पुस्तक चर्चा :
तुम चंदन हम पानी : व्यंग्य स्प्रिट की रचनाएं
ब्रजेश कानूनगो
'तुम चंदन हम पानी' छत्तीसगढ़ के बोडरा जैसे छोटे से गांव में शिक्षक के रूप में कार्यरत तथा चुपचाप अपने रचनाकर्म में रत श्री वीरेन्द्र सरल का नवीनतम और चौथा संग्रह है। इस संग्रह का विमोचन हाल ही में रायपुर में हिंदी साहित्य एवं व्यंग्य संस्थान द्वारा आयोजित परसाई सम्मान समारोह में हुआ है। व्यक्तिगत रूप से वहीं उनसे भेंट हुई थी, उनकी सादगी और सरलता से परिचित भी हुआ था। उसी कार्यक्रम में मुझे उन्होंने यह व्यंग्य संग्रह स्नेहपूर्वक भेंट किया था। अब संग्रह की रचनाएं पढ़ने के बाद उनकी रचनात्मकता से भी प्रभावित होना स्वाभाविक ही था।
संदर्भित संकलन में उनकी कुल पच्चीस व्यंग्य रचनाएं शामिल हैं। व्यंग्य के विषय निश्चित ही देश दुनिया और समाज की उन्ही तात्कालिक विसंगतियों,आचरण और अटपटे प्रसंगों से निकलकर आते हैं किंतु इन रचनाओं को उस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता जो प्रतिदिन पत्र पत्रिकाओं में मात्र व्यंग्य की खानापूर्ति के लिए लिखा और छापा जाता है। भले ही संग्रह की कुछ रचनाएं अखबारों के तथाकथित व्यंग्य स्तंभों में प्रकाशित हुई होंगी किंतु इनमें व्यंग्य की वह चमक अलग से नजर आ जाती है, जिसमें मनुष्य और समाज के प्रति लेखक के सरोकार और विडंबनाओं के कारण भीतर का उद्वेलन और आक्रोश,दुख व्यंजना के रूप में रिसता है।
वीरेंद्र सरल की भाषा शैली भी स्तंभ लेखन से अलहदा है। अपनी रचनाओं को वे शब्दों की सीमा में बांधने का प्रयास नहीं करते। खुलकर विस्तार देते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनका विश्वास रचनाओं में व्यंग्य को विधा की बजाए उसे स्प्रिट के रूप में शामिल करने का रहता है। आलेख की तरह शुरू करते हुए भी वे कहानी की ओर मुड़ जाते हैं। यह गौरतलब और प्रशंसनीय भी है कि निबंध या आलेख की तुलना में किस्सागोई या कहानी पाठक को ज्यादा रुचिकर और ग्राह्य होती है। संग्रह में सरल जी की अधिकांश रचनाएं या तो कहानी की तरह हैं या आगे बढ़ते बढ़ते कहानी में बदलती जाती है। ज्यादातर रचनाएं लंबी हैं लेकिन बांधे रखती हैं। इन्हे पढ़ते हुए लगता है कि वीरेंद्र सरल को उपन्यास की दिशा में भी अपने कदम बढ़ाना चाहिए।
आमतौर पर मैं किसी पुस्तक पर अपनी टिप्पणी में उदाहरण के लिए कोई अंश उद्धृत नहीं करता क्योंकि रचना में निहित संवेदना, अथवा उद्वेलन तो संपूर्ण रचना का आस्वाद लेने के बाद ही महसूस किया जा सकता है।
सरल जी की व्यंग्य रचना के संदर्भ में यह कहना ठीक ही होगा कि जब लेखक कोई स्टेंडअप कॉमेडी या किसी मंच के श्रोता की तालियों के लिए लिख ही नहीं रहा, विसंगतियों और विडंबनाओं,मूर्खताओं के प्रति उसके भीतर आक्रोश है,करुणा और दुख रिस रहा हो तब चुटकियों की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। यद्यपि वीरेंद्र सरल अपनी रचनाओं में चुटकियों, तंज,कटाक्ष और विनोदपूर्ण कथनों से कोई परहेज भी नहीं करते लेकिन वह सब व्यंग्य की रचनात्मक स्प्रिट में बहता चला आता है।
संकलन की रचनाओं में वीरेंद्र सरल ने वर्तमान समय के राजनीतिक और धर्म के नाम पर राजनीति के पाखंड पर भी प्रहार किया है तो सरकारी योजनाओं के भ्रष्टाचार को भी फेंटेसी प्रारूप में रेखांकित करने की कोशिश की है। कुछ रचनाएं इस संदर्भ में महत्वपूर्ण कही जा सकती हैं। वह चाहे योजना बहनजी हो या बाबागिरी के फायदे। एक रचना में केशलेस की तर्ज पर 'घोपलेस ' शब्द का प्रयोग कर वे चौका देते हैं। आगे पता चलता है उनका आशय 'घोषणा पत्र लेखक संघ' से है। अलग हटकर वे कई रचनाओं में दिखाई देते हैं। पूजा फ्रॉम होम, डाकू की शोक सभा, व्हाट्सएप ज्ञानमृत समूह, इंद्रलोक में नेता जीव आदि आदि। शीर्षक रचना तुम चंदन हम पानी भी अपने लक्ष्य तक पहुंचती है,इस वक्त में इसे एक जरूरी एवं साहसिक रचना भी कहा जा सकता है।
वीरेंद्र सरल ने अपने व्यंग्य और व्यंग्य के सरोकारी स्वरूप पर विनोदपूर्ण शैली में विनम्रता पूर्वक ' अपनी बात ' ईमानदारी से कही है। यह आलेख भी किसी व्यंग्य रचना से कम नहीं है।
किताब में ख्यात व्यंग्य आलोचक डा रमेश तिवारी जी की भूमिका और श्रवण कुमार उर्मलिया जी के शुभकामना संदेश से संग्रह समृद्ध हुआ है। ये दोनो आलेख सरल जी की रचनाओं तक ठीक से पहुंचने में पाठक की मदद करते हैं।
निश्चित ही वीरेंद्र सरल के इस व्यंग्य संग्रह का हिंदी व्यंग्य पाठक जगत में भरपूर स्वागत होगा। शुभकामनाएं।
(व्यंग्य संग्रह : तुम चंदन हम पानी, लेखक : वीरेंद्र सरल, प्रकाशक : कल्पना प्रकाशन,दिल्ली, मूल्य : 450 रुपए ,हार्ड बाउंड)
ब्रजेश कानूनगो
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