेखक की रचनात्मकता और पुस्तक प्रकाशन के पीछे की उनकी व्यक्तिगत प्रवृत्ति के साथ विधागत विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डाला है, तथापि स्वयं लेखक ने 'था तो बहुत कहने को लेकिन...' शीर्षक से अपनी बात कही है। यह आलेख श्रीकांत चौधरी जी के सम्पूर्ण कृतित्व और व्यक्तित्व को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मेरा आग्रह रहेगा कि सबसे पहले इसे ही पढ़ा जाना चाहिए।
संग्रह के आलेखों से मैं प्रायः उदाहरणार्थ अंश उद्धृत नहीं करता, उनकी आत्मा तक पहुंचने की कोशिश रहती है। यही यहां भी किया है। पाठक इस संग्रह को पढ़ेंगे तो न सिर्फ समय की विडंबनाओं, मूर्खताओं,छद्मताओं,पाखंडों को उधड़ता पाएंगे बल्कि एक संवेदनशील लेखक के आक्रोश और ईमानदार साहसी लेखन को भी जान सकेंगे। श्री श्रीकांत चौधरी जी को बहुत बधाई।
(पुस्तक : गिद्धों का प्रजातंत्र, व्यंग्यकार : श्रीकांत चौधरी, प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स प्रा लि, नोएडा, कीमत : 275 रुपए)
ब्रजेश कानूनगो
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