Thursday, March 21, 2024

काबुल की कठोर भूमि : विधा के ठोस धरातल पर व्यंग्य रचनाएं

काबुल की कठोर भूमि : विधा के ठोस धरातल पर व्यंग्य रचनाएं 

श्री सुनील जैन राही का नवीनतम संग्रह ' काबुल की कठोर भूमि ' जयपुर के बोधि प्रकाशन से हाल ही में (2023) आया है. इस छोटी सी पुस्तक में राही जी की पच्चीस छोटी छोटी रचनाएं हैं. रचनाओं की संक्षिप्तता के बावजूद इनके विषयों में पर्याप्त विविधता के साथ राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय विषयों पर गहरा निरीक्षण, सामाजिक दृष्टिकोण, सरोकारी विवेचन और सटीक व्यंजना देखी जा सकती है.


सुनीलजी स्वयं को व्यंग्य के उद्दंड विद्यार्थी के रूप घोषित करते रहते हैं, उनमें कितनी उद्दंडता है इस पर टीका तो नहीं कर सकता लेकिन वे केवल व्यंग्य विधा ही नहीं बल्कि साहित्य, समाज और जीवन संस्कृति को सीखने समझने के उपक्रम में सदैव एक विनम्र और कुशाग्र छात्र के रूप में प्रमाणित तो अवश्य ही करते रहते हैं. उनकी कई पुस्तकों, लेखों और रचनाओं में इसका सहज आकलन किया जा सकता है.


यह मुझे अतिरिक्त अवसर उपलब्ध है कि सोशल मीडिया के समूहों में उनकी एक विशिष्ठ और आलोचनात्मक दृष्टि और टिप्पणियां देखने पढ़ने को मिलती रहती हैं. अपने मन की बात और प्रतिक्रिया में यदि वे खरा खरा कहने का साहस रखते हैं तो अन्य विचारों पर असहमति के साथ उसको समझने और अपनी समझ को ठीक कर लेने की विनम्रता और बढप्पन भी उनके एक बेहतर विद्यार्थी होने को सिद्ध करता है. इसी सीखने समझने के क्रम में व्यंग्य की आलोचना विधा में उनकी दो किताबें प्रकाशित और काफी चर्चित हुई हैं.


बहरहाल, यहां बात व्यंग्य संग्रह ' काबुल की कठोर भूमि ' की ही करते हैं. संग्रह की पहली आठ रचनाओं में अफगानिस्तान के हालातों, तालिबानी संस्कृति के परिणामों और वहां के समाज की बदलती स्थितियों में बंदूक की नोक पर पसरी विवशता, कठोरता, स्त्रियों की प्रताड़ना पर व्यंग्यकार उद्वेलित होकर सजग टिप्पणी करता है. कई जगह पाठक के भीतर तक दुख और करुणा का संचार होने लगता है. इन्ही रचनाओं के कारण संकलन का शीर्षक ' काबुल की कठोर भूमि ' बहुत सार्थक बन पड़ा है.


संग्रह की अन्य रचनाएं भीं सुनील जैन राही की व्यंग्य विधा की गहरी समझ और व्यंग्य के  औजारों के उपयोग यथा भाषा, विट, पंच,उपमा, व्यंजना आदि की  प्रभावशीलता को भी स्वीकृति देती हैं. सियासत बदलने से खुश हैं जंगल की अवाम, हंसी का मोहताज जैसी अनेक रचनाओं को पढ़कर इसे आसानी से समझा जा सकता है.


इस संकलन में व्यक्तिगत तौर पर मुझे 'गड्ढे में गद्दा डालकर बैठा व्यंग्यकार ' श्रेष्ठतम और राही जी की व्यंग्य लेखन पर व्यापक पकड़ की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण लगी. रचना में जैसे वे व्यंग्य विधा के सारे औजारों का उपयोग करते हुए अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता और लेखकीय सरोकारों के साथ विसंगतियों, विडंबनाओं के विशाल गड्ढे में देशहित का झंडा फहराते किसी आंदोलनकारी के रूप में जा बैठे हों. यह रचना व्यंग्यकार को उसके वास्तविक धर्म और कर्म का स्मरण भी कराती है और संकल्पित होने को बाध्य भी करती है. संपूर्ण रचना रोचकता से बात तो कहती ही है, उद्वेलित भी करती है. राही जी सच ही लिखते हैं,


' व्यंग्यकार विसंगति को देखकर चुप नहीं रह सकता. समाज, राजनीति, धर्म, मजहब से विसंगति की सड़ांध की गंध से वह विचलित होता है, ऐसी सड़क की खोज में जुट जाता है जहां से सरकार की कार गुजरती हो, आराम परस्त रईसों की बग्गियां निकलती हो, हुक्मरानों के शाही जनाजे का इंतजार करती रियाया रिरियायती हो. इसलिए व्यंग्यकार सत्ता, राजनीति, धर्म, मजहब की आंखों में सबसे ज्यादा चुभने वाली चीज है. वह आइना है, जिसमें भद्दी सूरत भद्दी नजर आती है, चेहरे की चालाकियां आंखों का कमीनापन और रहम की झूठी नजरे स्पष्ट दिखाई देती हैं.'


ऐसी ही सार्थक रचनाओं से गुजरना चाहने वाले पाठकों को सुनील जैन राही का व्यंग्य संग्रह 'काबुल की कठोर भूमि ' अवश्य पढ़ना चाहिए. लेखक को बहुत बधाई और शुभकामनाएं.




( व्यंग्य संग्रह : काबुल की कठोर भूमि, लेखक : सुनील जैन राही, प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर, मूल्य : 150 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो

Sunday, March 17, 2024

वा भई वा : कविता में सार्थक हास्य व्यंग्य

वा भई वा : कविता में सार्थक हास्य व्यंग्य


राम राज्य उतरा भारत भू , वा भई वा!

एक एक रावन है हर सू , वा भई वा !


रोजगार का कोई पुरसाहाल नहीं,

किंतु विश्वगुरु को उद्यत तू ,वा भई वा!


मंच से पढ़ी जाने वाली कविता हमारे यहां बहुत लोकप्रिय रही हैं. एक जमाना था जब साहित्य के जाने माने रचनाकारों से मंच सजा रहता था. शाम ढले शुरू हुआ कवि सम्मेलन या मुशायरा दूसरे दिन सुबह तड़के तक रोशन रहता था, श्रोता जमे रहते थे. तालियों की गूंज बरकरार रहती थी. काव्य के सारे रसों से ओतप्रोत छंदबद्ध कविताएं श्रोताओं के दिलों में सीधे उतर जाती थीं. खासतौर से प्रेम,श्रंगार और वीर रस प्रधान कविताओं के साथ साथ हास्य व्यंग्य की कविताओं को भी बहुत रुचि से सुना जाता था. खूब ठहाके गूंजते, वाह! वाह! के शोर के साथ कई बार सुनाए जाने की फरमाइश भी होती थी.

लेकिन मंचीय कवि सम्मेलनों का वह जलवा अब उतना नहीं रहा. हास्य कविताएं चुटकुलों में बदलती गईं, लगभग स्टैंडअप कॉमेडी की प्रस्तुतियों में बदलती व्यंग्य कविताएं  द्विअर्थी और अपमानित करने वाली टिप्पणियों से भरने लगीं.


ऐसा नहीं है कि सभी ऐसा करते रहे. कुछ सरोकारी और प्रतिबद्ध रचनाकार सार्थक व्यंग्य कविताएं रचते रहे. कवि सम्मेलनों का स्थान छोटी गोष्ठियों ने लिया और लघु साहित्य पत्रिकाओं ने गंभीर कवि व्यंग्यकारों को मंच उपलब्ध कराया. श्री राजेंद्र वर्मा एक ऐसे ही व्यंग्य कवि के रूप में अपना प्रभाव छोड़ते हैं जिन्होंने सामाजिक,राजनैतिक,साहित्यिक तथा अन्य क्षेत्रों में व्याप्त पाखंड और विडंबनाओं पर सार्थक व्यंग्य कविताएं लिखीं हैं. हाल ही में उनका कविता संग्रह 'वा भई वा' पढ़ने को मिला है. श्वेतवर्णा प्रकाशन से आए इस संग्रह में उनकी कुल 90 छंद बद्ध कविताएं संकलित हैं. जिनमें से अधिकांश गजल फॉर्म में हैं. कुछ गीत और नवगीत भी हैं. सभी रचनाएं व्यंग्य कविताएं हैं और हास्य बोध के साथ व्यंग्य का तेवर पूरी तरह बनाए रखती हैं. आलेख के प्रारंभ की पंक्तियां इसी संग्रह की शीर्षक कविता से उद्धृत हैं जिसे बानगी के तौर पर लिया जा सकता है.


राजेंद्र वर्मा जी की इन व्यंग्य कविताओं को पढ़ते हुए हमें बरबस दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी जी की याद आती है. राजेंद्र जी की गजलों में भी सत्ता और व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों और पाखंड से पर्दा हटाने और साहस के साथ कटाक्ष और प्रहार करने की सफल कोशिश स्पष्टतौर पर महसूस की जा सकती है. कवि लिखते हैं ...


धूर्तता पहले भी थी, पर आज के जैसी न थी!

मूढ़ता पहले भी थी, पर आज के जैसी न थी!


झूठ सिंहासन चढ़ा है, सत्य घुटनों पर झुका,

दुष्टता पहले भी थी, पर आज के जैसी न थी!


राजेंद्र वर्मा जी ने गद्य और पद्य दोनों विधाओं में खूब लिखा है. छंद,गीत,गजल,दोहा ,पद,मुक्तक आदि के आलोचनात्मक और उसके सौंदर्य शास्त्र पर भी व्यापक अध्ययन और कार्य किया है. खासतौर पर गजलों को लेकर उनकी पुस्तक भी प्रकाशित हुई है. प्रस्तुत संकलन में छोटी बहर की गजलों को पढ़कर उनकी समझ से प्रभावित हुए बगैर रहा नहीं जा सकता. देखिए...


सच बोलेगा,पछताएगा,

तन्हाई में खो जाएगा!

देश बेच दे,डॉलर ले ले,

वरना पीछे पछताएगा!


ऐसी अनेक सार्थक व्यंग्यधर्मी रचनाओं को इस संकलन में पढ़ा जा सकता है. ये न सिर्फ विसंगतियों पर कटाक्ष करतीं हैं बल्कि पाठक को विचार करने को भी उद्वेलित करती हैं.

श्री राजेंद्र वर्मा जी को इस सार्थक काव्य संग्रह के लिए बहुत बधाई और शुभकामनाएं.


पुस्तक चर्चा :

वा भई वा : कविता में सार्थक हास्य व्यंग्य

ब्रजेश कानूनगो


राम राज्य उतरा भारत भू , वा भई वा!

एक एक रावन है हर सू , वा भई वा !


रोजगार का कोई पुरसाहाल नहीं,

किंतु विश्वगुरु को उद्यत तू ,वा भई वा!


मंच से पढ़ी जाने वाली कविता हमारे यहां बहुत लोकप्रिय रही हैं. एक जमाना था जब साहित्य के जाने माने रचनाकारों से मंच सजा रहता था. शाम ढले शुरू हुआ कवि सम्मेलन या मुशायरा दूसरे दिन सुबह तड़के तक रोशन रहता था, श्रोता जमे रहते थे. तालियों की गूंज बरकरार रहती थी. काव्य के सारे रसों से ओतप्रोत छंदबद्ध कविताएं श्रोताओं के दिलों में सीधे उतर जाती थीं. खासतौर से प्रेम,श्रंगार और वीर रस प्रधान कविताओं के साथ साथ हास्य व्यंग्य की कविताओं को भी बहुत रुचि से सुना जाता था. खूब ठहाके गूंजते, वाह! वाह! के शोर के साथ कई बार सुनाए जाने की फरमाइश भी होती थी.

लेकिन मंचीय कवि सम्मेलनों का वह जलवा अब उतना नहीं रहा. हास्य कविताएं चुटकुलों में बदलती गईं, लगभग स्टैंडअप कॉमेडी की प्रस्तुतियों में बदलती व्यंग्य कविताएं  द्विअर्थी और अपमानित करने वाली टिप्पणियों से भरने लगीं.


ऐसा नहीं है कि सभी ऐसा करते रहे. कुछ सरोकारी और प्रतिबद्ध रचनाकार सार्थक व्यंग्य कविताएं रचते रहे. कवि सम्मेलनों का स्थान छोटी गोष्ठियों ने लिया और लघु साहित्य पत्रिकाओं ने गंभीर कवि व्यंग्यकारों को मंच उपलब्ध कराया. श्री राजेंद्र वर्मा एक ऐसे ही व्यंग्य कवि के रूप में अपना प्रभाव छोड़ते हैं जिन्होंने सामाजिक,राजनैतिक,साहित्यिक तथा अन्य क्षेत्रों में व्याप्त पाखंड और विडंबनाओं पर सार्थक व्यंग्य कविताएं लिखीं हैं. हाल ही में उनका कविता संग्रह 'वा भई वा' पढ़ने को मिला है. श्वेतवर्णा प्रकाशन से आए इस संग्रह में उनकी कुल 90 छंद बद्ध कविताएं संकलित हैं. जिनमें से अधिकांश गजल फॉर्म में हैं. कुछ गीत और नवगीत भी हैं. सभी रचनाएं व्यंग्य कविताएं हैं और हास्य बोध के साथ व्यंग्य का तेवर पूरी तरह बनाए रखती हैं. आलेख के प्रारंभ की पंक्तियां इसी संग्रह की शीर्षक कविता से उद्धृत हैं जिसे बानगी के तौर पर लिया जा सकता है.


राजेंद्र वर्मा जी की इन व्यंग्य कविताओं को पढ़ते हुए हमें बरबस दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी जी की याद आती है. राजेंद्र जी की गजलों में भी सत्ता और व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों और पाखंड से पर्दा हटाने और साहस के साथ कटाक्ष और प्रहार करने की सफल कोशिश स्पष्टतौर पर महसूस की जा सकती है. कवि लिखते हैं ...


धूर्तता पहले भी थी, पर आज के जैसी न थी!

मूढ़ता पहले भी थी, पर आज के जैसी न थी!


झूठ सिंहासन चढ़ा है, सत्य घुटनों पर झुका,

दुष्टता पहले भी थी, पर आज के जैसी न थी!


राजेंद्र वर्मा जी ने गद्य और पद्य दोनों विधाओं में खूब लिखा है. छंद,गीत,गजल,दोहा ,पद,मुक्तक आदि के आलोचनात्मक और उसके सौंदर्य शास्त्र पर भी व्यापक अध्ययन और कार्य किया है. खासतौर पर गजलों को लेकर उनकी पुस्तक भी प्रकाशित हुई है. प्रस्तुत संकलन में छोटी बहर की गजलों को पढ़कर उनकी समझ से प्रभावित हुए बगैर रहा नहीं जा सकता. देखिए...


सच बोलेगा,पछताएगा,

तन्हाई में खो जाएगा!

देश बेच दे,डॉलर ले ले,

वरना पीछे पछताएगा!


ऐसी अनेक सार्थक व्यंग्यधर्मी रचनाओं को इस संकलन में पढ़ा जा सकता है. ये न सिर्फ विसंगतियों पर कटाक्ष करतीं हैं बल्कि पाठक को विचार करने को भी उद्वेलित करती हैं.

श्री राजेंद्र वर्मा जी को इस सार्थक काव्य संग्रह के लिए बहुत बधाई और शुभकामनाएं.




( कविता संग्रह: वा भई वा, कवि : राजेंद्र वर्मा, प्रकाशक : श्वेतवर्णा प्रकाशन, नईदिल्ली, मूल्य :249/ रुपए)


ब्रजेश कानूनगो


( कविता संग्रह: वा भई वा, कवि : राजेंद्र वर्मा, प्रकाशक : श्वेतवर्णा प्रकाशन, नईदिल्ली, मूल्य :249/ रुपए)


ब्रजेश कानूनगो

कि आप शुतुरमुर्ग बने रहें

कि आप शुतुरमुर्ग बने रहें 


किसी कालखंड को समझने में उस दौर के इतिहास से गुजरना होता है. इतिहास पढ़कर ही  किसी भी देश या भूभाग पर तात्कालिक सभ्यता,संस्कृति, भाषा भूषा और संस्कारों के विकास को जान पाते हैं.  आपसी व्यवहार और समाज में उपस्थित अच्छे बुरे पक्षों को जानने समझने का स्रोत भी प्रायः उपलब्ध इतिहास की पुस्तकें ही हुआ करती हैं. सामाजिक उत्कर्ष और पतन के कारणों का पता भी अतीत के समुद्र में गोता लगाकर ही खोजा जाता रहा है. मानव सभ्यता के विकास के साथ ही यह परंपरा आगे बढ़ती रही है.


जब कभी इतिहास को नष्ट किया गया या किन्ही कारणों से पुनर्लेखन किया गया तब उस वक्त के सच पर पर्दा डालने का कार्य भी होता रहा है. ऐसे में भ्रष्ट इतिहास की बजाए प्रबुद्धजन तत्कालीन साहित्य में सच की तलाश करता है. साहित्य में जब भी सजग और सार्थक रचनाकार हुए हैं उन्होंने अपने समय के राजनीतिक,सामाजिक,नैतिक और आर्थिक सच्चाइयों को सहेजने का काम अवश्य किया है. चाहे वह कविता हो, निबंध हो,कहानी या उपन्यास हो अपने समय का सच लोगों के समक्ष रखते रहे हैं. यही साहित्य भविष्य में वैकल्पिक इतिहास की भूमिका का कुछ हद तक निर्वाह करने लगता है. जिस दौर में अप्रिय या कड़वा सच, झूठ के मोहक आवरणों में छुपाया जा रहा हो, इतिहास लेखन संदिग्ध हो तब आगे साहित्य का ही एक आसरा शोधार्थियों के पास बचेगा. ऐसे साहित्यकारों में व्यंग्यकार शांतिलाल जैन भी एक होंगें जिनके लिखे में भविष्य का नागरिक,शोधार्थी आज के सच को जान सकेगा. शांतिलाल जैन का नया व्यंग्य संग्रह ' कि आप शुतुरमुर्ग बनें रहें ' की रचनाएं यह आश्वस्ति पाठकों को देता है.


देश और दुनिया में आज सत्ताओं का एक ऐसा राजनीतिक संक्रमण काल चल रहा है जब चारों तरफ अंधेरों का साम्राज्य पसरा पड़ा है. जो दिखता है वह होता नहीं. जो दिखाया जाता है वह सच से बहुत दूर होता है. जो दस्तावेजों में दर्ज होना चाहिए वह प्रकाश में ही नहीं आता. तब इस दौर की विसंगतियों, मूर्खताओं, पाखंड और अटपटेपन को  भविष्य में शांतिलाल जैन जैसे रचनाकारों की किताबों में खोजा जा सकेगा.


श्री शांतिलाल जैन के प्रस्तुत व्यंग्य संग्रह की भूमिका में वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री कैलाश मंडलेकर ने विस्तार से संकलित रचनाओं पर सटीक टिप्पणियां की हैं. उन सब सार्थक सकारात्मक टिप्पणियों से सहमत होते हुए एक पाठक और एक रचनाकार के तौर पर लगता है कि शांतिलाल जैन अपनी किसी भी रचना को अंतिम रूप देने से पहले बहुत चिंतन करते हैं। उसे किस फॉर्मेट में कितने बेहतर ढंग से कहा जा सकता है,इसका धैर्य उनमें अद्भुत है। बात कही भी जाए और संदर्भ ध्वनि से निकल कर आए,सीधे सीधे नहीं। कविता का यह औजार उनके व्यंग्य गद्य में नया बिम्ब रचता है। रचना की प्रस्तुति में उनका ठिठक कर कहना रचना को विश्वसनीय और प्रभावी बना देता है। 


कई बार उनकी रचनाओं में ऐसे विषय और प्रसंग या तथ्य होते हैं जिनकी जानकारी भी सामान्य पाठकों को नहीं होती. कई तकनीकी विषयों और नवाधुनिक सूक्तियों ,विधियों, व्यवहारों को लेकर उनकी व्यंजनात्मक रचनाएं आईं हैं. कहना न होगा ऐसे में लेखक के साथ पाठक की भी अपेक्षित तैयारी जरूरी हो जाती है अन्यथा वह किसी चक्रव्यूह में उलझ भी सकता है.


कई बार शांतिलाल जैन का नियमित पाठक उनका नाम पढ़ते ही रचना की बुनावट और विषय की नवीनता की कल्पना कर प्रस्तुति के एक विशिष्ठ फॉर्मेट की संभावना में पड़ जाता है. विविधता के बावजूद ऐसा होना मुझे निजी तौर पर खटकता है. मुझे लगता है किसी सुपरस्टार की शैली की बजाए शांतिलाल जैन जैसे सहज लेखक अपने सहज लेखन में भी उतना ही असर डालने में समर्थ हैं. जो उनके पूर्व में आए संकलनों की रचनाओं में बखूबी देखा जा सकता है.

वर्तमान समय की विसंगतियों, बेहुदगियों पर,मूर्खताओं पर वे बहुत प्रभावीरूप से चोट करते हैं। मजेदार यह कि  जिस पर रचना टिप्पणी करती है वही व्यक्ति मुस्कुराने पर विवश हो जाता है, किंतु भीतर कहीं न कहीं कांटे की चुभन तो महसूस कर ही लेता होगा।

संग्रह की कुछ रचनाएं कोरोना काल की स्थितियों, विसंगतियों पर लिखी गईं है अन्य रचनाएं भी इसी कालखंड की राजनीतिक,सामाजिक, मानवीय घटनाक्रमों, आचरणों और पाखंड पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करती हैं.

एक तरह से इस कठिन समय में जब हर अच्छी बुरी बात को नजर अंदाज करने में ही सामान्य जन अपनी भलाई देखने लगा है, सब कुछ भला भला लगने के दौर में शांतिलाल जैन का व्यंग्य संग्रह 'कि आप शुतुरमुर्ग बने रहे ' साहस के साथ जरूरी और रचनात्मक प्रतिरोध के रूप में अपने समय की विडंबनाओं को रेखांकित करता है.


श्री शांतिलाल जैन को बहुत बधाई और शुभकामनाएं.



( व्यंग्य संग्रह : कि आप शुतुरमुर्ग बनें रहें, लेखक : शांतिलाल जैन, प्रकाशक : बोधि प्रकाशन,जयपुर, कीमत : ₹200/ )


ब्रजेश कानूनगो

Saturday, March 16, 2024

चोर मचाए शोर

चोर मचाए शोर 

साहित्यिक क्षेत्रों का बहुकथित जुमला है कि इन दिनों खूब मात्रा में व्यंग्य लिखा जा रहा है. वास्तविकता में इसे जुमला नहीं कहा जा सकता. यह सच्चाई भी है कि इन दिनों व्यंग्य रचनाएं बहुत प्रकाशित हो रही हैं. किताबें भी खूब आ रही हैं. व्यंग्य तो पहले भी बहुत लिखे जाते रहे हैं, लेकिन प्रायः अच्छे व्यंग्य ही प्रकाशन का सौभाग्य पाते थे. लेखक और संपादक के स्तर पर पर्याप्त छटनी हो जाती थी. लेखक भी अच्छे बुरे की समझ रखता था. जो बेहतर होता था उसे ही प्रकाश में लाता था. संग्रह भी विलंब से लाता था ताकि बेहतर में से श्रेष्ठ रचनाओं को ही संकलन में दे सके. इसी श्रेष्ठता के इंतजार में अच्छे अच्छे रचनाकारों की पुस्तकें भी प्रकाशित होने से रह जाया करती थीं.


समर्थ लेखक व्यंग्यकार सुनील सक्सेना भी इसी मौके के इंतजार में अपनी पहली पुस्तक लाने का सुख भोगने में विलंबित हो गए. पारिवारिक साहित्यिक पृष्ठभूमि के साथ तेरह चौदह साल की उम्र से लिखने की शुरुआत करने के बावजूद उनकी पहली किताब नौकरी से सेवानिवृत्ति के बाद ही संभव हो पाई. आज की तरह सोशल मीडिया, अखबारों में व्यंग्य कॉलम की दैनिकता और प्रकाशन संस्थानों की सहज उपलब्धता बीस पच्चीस वर्ष पूर्व होती तो उनकी बेहतरीन रचनाओं का संग्रह काफी पहले ही आ चुका होता और उनकी बढ़िया रचनाओं के कारण बेहतरीन व्यंग्यकार के तौर पर उनकी पहचान होकर संभवतः पुरस्कृत भी किए जा चुके होते.


यह बात मैं यों ही नहीं कह रहा. हाल ही में आए उनके पहले व्यंग्य संग्रह 'चोर मचाए शोर ' की रचनाएं पढ़ने के बाद बहुत संतोष और ईमानदारी से कह पाने की स्थिति में हूं. खूब लिखे जा रहे तथाकथित व्यंग्य लेखों के समय में सुनील सक्सेना जी की रचनाएं भी समसामयिक प्रसंगों ,अटपटेपन, विसंगतियों और पाखंड की खबरों से निकलकर ही आती हैं लेकिन उनकी भाषा, पठनीयता और निर्वाह उन्हें विशिष्ठता प्रदान करता है. पठनीयता ही है जो उनकी वैचारिकता और व्यंजना को पाठक के भीतर तक  सहजता से प्रवेश भी कराती है और उसे उद्वेलित भी करती है. वे चाहे बिल्ली के गले में घंटी बांधने की बात करें या अंतरात्मा की, एक अदने से बटन को अपने व्यंग्य का माध्यम बनाएं या सड़क पर पड़े किसी नोट को. सुनील सक्सेना अपनी व्यंग्य दृष्टि को प्रमाणित भी करते हैं और पाठक को बांधे रख कर उस तक अपनी बात पहुंचा देते हैं. आम जनजीवन के रोजमर्रा के जुमले, फिल्मी गीतों के टुकड़े और जनरुचि के कथन उनकी रचनाओं की संप्रेषणीयता को सहज बनाने का काम करते हैं. रंगकर्मी होने का उनका अनुभव भी रचना के सहज संप्रेषण और आनंद को बढ़ाने में सहायक हुआ है. संग्रह की लगभग हर रचना उनके इसी सामर्थ्य को प्रमाणित करती है.


वरिष्ठ लेखक श्री सुनील सक्सेना के विलंब से आए पहले व्यंग्य संग्रह ' चोर मचाए शोर ' का निसंदेह श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाओं के पाठकों द्वारा भरपूर स्वागत किया जाना चाहिए. बधाई और शुभकामनाएं.




(पुस्तक : चोर मचाए शोर, व्यंग्यकार : सुनील सक्सेना, प्रकाशक : न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नईदिल्ली, मूल्य : 300 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो

उत्कृष्ट लघुकथा विमर्श

उत्कृष्ट लघुकथा विमर्श

कोई भी व्यक्ति लेखन का गुण लेकर पैदा नहीं होता. बोलने,सोचने,समझने की शक्तियां धीरे धीरे विकसित होती जाती हैं, बोलने के साथ अभिव्यक्त करने की देह भाषा की तुलना में लिखकर शब्दों में अभिव्यक्ति का माध्यम अपेक्षाकृत रूप से बहुत लंबे अंतराल के बाद अर्जित होता है. वातावरण और उचित पर्यावरण में व्यक्ति के भीतर लिखने पढ़ने की रुचि अवश्य जागृत होने लगती है. मन में उठे विचारों को वह शब्द देने लगता है. क्या जो कुछ वह अभिव्यक्त करता है सब कुछ साहित्य सृजन होता है? हर लिखा साहित्य की श्रेणी में नहीं आता. यह एक वृहद विषय है.


आज हम हिंदी साहित्य की बात करें तो तमाम मतांतरों के बीच आज के समय में व्यंग्य के बाद लघुकथा को सबसे नवीनतम विधा के रूप में मान्यता मिली है. हाल फिलहाल आज के व्यस्त समय में जब साहित्य आम लोगों की प्राथमिक रुचि में नहीं है तब लघुकथा जैसी कम समय लेने वाली रचना पाठकों और रचनाकारों को कुछ अधिक आकर्षित करने लगी है. यह बिल्कुल परीक्षित तथ्य है कि रचना वही हमारे भीतर उतरती है जिसमें संप्रेषण की सफलता के साथ सौंदर्य हो. इसीलिए हरेक विधा का अपना एक सौंदर्य शास्त्र भी विकसित हो जाता है. सौंदर्य शास्त्र के अनुरूप रचना का सृजन उसकी महत्ता और प्रभाव को बढ़ाता है.


व्यंग्य विधा और लघुकथा विधा का सौंदर्य शास्त्र अपने विकास के क्रम में है. ऐसे में बहुतेरे प्रयास भी हो रहे हैं. श्री दीपक गिरकर जैसे प्रबुद्ध पाठक, समीक्षक और रचनाकार ने इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए ' उत्कृष्ट लघुकथा विमर्श ' पुस्तक के माध्यम से बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया है. पुस्तक में लघुकथा को लेकर विभिन्न विद्वानों के छब्बीस आलेख हैं. लघुकथा विधा में सृजनरत नव लेखकों के साथ साथ पुराने लेखकों को भी दिशा देने में इनकी उपयोगिता असंदिग्ध है.

इस पुस्तक के दूसरे खंड में अट्ठाइस श्रेष्ठ लघुकथाओं को भी संकलित किया गया है जिनसे विभिन्न शैलियों में और भिन्न विचारों व विषयों को विधा में अभिव्यक्ति देने की कला को निखारने में सहायता मिलती है, समझ का विकास होता है.


लेखन में रुचि रखने वाले व्यक्ति को खासतौर से जो लघुकथा लिखने की कोशिश करता है, एक बार इस पुस्तक को अवश्य पढ़ना चाहिए. श्री दीपक गिरकर जी को इस पहल के लिए हार्दिक बधाई. सीहोर के शिवना प्रकाशन ने इसे बहुत बढ़िया प्रकाशित किया है. आकर्षक आवरण चित्रकार श्री संदीप राशिनकर ने तैयार किया है जो विषयवस्तु की गंभीरता को अभिव्यक्त करता है.  निश्चित ही उत्कर्ष लघुकथा विमर्श का एक महत्वपूर्ण और उपयोगी पुस्तक के रूप में स्वागत किया जाना चाहिए.



( पुस्तक : उत्कर्ष लघुकथा विमर्श, संपादक : दीपक गिरकर, प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, सीहोर, कीमत : 400 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो