Wednesday, August 23, 2023

जवाहर चौधरी के चर्चित व्यंग्य : फूलों पर नहीं कीचड़ पर लिखी रचनाएं !

जवाहर चौधरी के चर्चित व्यंग्य : फूलों पर नहीं कीचड़ पर लिखी रचनाएं !

'आप फूलों पर लिखा करो यार। आते ही उन्होंने आदेश सा दिया।

फूलों पर ही क्यों?

क्योंकि फूल भी है संसार में। खिल रहे हैं चारों तरफ। सरकार पर ही भिड़े रहोगे तो फूलों पर कौन लिखेगा?  कवियाें और लेखकों को प्रकृति प्रेमी होना चाहिए। लगा कुछ नाराज हैं।

ऐसा ही है भाईजी, लेखक वो लिखता है जो प्राथमिक रूप से जरूरी समझता है।

अपने को सुधारो जरा। नजरों में खोट हो तो आदमी बुरा बुरा ही देखता है। अच्छी नजरें वह होती हैं जो कीचड़ में भी कमल को ही देखते हैं।'


उपर्युक्त व्यंग्यांश वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री जवाहर चौधरी जी के नए व्यंग्य संग्रह 'चर्चित व्यंग्य रचनाएं' की एक रचना से उद्धरित किया है। जवाहर चौधरी जी के इस नवीनतम संग्रह में पिछले कुछ समय में लिखी गईं वे रचनाएं हैं जो बहुत चर्चित रचनाएं तो हैं लेकिन उन विषयों पर खुले तौर पर पाठक बात करने में कतरा सकता है। लेखक को सलाह भी दे सकता है कोई शुभचिंतक कि भाई क्यों खतरा मोल ले रहे इन विषयों पर लिखकर। क्यों आ बैल मुझे मार करके ट्रोलरों को न्योता दे रहे हो। लिखना ही है तो फूलों पर लिखो,और लोग भी यही कर रहे हैं।


बहरहाल, जवाहर चौधरी सच्चे और पक्के व्यंग्यकार हैं और उन्होंने समकाल की विडंबनाओं और पाखंड के तात्कालिक प्रसंगों,आचरणों और मूर्खताओं से भरे विषयों पर कलम चलाई है। कुछ रचनाएं पत्र,पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं तो कुछ उनके सोशल मीडिया के पाठकों तक पहुंच कर बहुत चर्चित हुई हैं। ये चर्चित रचनाएं हैं पर उनके पुराने समग्र व्यंग्यकर्म से चयनित होकर नहीं आई हैं। वे बिल्कुल ताजा और चर्चित रचनाएं ही हैं।


वर्तमान समय में किसी भी सत्ता शीर्ष पर बैठे व्यक्तियों और उनकी चालाक हरकतों या प्रवृत्तियों की विसंगति और अटपटेपन पर कटाक्ष अथवा व्यंग्य रचना बहुत कम लोगों के लेखन में अब शामिल है। यह साहस का काम है बल्कि कुछ संदर्भों में दुस्साहस भी कहा जा सकता है। इन रचनाओं में यह जोखिम उठाकर व्यंग्यकार ने व्यंग्य विधा का प्रतिबद्ध सिपाही होने का प्रमाण प्रस्तुत किया है। व्यंग्यकार और रचनाओं की यही ताकत भी है जो इन्हें चर्चित होने का विशेषण प्रदान करती हैं।


इसके साथ ही चौधरी जी समाज के अन्य क्षेत्रों की विसंगतियों और नागरिकों की अपनी मूर्खताओं और बेढंग आचरणों पर व्यंग्य करने में कभी भी चूकते नहीं हैं। चौधरी जी अपनी रचनाओं में समाज सरोवर में खिले हुए कमल पर आकर्षित या मुग्ध नहीं होते बल्कि तालाब की गंदगी और कीचड़ पर उनकी नजर जाती है।  वे उसे साफ करना चाहें भी तो कर नहीं सकते किंतु व्यंग्य की रचनात्मक टॉर्च से उस अंधेरे की ओर इशारा जरूर करते हैं।


जवाहर चौधरी कहानीकार और नाटककार भी हैं। उनकी व्यंग्य रचनाओं में इन विधाओं के तत्व बहुत शिद्दत से शामिल होते हैं। उनके अधिकतर व्यंग्य संवाद प्रधान होते हैं। भाषा में स्थानीयता, मिमिक्री और रोचकता की खासी गुंजाइश होती है। कुशल नाट्य वाचक उनकी रचनाओं को प्रभावी रूप से श्रोताओं के सम्मुख प्रस्तुत कर सकता है। इन सभी रचनाओं में यह खूबी रही है। संग्रह को पाठक इस बात को ध्यान में रखकर पढ़ता है तो चौधरी जी की अभिव्यक्ति का कायल हुए बगैर रह ही नहीं सकता।

मुझे विश्वास है, प्रबुद्ध पाठक इस नए व्यंग्य संग्रह को पढ़कर निसंदेह उद्वेलित होगा। बहुत बधाई और शुभकामनाएं रचनाकार श्री जवाहर चौधरी जी को।


( पुस्तक : चर्चित व्यंग्य रचनाएं, लेखक : जवाहर चौधरी, प्रकाशक : अद्विक पब्लिकेशन,दिल्ली, कीमत : 200 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो



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