Saturday, January 6, 2024

व्यंग्य के वायरस

व्यंग्य के वायरस :

वायरस नहीं लंबी रेस का घोड़ा है व्यंग्यकार

युवा व्यंग्यकार ऋषभ जैन की रचनाएं यद्यपि पत्र पत्रिकाओं में पढ़ने को मिलती रही हैं किंतु हाल ही में भावना प्रकाशन से आया उनका नवीनतम व्यंग्य संकलन 'व्यंग्य के वायरस' हाथ में आया है। ऋषभ की व्यंग्य दृष्टि और उनकी व्यंग्य भाषा ने खासा प्रभावित किया है।


मेरा मानना रहा है कि भाषा के विद्यार्थी या अध्येता की बजाय विज्ञान अथवा अन्य तकनीकी क्षेत्रों से लेखन में आए व्यक्तियों में व्यंग्य दृष्टि और उसके निर्वाह की क्षमता अपेक्षाकृत अधिक संभव होती है। ऐसा भी नहीं है कि भाषा से आए लोगों ने अच्छा सृजन नहीं किया है किंतु अन्य क्षेत्रों विशेषकर विज्ञान,चिकित्सा,तकनीकी क्षेत्रों में कार्यरत लेखकों को एक विशेष नजरिया और अभिव्यक्ति का खास कौशल अतिरिक्त रूप से मिल जाता है। वे परीक्षण, विश्लेषण के बाद अभिव्यक्ति का जो तरीका या या शैली का चुनाव करते हैं उससे पाठक अधिक चमत्कृत होकर व्यंजना को सहज अनुभव करता है, प्रभावित होता है।

ऋषभ विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं। लेखा और लेखा परीक्षण उनकी आजीविका क्षेत्र है। संग्रह को पढ़ते हुए मेरी अपनी उक्त मान्यता को बल मिला कि उनका संग्रह मुझे इतना क्यों प्रभावित कर रहा।


'व्यंग्य के वायरस ' से पहले उनका एक संग्रह 'रंग रंगीला प्रजातंत्र' आ चुका है। लगातार अभ्यास और सीखते हुए निश्चित ही नवीनतम संग्रह को पिछले संकलन से बेहतर होना ही था। इस नए संकलन में कोराेना महामारी के दौर की विसंगतियों से संबंधित रचनाओं का आधिक्य है किंतु वे हमेशा प्रासंगिक इसलिए रहेंगी कि उनके भीतर जो कथ्य की आत्मा और समय का सच है उनमें सार्वकालिकता दिखाई देती है।


ऋषभ के लिखे में विविध विषयों मसलन इतिहास, दर्शन,राजनीति और प्रशासन तंत्र के अध्ययन और समझ का आलोक उसमें चमक और रोशनी पैदा करता है।


कुछ रचनाओं में ऋषभ जैन किस्सागोई करते नजर आते हैं। कुछ में विक्रम बेताल प्रारूप में भी अच्छी रचनाएं लाते हैं। निश्चित ही उनमें लंबी रचनाओं के सृजन की बड़ी संभावनाएं हैं। पहला व्यंग्य 'अतिशय रगड़ करें यदि नृप भी..' ही इस बात को पुष्ट कर देता है। ' परफ्यूम की सुडौल शीशी' जैसी अनेक रचनाएं ऋषभ जैन के कौशल को प्रमाणित करती हैं।


'फाड़ना मनुष्य का मूलभूत गुण', 'लो आकाश भी बिक गया', 'मंदी मंद होने की उम्मीद 'आदि जैसी कुछ रचनाएं अखबारों के सीमित स्पेस के लिए प्रकाशन के मोहवश भले लिखीं गई हों परंतु वे भी भीड़ से अलग तो हैं ही। फिर भी ऋषभ ऐसे मोह में न पड़ेंगे तो हिंदी व्यंग्य की दौड़ में बहुत आगे तक पहुंचने की ऊर्जा अर्जित कर अपनी पताका फहराने में निश्चित ही कामयाब होंगे। 


बहरहाल, 'व्यंग्य के वायरस' को पढ़ते हुए हिंदी व्यंग्य विकास और बेहतर भविष्य के संकेत मिलते हैं। हरेक रचना बहुत रोचक,पठनीय है और विडंबनाओं और समय की मूर्खताओं पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करने में सफल हुई है। व्यंग्यकार श्री ऋषभ जैन को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।




(पुस्तक : व्यंग्य के वायरस, लेखक : ऋषभ जैन, प्रकाशक : भावना प्रकाशन दिल्ली, कीमत: 425 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो

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