Saturday, March 16, 2024

चोर मचाए शोर

चोर मचाए शोर 

साहित्यिक क्षेत्रों का बहुकथित जुमला है कि इन दिनों खूब मात्रा में व्यंग्य लिखा जा रहा है. वास्तविकता में इसे जुमला नहीं कहा जा सकता. यह सच्चाई भी है कि इन दिनों व्यंग्य रचनाएं बहुत प्रकाशित हो रही हैं. किताबें भी खूब आ रही हैं. व्यंग्य तो पहले भी बहुत लिखे जाते रहे हैं, लेकिन प्रायः अच्छे व्यंग्य ही प्रकाशन का सौभाग्य पाते थे. लेखक और संपादक के स्तर पर पर्याप्त छटनी हो जाती थी. लेखक भी अच्छे बुरे की समझ रखता था. जो बेहतर होता था उसे ही प्रकाश में लाता था. संग्रह भी विलंब से लाता था ताकि बेहतर में से श्रेष्ठ रचनाओं को ही संकलन में दे सके. इसी श्रेष्ठता के इंतजार में अच्छे अच्छे रचनाकारों की पुस्तकें भी प्रकाशित होने से रह जाया करती थीं.


समर्थ लेखक व्यंग्यकार सुनील सक्सेना भी इसी मौके के इंतजार में अपनी पहली पुस्तक लाने का सुख भोगने में विलंबित हो गए. पारिवारिक साहित्यिक पृष्ठभूमि के साथ तेरह चौदह साल की उम्र से लिखने की शुरुआत करने के बावजूद उनकी पहली किताब नौकरी से सेवानिवृत्ति के बाद ही संभव हो पाई. आज की तरह सोशल मीडिया, अखबारों में व्यंग्य कॉलम की दैनिकता और प्रकाशन संस्थानों की सहज उपलब्धता बीस पच्चीस वर्ष पूर्व होती तो उनकी बेहतरीन रचनाओं का संग्रह काफी पहले ही आ चुका होता और उनकी बढ़िया रचनाओं के कारण बेहतरीन व्यंग्यकार के तौर पर उनकी पहचान होकर संभवतः पुरस्कृत भी किए जा चुके होते.


यह बात मैं यों ही नहीं कह रहा. हाल ही में आए उनके पहले व्यंग्य संग्रह 'चोर मचाए शोर ' की रचनाएं पढ़ने के बाद बहुत संतोष और ईमानदारी से कह पाने की स्थिति में हूं. खूब लिखे जा रहे तथाकथित व्यंग्य लेखों के समय में सुनील सक्सेना जी की रचनाएं भी समसामयिक प्रसंगों ,अटपटेपन, विसंगतियों और पाखंड की खबरों से निकलकर ही आती हैं लेकिन उनकी भाषा, पठनीयता और निर्वाह उन्हें विशिष्ठता प्रदान करता है. पठनीयता ही है जो उनकी वैचारिकता और व्यंजना को पाठक के भीतर तक  सहजता से प्रवेश भी कराती है और उसे उद्वेलित भी करती है. वे चाहे बिल्ली के गले में घंटी बांधने की बात करें या अंतरात्मा की, एक अदने से बटन को अपने व्यंग्य का माध्यम बनाएं या सड़क पर पड़े किसी नोट को. सुनील सक्सेना अपनी व्यंग्य दृष्टि को प्रमाणित भी करते हैं और पाठक को बांधे रख कर उस तक अपनी बात पहुंचा देते हैं. आम जनजीवन के रोजमर्रा के जुमले, फिल्मी गीतों के टुकड़े और जनरुचि के कथन उनकी रचनाओं की संप्रेषणीयता को सहज बनाने का काम करते हैं. रंगकर्मी होने का उनका अनुभव भी रचना के सहज संप्रेषण और आनंद को बढ़ाने में सहायक हुआ है. संग्रह की लगभग हर रचना उनके इसी सामर्थ्य को प्रमाणित करती है.


वरिष्ठ लेखक श्री सुनील सक्सेना के विलंब से आए पहले व्यंग्य संग्रह ' चोर मचाए शोर ' का निसंदेह श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाओं के पाठकों द्वारा भरपूर स्वागत किया जाना चाहिए. बधाई और शुभकामनाएं.




(पुस्तक : चोर मचाए शोर, व्यंग्यकार : सुनील सक्सेना, प्रकाशक : न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नईदिल्ली, मूल्य : 300 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो

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