Tuesday, January 2, 2024

मज़ाक : विडंबनाओं पर व्यंग्य करती किस्सागोई

मज़ाक : विडंबनाओं पर व्यंग्य करती किस्सागोई


विधा कुछ भी हो, लेखक की दृष्टि महत्वपूर्ण होती है। कोई विषय कितना ही महत्वहीन मान लिया जाए किंतु वही जब किसी खास दृष्टि से विवेचित या वैचारिक विमर्श के साथ रचना से गुजरता है तो पाठक अचंभित होने को बाध्य हो जाता है। हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि कुमार अंबुज चाहे कविता में कहें या गद्य में, हर विधा में अपनी उक्त खूबी से कभी बेराह नहीं होते।


हाल ही में कुमार अंबुज का दूसरा कहानी संग्रह 'मज़ाक' आया है। इससे पहले 'इच्छाएं' शीर्षक से एक कहानी संग्रह पूर्व में प्रकाशित हुआ था। तब मैंने उनकी कहानियों को पढ़ते हुए कहा था कि ये एक तरह से कविताएं ही हैं। ' मजाक' की कहानियों से गुजरने के बाद मेरे स्वीकार्य में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है।


कुमार अंबुज की कहानियां बहुप्रचलित मुहावरे से अलग हैं। परंपरागत शैली पर अतिक्रमण करने की कोशिश सी लगती है,बल्कि कई जगह उसे ढहाने का उपक्रम करती दिखाई देती हैं। उनकी कहानियों में प्रसंगों और घटनाओं का क्रम होते हुए भी वह नहीं है। घटनाओं में भौतिकता से अधिक मन के भीतर का उद्वेलन है। वहां कहन में चमत्कार नहीं है बल्कि उनका अव्यक्त  बुद्धिमान पाठक को चमत्कृत करता है। कविता से निकलती ध्वनि की तरह इन रचनाओं से निकलती ध्वनि को हम आसानी से समझ सकते हैं। उनकी रचनाओं में उदासी है,निराशा है,दुख है, बेबसी की पीड़ा है लेकिन स्मृतियों से निकलती छोटी छोटी राहतें हैं। शायद वे इस तरह अपने आपको दिलासा भी देते हैं कि अभी उम्मीद बची हुई है।


प्रस्तुत संग्रह की रचनाओं के भीतर थोड़ा अधिक उतरकर समालोचक की तरह कहूं तो मैं इन कहानियों को कुछ ऐसे व्यंग्य निबंधों की तरह भी देखता हूं जिनमें अपने समय की विडंबनाओं  और औसत आदमी के जीवन में आई नई पेचदगियों की मार्मिक किस्सागोई है। ज्यादातर या बल्कि सभी रचनाओं में करुणा का ऐसा संचार होता है जिससे हम भीगते चले जाते हैं। व्यंग्यकार का काम भी यही होता है कि वह समाज में आई इन असहजताओं को रेखांकित करे। अंबुज यही करते हैं बल्कि वे अधिक बौद्धिकता के साथ सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक संदर्भों में विवेकशील रचनात्मक टिप्पणी प्रत्यक्ष या परोक्ष तरीके से कर रहे होते हैं।


संग्रह की सभी कहानियां बहुत प्रभावित करती हैं। खासतौर से मज़ाक, जीभी, गुम होने की जगह, मुझे किसी पर विश्वास नहीं रहा, स्फटिक,एक और जोड़ी जैसी कहानियां बहुत हद तक कुमार अंबुज के कथाकार और उनकी विशिष्टता को रेखांकित करती हैं। हिंदी का कथा साहित्य 'मज़ाक' संकलन की कहानियों से समृद्ध हुआ है। कवि,कथाकार,निबंधकार,विचारक मित्र कुमार अंबुज को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं!







(पुस्तक : मज़ाक, कथाकार : कुमार अंबुज, प्रकाशक : राजपाल एंड संस, दिल्ली, कीमत : 235/ रुपए )


ब्रजेश कानूनगो

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