पिता के साये में जीवन : संवेदनाओं से भरी कविताएं
सोशल मीडिया पर यों तो अनेक साहित्य समूह सक्रिय हैं जहां नियमित रचनात्मक चर्चाएं,कार्यशालाएं और विमर्श और नई पुरानी रचनाओं का प्रसारण और टिप्पणियां होती रहती हैं लेकिन जिन चंद समूहों में बहुत अनुशासित और नवोन्मेष तरीकों से यह सब होता है उनमें 'साहित्य की बात ' याने ' साकीबा ' को बहुत मान्यता मिली है।
इस समूह के भौतिक रूप से भी वार्षिक कार्यक्रम होते हैं,मिलन समारोह में सम्मान,पुरस्कार,रचनापाठ के अलावा पुस्तकों का विमोचन आदि भी होता है। विदिशा के सक्रिय समकालीन कवि श्री ब्रज श्रीवास्तव की अगुवाई वाले इस समूह में अनेक ख्यात, वरिष्ठ और युवा रचनाकार साथी जुड़े हुए हैं। समूह समय समय पर कई पुस्तकों के प्रकाशन का माध्यम बना है। पिछले वर्ष में मां पर लिखी कविताओं का एक संग्रह आया था, 'धरती होती है मां'। साहित्य जगत में इसका भरपूर स्वागत हुआ है। और अब हमारे हाथ में आया है पिता पर लिखी कविताओं का एक और महत्वपूर्ण संग्रह 'पिता के साये में जीवन'।
बोधि प्रकाशन जयपुर से आए इस संग्रह का संपादन कवि श्री ब्रज श्रीवास्तव ने किया है। संपादन सहयोगी हैं कवयित्री सुश्री खुदेजा खान और मधु सक्सेना जी।
संग्रह में कुल सत्तावन कवियों की कविताओं को पांच खंडों में प्रस्तुत किया गया है। संपादन की यह रचनात्मक और नवोन्मेषी पहल है कि इन पांच खंडों को महत्वपूर्ण कवियों की किताबों के शीर्षकों ,काल तुझे होड़ है मेरी, उदाहरण के लिए, कविता की पुकार, जमीन पाक रही है, नए इलाके में से सजाया गया है। यह न सिर्फ अपने वरिष्ठों को मान और आदर देने का यह वंदनीय और अनुकरणीय प्रयास है बल्कि इससे खंड में शामिल कविताओं के रचनाकारों का भी एक संदर्भ बनता है।
जहां इस किताब के विभिन्न खंडों के शीर्षकों के जरिए सर्वश्री नरेंद्र जैन,शमशेर बहादुर सिंह,अरुण कमल,शलभ श्रीराम सिंह,और केदारनाथ सिंह की उपस्थिति है वहीं शामिल कविताओं से सर्वश्री अज्ञेय,निराला, भवानी प्रसाद मिश्र, विष्णु खरे,मंगलेश डबराल,कुमार अंबुज जैसे महत्वपूर्ण समकालीन कवि पुस्तक की आभा में वृद्धि कर रहे हैं।
संग्रह के सभी कवियों की कविताओं में पिता,पितृत्व और उससे जुड़ी संवेदनाएं अभिव्यक्त हुई है जो पाठकों के भीतर इस कठिन समय में अपने पिताओं को कई अलग अलग कोणों से जानने,समझने,महसूस करने को जागृत कर देती हैं।
मां पर केंद्रित किताब के बाद पिता पर केंद्रित यह किताब एक पूर्णता देती है। सुकून देती है।
साहित्य की बात समूह की प्रकाशन श्रृंखला में श्री नरेश अग्रवाल जी ने अपनी माताजी श्रीमती गायत्री देवी के सहयोग से इस पुनीत कार्य को साकार किया है। उनका अभिनंदन है। इस किताब के सुंदर आवरण के लिए प्रस्तर कला की जानी मानी कलाकार और कवयित्री सुश्री अनीता दुबे जी को साधुवाद।
(पुस्तक: पिता के साये में जीवन, संपादन : ब्रज श्रीवास्तव, उप संपादक: खुदेजा ख़ान, सह संपादक: मधु सक्सेना, प्रकाशक : बोधि प्रकाशन,जयपुर, कीमत: ₹ 225/ )
समीक्षक : ब्रजेश कानूनगो
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