Sunday, March 17, 2024

कि आप शुतुरमुर्ग बने रहें

कि आप शुतुरमुर्ग बने रहें 


किसी कालखंड को समझने में उस दौर के इतिहास से गुजरना होता है. इतिहास पढ़कर ही  किसी भी देश या भूभाग पर तात्कालिक सभ्यता,संस्कृति, भाषा भूषा और संस्कारों के विकास को जान पाते हैं.  आपसी व्यवहार और समाज में उपस्थित अच्छे बुरे पक्षों को जानने समझने का स्रोत भी प्रायः उपलब्ध इतिहास की पुस्तकें ही हुआ करती हैं. सामाजिक उत्कर्ष और पतन के कारणों का पता भी अतीत के समुद्र में गोता लगाकर ही खोजा जाता रहा है. मानव सभ्यता के विकास के साथ ही यह परंपरा आगे बढ़ती रही है.


जब कभी इतिहास को नष्ट किया गया या किन्ही कारणों से पुनर्लेखन किया गया तब उस वक्त के सच पर पर्दा डालने का कार्य भी होता रहा है. ऐसे में भ्रष्ट इतिहास की बजाए प्रबुद्धजन तत्कालीन साहित्य में सच की तलाश करता है. साहित्य में जब भी सजग और सार्थक रचनाकार हुए हैं उन्होंने अपने समय के राजनीतिक,सामाजिक,नैतिक और आर्थिक सच्चाइयों को सहेजने का काम अवश्य किया है. चाहे वह कविता हो, निबंध हो,कहानी या उपन्यास हो अपने समय का सच लोगों के समक्ष रखते रहे हैं. यही साहित्य भविष्य में वैकल्पिक इतिहास की भूमिका का कुछ हद तक निर्वाह करने लगता है. जिस दौर में अप्रिय या कड़वा सच, झूठ के मोहक आवरणों में छुपाया जा रहा हो, इतिहास लेखन संदिग्ध हो तब आगे साहित्य का ही एक आसरा शोधार्थियों के पास बचेगा. ऐसे साहित्यकारों में व्यंग्यकार शांतिलाल जैन भी एक होंगें जिनके लिखे में भविष्य का नागरिक,शोधार्थी आज के सच को जान सकेगा. शांतिलाल जैन का नया व्यंग्य संग्रह ' कि आप शुतुरमुर्ग बनें रहें ' की रचनाएं यह आश्वस्ति पाठकों को देता है.


देश और दुनिया में आज सत्ताओं का एक ऐसा राजनीतिक संक्रमण काल चल रहा है जब चारों तरफ अंधेरों का साम्राज्य पसरा पड़ा है. जो दिखता है वह होता नहीं. जो दिखाया जाता है वह सच से बहुत दूर होता है. जो दस्तावेजों में दर्ज होना चाहिए वह प्रकाश में ही नहीं आता. तब इस दौर की विसंगतियों, मूर्खताओं, पाखंड और अटपटेपन को  भविष्य में शांतिलाल जैन जैसे रचनाकारों की किताबों में खोजा जा सकेगा.


श्री शांतिलाल जैन के प्रस्तुत व्यंग्य संग्रह की भूमिका में वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री कैलाश मंडलेकर ने विस्तार से संकलित रचनाओं पर सटीक टिप्पणियां की हैं. उन सब सार्थक सकारात्मक टिप्पणियों से सहमत होते हुए एक पाठक और एक रचनाकार के तौर पर लगता है कि शांतिलाल जैन अपनी किसी भी रचना को अंतिम रूप देने से पहले बहुत चिंतन करते हैं। उसे किस फॉर्मेट में कितने बेहतर ढंग से कहा जा सकता है,इसका धैर्य उनमें अद्भुत है। बात कही भी जाए और संदर्भ ध्वनि से निकल कर आए,सीधे सीधे नहीं। कविता का यह औजार उनके व्यंग्य गद्य में नया बिम्ब रचता है। रचना की प्रस्तुति में उनका ठिठक कर कहना रचना को विश्वसनीय और प्रभावी बना देता है। 


कई बार उनकी रचनाओं में ऐसे विषय और प्रसंग या तथ्य होते हैं जिनकी जानकारी भी सामान्य पाठकों को नहीं होती. कई तकनीकी विषयों और नवाधुनिक सूक्तियों ,विधियों, व्यवहारों को लेकर उनकी व्यंजनात्मक रचनाएं आईं हैं. कहना न होगा ऐसे में लेखक के साथ पाठक की भी अपेक्षित तैयारी जरूरी हो जाती है अन्यथा वह किसी चक्रव्यूह में उलझ भी सकता है.


कई बार शांतिलाल जैन का नियमित पाठक उनका नाम पढ़ते ही रचना की बुनावट और विषय की नवीनता की कल्पना कर प्रस्तुति के एक विशिष्ठ फॉर्मेट की संभावना में पड़ जाता है. विविधता के बावजूद ऐसा होना मुझे निजी तौर पर खटकता है. मुझे लगता है किसी सुपरस्टार की शैली की बजाए शांतिलाल जैन जैसे सहज लेखक अपने सहज लेखन में भी उतना ही असर डालने में समर्थ हैं. जो उनके पूर्व में आए संकलनों की रचनाओं में बखूबी देखा जा सकता है.

वर्तमान समय की विसंगतियों, बेहुदगियों पर,मूर्खताओं पर वे बहुत प्रभावीरूप से चोट करते हैं। मजेदार यह कि  जिस पर रचना टिप्पणी करती है वही व्यक्ति मुस्कुराने पर विवश हो जाता है, किंतु भीतर कहीं न कहीं कांटे की चुभन तो महसूस कर ही लेता होगा।

संग्रह की कुछ रचनाएं कोरोना काल की स्थितियों, विसंगतियों पर लिखी गईं है अन्य रचनाएं भी इसी कालखंड की राजनीतिक,सामाजिक, मानवीय घटनाक्रमों, आचरणों और पाखंड पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करती हैं.

एक तरह से इस कठिन समय में जब हर अच्छी बुरी बात को नजर अंदाज करने में ही सामान्य जन अपनी भलाई देखने लगा है, सब कुछ भला भला लगने के दौर में शांतिलाल जैन का व्यंग्य संग्रह 'कि आप शुतुरमुर्ग बने रहे ' साहस के साथ जरूरी और रचनात्मक प्रतिरोध के रूप में अपने समय की विडंबनाओं को रेखांकित करता है.


श्री शांतिलाल जैन को बहुत बधाई और शुभकामनाएं.



( व्यंग्य संग्रह : कि आप शुतुरमुर्ग बनें रहें, लेखक : शांतिलाल जैन, प्रकाशक : बोधि प्रकाशन,जयपुर, कीमत : ₹200/ )


ब्रजेश कानूनगो

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