Tuesday, January 2, 2024

रूदादे-सफ़र : मार्मिक फ़िल्म सा आनंद

रूदादे-सफ़र : मार्मिक फ़िल्म सा आनंद


कथाकार पंकज सुबीर का नया उपन्यास 'रूदादे-सफ़र' अंत तक पाठक को बाँधे रखता है। इसकी बेहद सहज भाषा ने इस उपन्यास की पठनीयता को इतना बढ़ा दिया है कि किसी फ़िल्म की बेहतरीन पटकथा की तरह हम कहानी में बहते चले जाते हैं। इसके यह मायने कतई नहीं हैं कि आम लोकप्रिय उपन्यासों की तरह इसमें गंभीर साहित्य के तत्व कम दिखाई देते हैं। पठनीयता में लोकप्रिय लेखन की ख़ूबियों के बावजूद इसमें संवेदनाओं की गहराई, समाज के तात्कालिक और समकालीन जीवन के उतार-चढ़ाव, रिश्तों की आत्मीयता को लेकर जो ताना-बाना बुना गया है, उससे साहित्य का गंभीर पाठक लेखक के कहन की गहराई और भावनात्मक अभिव्यक्ति का क़ायल हुए बगैर नहीं रह सकता।


दरअसल, पंकज सुबीर के उपन्यासों में समाज की रोज़मर्रा की कहानी के बावजूद कुछ ऐसा अलग और विशिष्ट भी होता है जिसके विषय में आम पाठक को पहले से ज़्यादा जानकारी नहीं होती। पिछले उपन्यासों में वैश्विक व भारतीय इतिहास, धर्म, सांप्रदायिकता, रीति, नीति और अनेक गूढ़ तथ्य उनकी कहानियों के प्रसंगों में खोजपूर्ण जानकारी के साथ समाविष्ट होते रहे हैं। निश्चित रूप से इन्हें कहानियों में बेवजह नहीं लाया गया होता है, बल्कि कहानी की पृष्ठभूमि से इनका गहरा संबंध और महत्त्व होता है। लेखक को इसके लिए काफी खोज, अध्ययन और सार्थक तारतम्य भी बैठाना होता है। पंकज सुबीर की इस पूर्व तैयारी का मैं बहुत क़ायल हूँ।


'रूदादे-सफ़र' में इस बार चिकित्सा विज्ञान कुछ इसी तरह से कहानी के साथ एकाकार हुआ है। किसी चिकित्सक पात्र के चित्रण में शायद ही कभी इतने विस्तार से और गहनता से कोई हिंदी लेखक तकनीकी विषय के विवेचन सहित पाठकों को भी इतना संपन्न कर पाया होगा। ख़ास तौर से एनोटॉमी, शवदान, शव संरक्षण आदि और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं को संभवतः मेरे जैसे अनेक पाठकों ने पहली बार ही जाना होगा। वह भी मूल कहानी के साथ बहते हुए। लेखक इस श्रम के लिए सचमुच बहुत प्रशंसा के योग्य हैं।


एक बेटी का पिता होने के कारण शायद कई बार मेरी आँखें भर आईं इसे पढ़ते हुए। गला रुँध गया। कई बार किताब अलग रखकर कुछ और काम करके अपने को सहज बनाने का प्रयास किया। थोड़ी देर बाद फिर किताब उठाने से स्वयं को रोक नहीं पाया। पिता-पुत्री के रिश्ते वैसे ही बहुत मार्मिक और समर्पित होते हैं, और जब पुत्री पिता की ही लगभग छाया हो, तो बात कुछ और अधिक संवेदनामय हो जाती है। 'रूदादे-सफ़र' की कहानी के केंद्र में पिता और पुत्री का स्नेह और जिम्मेदारियों का इंद्रधनुष मुस्कुराता रहता है। 


कहानी में कई मार्मिक दृश्य हैं। मेडिकल कॉलेज के प्रसंग हैं। छात्रों और शिक्षक, चिकित्सकों, सहयोगियों के साथ तकनीकी, चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के साथ साथ संबंधों और आत्मीय रिश्तों में स्नेह की, संस्कारों की, गीत, संगीत और कला जगत् की झलकियाँ हैं। प्रेम है, तो त्याग भी है। समर्पण है, तो प्रेम की आकांक्षा भी है इसमें। नया, पुराना भोपाल है, इंदौरी पोहे का आनंद है, बहुत कुछ है इसमें, जो इसे रोचक बनाए रखता है। इस अनुभव को उपन्यास पढ़कर ही समझा जा सकता है।


कई जगह मुझे उपन्यास की प्रस्तुति किसी पुरानी आदर्शवादी फ़िल्म की तरह भी लगती रही। एवीएम या जैमिनी प्रोडक्शन की भावनापूर्ण पुरानी फ़िल्में देखने वाले अनुभव से गुज़रता रहा। सीख और संदेशों को बहुत सुंदर ढंग से संवादों में पिरोया गया है। खासतौर से पिता और पुत्री के संवादों से प्रसंग बहुत मार्मिक हो उठते हैं। अंत तो बिलकुल अप्रत्याशित ही कहा जाएगा। हालाँकि मैंने उसका अनुमान पूर्व में ही लगा लिया था, किंतु पंकज सुबीर ने उसका निर्वाह इतनी ख़ूबसूरती से किया है कि पाठक दंग रह जाता है।


अंतिम पंक्तियों में पूरे उपन्यास की आत्मा जैसे निकलकर आ जाती है, ...हम सभी की जिंदगी की यही हक़ीक़त है कि हमारे रूदादे-सफ़र वही होती है, जो वक़्त तय कर देता है, हमारे पहले से तय करने से कुछ नहीं होता। हम सबकी रूदादे सफर अंततः वक़्त ही लिखता है।

अब जहाँ भी हैं वहीं तक लिखो रूदादे-सफ़र,

हम तो निकले थे कहीं और ही जाने के लिए...!

निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल के इस शेर के साथ पंकज सुबीर का यह उपन्यास समाप्त हो जाता है। आँखें भीगी रह जाती हैं।

बहुत बधाई इस ख़ूबसूरत उपन्यास के लिए। सफ़र ऐसे ही जारी रहे पंकज भाई।




(पुस्तक : रूदादे - सफ़र, लेखक : पंकज सुबीर, प्रकाशक : शिवना प्रकाशन,सीहोर, मूल्य : 300 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो

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