Monday, June 12, 2023

पुस्तक चर्चा : लोकतंत्र का स्वाद

पुस्तक चर्चा :

लोकतंत्र का स्वाद

पिछले दिनों ऐसा योग बैठा कि छत्तीसगढ़ के व्यंग्यकारों की पुस्तकों से गुजरता रहा। सर्वश्री विनोद साव, राजशेखर चौबे और वीरेंद्र सरल की रचनाएं पढ़ने के बाद अब छत्तीसगढ़ की पहली महिला व्यंग्यकार स्नेहलता पाठक जी के व्यंग्य संग्रह 'लोकतंत्र का स्वाद' का आनंद उठाया है।

इससे पूर्व उनका पहला उपन्यास 'लाल रिबन वाली लड़की' गत वर्ष पढ़ा था। उस बढ़िया उपन्यास पर अपनी पाठकीय टिप्पणी लिख भी चुका हूं। आज उनके नवीनतम व्यंग्य संग्रह के प्रभाव में हूं।

स्नेहलता पाठक जी काफी पुरानी और वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं। उनकी व्यंग्य रचनाओं को धर्मयुग जैसे प्रतिष्ठित और हिंदी की धरोहर पत्रिका के समय से पढ़ते रहे हैं।  संदर्भित संकलन को पढ़ते हुए सबसे पहले मुझे यही महसूस हुआ कि उनकी भाषा इतनी प्रवाहमय और आम है कि पाठक उसमे बहता चला जाता है। विसंगतियों और अटपटेपन के विषयगत रोड़े भी स्निग्धता में लुढ़कते रहते हैं। उनके कटाक्ष भी कई बार विनोद की चाशनी से सरोबार रहते हैं। व्यंग्य होते हुए भी वह चुभता नहीं लेकिन काम कर जाता है। शायद स्नेहलता जी की इसी भाषा को रेशमी दुशाला कहते होंगे, जिसके भीतर व्यंग्य की चर्म पादुका छुपी होती है।

दूसरी खास बात मुझे लगी वह यह कि स्नेहलता जी की रचनाओं में राजनीति और राजनीतिक विषयों पर व्यंग्य तो होता है लेकिन उन्हें राजनीतिक व्यंग्य की श्रेणी में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। वे राजनीतिक व्यंग्यकार नहीं हैं, वे एक सामाजिक व्यंग्यकार के रूप में नजर आती हैं जो प्रत्येक क्षेत्र की विसंगतियों को चाहे वह आर्थिक हो, टेक्नोलॉजिकल हो, राजनीतिक हो या दैनंदिनी की कोई साधारण पारिवारिक प्रसंग से निकलकर आई हो, स्नेहलता जी उसे अपनी आम सामाजिक,पारिवारिक दृष्टि से परखती हैं और लोकप्रिय शब्दावली में बहुत स्वीकार्य भाषा में आम पाठकों को परोसने में सफल हो जाती हैं। वे बहुत पठनीय होती हैं,बांधे रखती हैं, उनका पाठक वर्ग इसीलिए काफी बढ़ जाता है, और लोकतंत्र का जायका उनकी रचनाओं में रिसने लगता है। पहली ही रचना मेरा देश बदल रहा है या शीर्षक रचना लोकतंत्र का स्वाद जैसी कई अन्य रचनाओं को पढ़कर इस बात की पुष्टि की जा सकती है,जब हम आनंद से भी भर जाते हैं।

फेसबुक प्रेम का तहलका,त्रासदी व्यंग्य लेखिका के पति की,सफेद बालों का सुख ,व्यंग्यकार के घर में लक्ष्मी जैसी कई रचनाएं स्नेहलता जी ने परिवार या अपने आसपास के जीवन से विषय चुनकर बड़े मजे लेकर लिखीं हैं। पाठक को खूब गुदगुदाती हैं और आपबीती सी लगने लगती हैं। ऐसी और भी कई विनोदपूर्ण रचनाएं संकलन में शामिल हैं।

यद्यपि भूमिका में डॉ संजीव कुमार ने बहुत विस्तार से व्यंग्य लेखन पर बात करते हुए स्नेहलता जी की रचनाओं पर बहुत सटीक और विश्लेषणात्मक टिप्पणी की है। इससे बेहतर और कुछ कोई क्या कहेगा तथापि रचनाओं को पढ़कर मेरे भीतर जो ऊपर कही गई खूबियां का अहसास मुझे हुआ उसे स्नेहलता जी की इस पुस्तक का डीएनए भी कहा जा सकता है।

पाठकों को लोकतंत्र का असली स्वाद लेने के लिए इस किताब को अवश्य खरीद लेना चाहिए।वे निराश नहीं होंगे। आदरणीय स्नेहलता पाठक जी को इस संग्रह के लिए बहुत बधाई और शुभकामनाएं।

(व्यंग्य संग्रह : लोकतंत्र का स्वाद, लेखिका : स्नेहलता पाठक, प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स प्रा. लि.,मूल्य : 350 रुपए )

ब्रजेश कानूनगो



No comments:

Post a Comment