Wednesday, January 3, 2024

सुना है आप बड़े उल्लू हैं! प्रतीकों में व्यंग्य की चौरंगी छटा

सुना है आप बड़े उल्लू हैं!

प्रतीकों में व्यंग्य की चौरंगी छटा


सुना है आप बड़े उल्लू हैं! मैं यह पाठकों को नहीं सुना रहा. दरअसल यह डा तीरथ सिंह खरबंदा के पहले व्यंग्य संग्रह का दिलचस्प शीर्षक है जो हाल ही में इंडिया नेटबुक्स प्रा. लि. नोएडा से प्रकाशित होकर आया है. इस संग्रह में कुल बावन रचनाएं हैं जो अपने शीर्षक की तरह ही रोचक हैं और प्रभावित करती हैं.


व्यंग्य लेखन में तीरथ जी का प्रवेश यद्यपि देर से हुआ है लेकिन पूरी तैयारी और जीवन के तमाम अनुभवों को प्राप्त करने के बाद परिपक्वता के साथ हमारे सामने आता है. लेखक विधि विषय में पी एच डी हैं, चालीस वर्षों का बैंकिंग अनुभव रखते हैं, कर्मचारी संगठनों में काम किया है, शिक्षण और सामाजिक सक्रियता ने उन्हें चीजों को समझने का खास नजरिया दिया है. इसलिए बीते समय और वर्तमान समय के सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक वातावरण के बीच से उनकी सहज व्यंग्य दृष्टि रचनाओं में परिलक्षित होती है.


खरबंदा जी की प्रस्तुत रचनाओं में पशु पक्षियों व अन्य प्राणियों के प्रतीकों का खूब इस्तेमाल हुआ है. पंचतंत्र की कहानियों से प्रेरित होकर उस  प्रारूप में कई लेखकों ने व्यंग्य लिखे हैं लेकिन खरबंदा जी के व्यंग्य उनसे बिलकुल अलग हैं. उनकी रचनाओं में पंचतंत्र की कथाओं की तरह ये पात्र बनकर ये प्रतीक नहीं आते बल्कि व्यंजना और उपमा या लक्षणा के तौर पर व्यंग्य और उलटबांसी के रूप में शामिल होते हैं. उल्लू, तोते,घोड़े,चिड़िया,गधे,भैंस,कुत्ते आदि का प्रयोग दिलचस्प अंदाज में हुआ है. उनके रचना शिल्प में ये प्रतीक बड़े उपयोगी बन पड़े हैं. इसके अलावा वर्तमान दौर के विभिन्न क्षेत्रों में खासतौर से राजनीति के बलशाली और दबंग चरित्रों के लिए लेखक ने ' गब्बर सिंह ' जैसे लोकप्रिय खल प्रतीक का बहुत उम्दा उपयोग किया है. पाठक के समक्ष व्यंग्य का प्रयोज्य इन प्रतीकों से सहज अनुभूत होता चला जाता है.


ताश के बावन पत्तों की तरह इनमें व्यंग्य की चौरंगी छटा बिखेर दी गई है जिनमे कुछ में राजनीति का लाल रंग है, कुछ में सामाजिकता की ईंटे हैं, कुछ लेखों में साहित्य की चिड़ियाएं उड़ रही हैं तो कहीं कहीं काले पान की लताओं द्वारा तंत्र को हो रहे नुकसान पर प्रहार किया गया  है. व्यंग्यकार का विषय चयन विविधता से भरा है और भाषा में सहज प्रवाह और लय है. वह विषय से भटकते नहीं हैं. गैर जरूरी विवरण और दृश्य उनकी रचनाओं की पठनीयता को बाधित नहीं करता.

इस मायने में डा तीरथ सिंह खरबंदा का पहला ही व्यंग्य 'संग्रह सुना है आप बड़े उल्लू हैं!' एक परिपक्व और संतोष देने वाली कृति कही जाने में मुझे संकोच नहीं होता. भविष्य में भी उत्कृष्ट व्यंग्य रचनाओं का इंतजार प्रबुद्ध पाठकों को अवश्य रहेगा. बधाई और शुभकामनाएं.






(पुस्तक : सुना है आप बड़े उल्लू हैं!, लेखक : तीरथ सिंह खरबंदा, प्रकाशक : इंडिया नेट बुक्स, नोएडा, मूल्य : ₹250 मात्र)


समीक्षक : ब्रजेश कानूनगो

No comments:

Post a Comment