Tuesday, May 30, 2023

भिया के तेजस्वी पंखे

स्थानीय तेवरों में व्यंग्य की गुनगुनी मार : भिया के तेजस्वी पंखे 


भूपेंद्र भारतीय के पहले व्यंग्य संग्रह 'भिया के तेजस्वी पंखे' शीर्षक देखकर कोई यह भी समझ सकता है कि भैया यह कौनसा पंखा है जो इतना तेजस्वी है? यदि स्वयं पंखे में इतनी तेजस्विता है तो फिर वह गर्मियों में किसी बंदे को ठंडक किस तरह पहुंचा पाता होगा? दरअसल मालवा के छोटे कस्बों में गली मोहल्ले की भाषा में छूट भैय्या नेताओं के पिछलग्गुओं को कहीं छर्रे और कहीं पंखे संबोधन से भी पुकारा जाता है। ऐसे ही कुछ देशज और बोलचाल में प्रयुक्त होने वाले शब्दों और ठेठ स्थानीय तेवरों में व्यंग्य और हास्य का तड़का लगाना भूपेंद्र भारतीय के लेखन की एक विशिष्ठ पहचान कही जा सकती है। 


भूपेंद्र भारतीय के व्यंग्य संग्रह की पांडुलिपि पढ़ते हुए वर्तमान में बहुतायत से सामने आ रहे व्यंग्य लेखन पर कुछ बातें कहने का मन हो रहा है। इस संग्रह की भूमिका लिखने की पृष्ठभूमि में इनकी चर्चा होना न सिर्फ प्रासंगिक होगा बल्कि वर्तमान दौर में स्तंभ लेखन में आने वाली रचनाओं के संदर्भ में भी संभवतः विमर्श की दृष्टि से भी उपयोगी होगा। 


पत्र पत्रिकाओं में इन दिनों सामान्य पाठकों की रुचि के लेखों को खूब स्थान मिल रहा है। चर्चित विषयों पर रोचक सामग्री को ध्यान में रखकर कुछ पत्रों में हास्य,विनोद और व्यंग्य स्तंभ नियमित रूप से प्रकाशित किए जाते हैं। व्यंग्य,विनोद अथवा किसी अन्य शीर्षक से इन्हे वर्गीकृत किया जाता है। अधबीच, खरी खरी, तिरछी नजर, तरकश,नश्तर,तीखी नजर  आदि कुछ ऐसे ही अखबारी स्तंभ हैं जिनमें दिलचस्प आलेखों को स्थान मिलता रहता है। कई बार इनमें ऐसे लेख भी छपते हैं जो साहित्य की व्यंग्य विधा में गुणवत्ता की कसौटी पर शायद उतने खरे नहीं कहे जा सकते किंतु इन रचनाओं में जो सबसे महत्वपूर्ण बात होती है वह यह कि इनकी विषयवस्तु अधिकांशतः अखबारों की सुर्खियों अथवा किसी चर्चित प्रसंग,तात्कालिक सामाजिक विसंगति पर केंद्रित होती है। इनमें सामयिक घटनाओं और प्रसंगों पर कटाक्षपूर्ण या व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया,टिप्पणी अथवा परिहास सहजता से देखा जा सकता है। 


अखबारों के पाठकों के बीच ये काफी रूचि से पढ़े भी जाते हैं। कुछ पाठक तो सबसे पहले इन्हें ही पढ़ना पसंद करते हैं। इस व्यावसायिक समय में पत्र पत्रिकाओं से साहित्य पृष्ठ भले ही नदारद होते जा रहे हों मगर इन लघु टिप्पणियों की मांग बरकरार है। 


इसका एक अर्थ यह भी है कि सामयिक व्यंग्य लेखों की पठनीयता उनके तात्कालिक सन्दर्भों की वजह से अधिक हैं। यह भी सही है कि इनका पाठक वर्ग भी बड़ा है। कविता की तरह यह तंज यहां लागू नहीं होता कि 'कवि ही कविता पढ़ते हैं और कवि ही कविता लिखते हैं'।  सामयिक सन्दर्भों और विषयों पर लिखे गए की लोकप्रियता आम पाठकों में बहुत ज्यादा होती है। इनकी एक महत्वपूर्ण भूमिका यह भी है कि इन्ही को पढ़ते हुए पाठक गंभीर साहित्य और  व्यंग्य पढ़ने को लालायित होने लगता है।  


नए रचनाकारों के लिए यह स्तंभ लेखन एक कार्यशाला की तरह होता है जिसमे अभ्यास करते हुए वह अपने आपको मांजता है,बेहतर करने का प्रयास करता है। 


युवा रचनाकार भूपेंद्र भारतीय एक संवेदनशील, कस्बाई जीवन में पले बड़े  व्यक्ति हैं। पेशे से वकील हैं, महाविद्यालय में पढ़ाते भी हैं और पत्रकारिता में भी उनकी रुचि रही है। एक नागरिक के तौर पर गांव,कस्बे,देश,प्रदेश और समाज के बीच जो कुछ घटित होता है, उन पर उनकी जागरूक नजर हमेशा बनी रहती है। नीतियों, योजनाओं,घटनाओं, प्रसंगों, नेताओं के बयानों और समाज में जब भी कुछ अटपटा या असंगत महसूस होता है, उनकी कलम व्याकुल हो उठती है। अभिव्यक्ति का सहज माध्यम अखबारों के वही स्तंभ होते हैं जो सामान्य पाठकों में बहुत लोकप्रिय हैं और पढ़े जाते रहे हैं। 


इस संग्रह की ज्यादातर रचनाएं पिछले तीन चार वर्षों में कोरोना महामारी के दौर में लिखी गई हैं, इसलिए इस कालखंड में घटित विषयों पर पर्याप्त रचनाएं इस संकलन में शामिल हैं। कुछ में साहित्य संसार को भी लक्ष्य किया गया है। कुछ रचनाओं में राजनीतिक बेहुदगियों के संदर्भ में चुटीली टिप्पणियां है। कुछ ज्वलंत मुद्दों मसलन  आरक्षण और जातिवाद पर भी युवा लेखक अपने विचार व्यक्त करते हैं। यद्यपि कुछ रचनाओं से पाठकों को वैचारिक असहमति या मतांतर भी हो सकता है, बावजूद इसके लेखक को अपने दृष्टिकोण से विषय को समझने और अपनी तरह से निर्वाह की स्वतंत्रता मिलना ही चाहिए। ज्यादातर रचनाओं में भूपेंद्र विषय को रोचकता से निभाने में सफल हुए हैं। यद्यपि विषयों में कई जगह दोहराव भी हुआ है लेकिन पठनीयता बांधे रखती है। 


मुझे लगता है व्यंग्य विधा के सागर से मोती ढूंढ लाने में कुशल गोताखोरी के लिए तैराकी में इस तरह का नियमित अभ्यास बहुत जरूरी होता है। व्यंग्य लेखन में भूपेंद्र बहुत ईमानदारी से यह प्रयास और अभ्यास करते दिखाई देते हैं। 


जैसा मैंने आरंभ में कहा है उनकी कुछ रचनाओं में देशज शब्दों और स्थानीय लहजे का प्रयोग रचना को अलग पहचान देता है। रचनाओं में कुछ हद तक चुटकियां,हास्य,व्यंजना, कटाक्ष है लेकिन सामान्यतः वे तीखा प्रहार नहीं करते। रंजक टिप्पणियां जरूर करते हैं। 


हमें विश्वास है लेखक व्यंग्य के औजारों पर थोड़ी धार अधिक तेज करेंगे और व्यंग्य भाषा को संवारते रहेंगे। लेखन में सामाजिक सरोकारों और नागरिक बोध से भरी उनकी व्यंग्य दृष्टि लगातार बेहतर रचने की आकांक्षा और संकल्प के साथ व्यंग्य सागर से अनेक मोती चुन लाने में अवश्य सफल होगी। भूपेंद्र भारतीय की यह पहली किताब है। संग्रहित आलेखों को उसी नजरिए से पढ़ा जाना चाहिए। 

इस संग्रह की रचनाएं स्तंभ लेखन की सीमाओं के बावजूद खासा प्रभावित करती हैं। रचनाओं को पढ़कर हमें उनसे और भी शानदार रचनाओं की उम्मीद बंध जाना स्वाभाविक है।  व्यंग्य संग्रह ' भिया के तेजस्वी पंखे ' के लिए उन्हें हार्दिक बधाई और बेहतरीन लेखन के लिए शुभकामनाएं... 


ब्रजेश कानूनगो




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