वा भई वा : कविता में सार्थक हास्य व्यंग्य
राम राज्य उतरा भारत भू , वा भई वा!
एक एक रावन है हर सू , वा भई वा !
रोजगार का कोई पुरसाहाल नहीं,
किंतु विश्वगुरु को उद्यत तू ,वा भई वा!
मंच से पढ़ी जाने वाली कविता हमारे यहां बहुत लोकप्रिय रही हैं. एक जमाना था जब साहित्य के जाने माने रचनाकारों से मंच सजा रहता था. शाम ढले शुरू हुआ कवि सम्मेलन या मुशायरा दूसरे दिन सुबह तड़के तक रोशन रहता था, श्रोता जमे रहते थे. तालियों की गूंज बरकरार रहती थी. काव्य के सारे रसों से ओतप्रोत छंदबद्ध कविताएं श्रोताओं के दिलों में सीधे उतर जाती थीं. खासतौर से प्रेम,श्रंगार और वीर रस प्रधान कविताओं के साथ साथ हास्य व्यंग्य की कविताओं को भी बहुत रुचि से सुना जाता था. खूब ठहाके गूंजते, वाह! वाह! के शोर के साथ कई बार सुनाए जाने की फरमाइश भी होती थी.
लेकिन मंचीय कवि सम्मेलनों का वह जलवा अब उतना नहीं रहा. हास्य कविताएं चुटकुलों में बदलती गईं, लगभग स्टैंडअप कॉमेडी की प्रस्तुतियों में बदलती व्यंग्य कविताएं द्विअर्थी और अपमानित करने वाली टिप्पणियों से भरने लगीं.
ऐसा नहीं है कि सभी ऐसा करते रहे. कुछ सरोकारी और प्रतिबद्ध रचनाकार सार्थक व्यंग्य कविताएं रचते रहे. कवि सम्मेलनों का स्थान छोटी गोष्ठियों ने लिया और लघु साहित्य पत्रिकाओं ने गंभीर कवि व्यंग्यकारों को मंच उपलब्ध कराया. श्री राजेंद्र वर्मा एक ऐसे ही व्यंग्य कवि के रूप में अपना प्रभाव छोड़ते हैं जिन्होंने सामाजिक,राजनैतिक,साहित्यिक तथा अन्य क्षेत्रों में व्याप्त पाखंड और विडंबनाओं पर सार्थक व्यंग्य कविताएं लिखीं हैं. हाल ही में उनका कविता संग्रह 'वा भई वा' पढ़ने को मिला है. श्वेतवर्णा प्रकाशन से आए इस संग्रह में उनकी कुल 90 छंद बद्ध कविताएं संकलित हैं. जिनमें से अधिकांश गजल फॉर्म में हैं. कुछ गीत और नवगीत भी हैं. सभी रचनाएं व्यंग्य कविताएं हैं और हास्य बोध के साथ व्यंग्य का तेवर पूरी तरह बनाए रखती हैं. आलेख के प्रारंभ की पंक्तियां इसी संग्रह की शीर्षक कविता से उद्धृत हैं जिसे बानगी के तौर पर लिया जा सकता है.
राजेंद्र वर्मा जी की इन व्यंग्य कविताओं को पढ़ते हुए हमें बरबस दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी जी की याद आती है. राजेंद्र जी की गजलों में भी सत्ता और व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों और पाखंड से पर्दा हटाने और साहस के साथ कटाक्ष और प्रहार करने की सफल कोशिश स्पष्टतौर पर महसूस की जा सकती है. कवि लिखते हैं ...
धूर्तता पहले भी थी, पर आज के जैसी न थी!
मूढ़ता पहले भी थी, पर आज के जैसी न थी!
झूठ सिंहासन चढ़ा है, सत्य घुटनों पर झुका,
दुष्टता पहले भी थी, पर आज के जैसी न थी!
राजेंद्र वर्मा जी ने गद्य और पद्य दोनों विधाओं में खूब लिखा है. छंद,गीत,गजल,दोहा ,पद,मुक्तक आदि के आलोचनात्मक और उसके सौंदर्य शास्त्र पर भी व्यापक अध्ययन और कार्य किया है. खासतौर पर गजलों को लेकर उनकी पुस्तक भी प्रकाशित हुई है. प्रस्तुत संकलन में छोटी बहर की गजलों को पढ़कर उनकी समझ से प्रभावित हुए बगैर रहा नहीं जा सकता. देखिए...
सच बोलेगा,पछताएगा,
तन्हाई में खो जाएगा!
देश बेच दे,डॉलर ले ले,
वरना पीछे पछताएगा!
ऐसी अनेक सार्थक व्यंग्यधर्मी रचनाओं को इस संकलन में पढ़ा जा सकता है. ये न सिर्फ विसंगतियों पर कटाक्ष करतीं हैं बल्कि पाठक को विचार करने को भी उद्वेलित करती हैं.
श्री राजेंद्र वर्मा जी को इस सार्थक काव्य संग्रह के लिए बहुत बधाई और शुभकामनाएं.
पुस्तक चर्चा :
वा भई वा : कविता में सार्थक हास्य व्यंग्य
ब्रजेश कानूनगो
राम राज्य उतरा भारत भू , वा भई वा!
एक एक रावन है हर सू , वा भई वा !
रोजगार का कोई पुरसाहाल नहीं,
किंतु विश्वगुरु को उद्यत तू ,वा भई वा!
मंच से पढ़ी जाने वाली कविता हमारे यहां बहुत लोकप्रिय रही हैं. एक जमाना था जब साहित्य के जाने माने रचनाकारों से मंच सजा रहता था. शाम ढले शुरू हुआ कवि सम्मेलन या मुशायरा दूसरे दिन सुबह तड़के तक रोशन रहता था, श्रोता जमे रहते थे. तालियों की गूंज बरकरार रहती थी. काव्य के सारे रसों से ओतप्रोत छंदबद्ध कविताएं श्रोताओं के दिलों में सीधे उतर जाती थीं. खासतौर से प्रेम,श्रंगार और वीर रस प्रधान कविताओं के साथ साथ हास्य व्यंग्य की कविताओं को भी बहुत रुचि से सुना जाता था. खूब ठहाके गूंजते, वाह! वाह! के शोर के साथ कई बार सुनाए जाने की फरमाइश भी होती थी.
लेकिन मंचीय कवि सम्मेलनों का वह जलवा अब उतना नहीं रहा. हास्य कविताएं चुटकुलों में बदलती गईं, लगभग स्टैंडअप कॉमेडी की प्रस्तुतियों में बदलती व्यंग्य कविताएं द्विअर्थी और अपमानित करने वाली टिप्पणियों से भरने लगीं.
ऐसा नहीं है कि सभी ऐसा करते रहे. कुछ सरोकारी और प्रतिबद्ध रचनाकार सार्थक व्यंग्य कविताएं रचते रहे. कवि सम्मेलनों का स्थान छोटी गोष्ठियों ने लिया और लघु साहित्य पत्रिकाओं ने गंभीर कवि व्यंग्यकारों को मंच उपलब्ध कराया. श्री राजेंद्र वर्मा एक ऐसे ही व्यंग्य कवि के रूप में अपना प्रभाव छोड़ते हैं जिन्होंने सामाजिक,राजनैतिक,साहित्यिक तथा अन्य क्षेत्रों में व्याप्त पाखंड और विडंबनाओं पर सार्थक व्यंग्य कविताएं लिखीं हैं. हाल ही में उनका कविता संग्रह 'वा भई वा' पढ़ने को मिला है. श्वेतवर्णा प्रकाशन से आए इस संग्रह में उनकी कुल 90 छंद बद्ध कविताएं संकलित हैं. जिनमें से अधिकांश गजल फॉर्म में हैं. कुछ गीत और नवगीत भी हैं. सभी रचनाएं व्यंग्य कविताएं हैं और हास्य बोध के साथ व्यंग्य का तेवर पूरी तरह बनाए रखती हैं. आलेख के प्रारंभ की पंक्तियां इसी संग्रह की शीर्षक कविता से उद्धृत हैं जिसे बानगी के तौर पर लिया जा सकता है.
राजेंद्र वर्मा जी की इन व्यंग्य कविताओं को पढ़ते हुए हमें बरबस दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी जी की याद आती है. राजेंद्र जी की गजलों में भी सत्ता और व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों और पाखंड से पर्दा हटाने और साहस के साथ कटाक्ष और प्रहार करने की सफल कोशिश स्पष्टतौर पर महसूस की जा सकती है. कवि लिखते हैं ...
धूर्तता पहले भी थी, पर आज के जैसी न थी!
मूढ़ता पहले भी थी, पर आज के जैसी न थी!
झूठ सिंहासन चढ़ा है, सत्य घुटनों पर झुका,
दुष्टता पहले भी थी, पर आज के जैसी न थी!
राजेंद्र वर्मा जी ने गद्य और पद्य दोनों विधाओं में खूब लिखा है. छंद,गीत,गजल,दोहा ,पद,मुक्तक आदि के आलोचनात्मक और उसके सौंदर्य शास्त्र पर भी व्यापक अध्ययन और कार्य किया है. खासतौर पर गजलों को लेकर उनकी पुस्तक भी प्रकाशित हुई है. प्रस्तुत संकलन में छोटी बहर की गजलों को पढ़कर उनकी समझ से प्रभावित हुए बगैर रहा नहीं जा सकता. देखिए...
सच बोलेगा,पछताएगा,
तन्हाई में खो जाएगा!
देश बेच दे,डॉलर ले ले,
वरना पीछे पछताएगा!
ऐसी अनेक सार्थक व्यंग्यधर्मी रचनाओं को इस संकलन में पढ़ा जा सकता है. ये न सिर्फ विसंगतियों पर कटाक्ष करतीं हैं बल्कि पाठक को विचार करने को भी उद्वेलित करती हैं.
श्री राजेंद्र वर्मा जी को इस सार्थक काव्य संग्रह के लिए बहुत बधाई और शुभकामनाएं.
( कविता संग्रह: वा भई वा, कवि : राजेंद्र वर्मा, प्रकाशक : श्वेतवर्णा प्रकाशन, नईदिल्ली, मूल्य :249/ रुपए)
ब्रजेश कानूनगो
( कविता संग्रह: वा भई वा, कवि : राजेंद्र वर्मा, प्रकाशक : श्वेतवर्णा प्रकाशन, नईदिल्ली, मूल्य :249/ रुपए)
ब्रजेश कानूनगो
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