काबुल की कठोर भूमि : विधा के ठोस धरातल पर व्यंग्य रचनाएं
श्री सुनील जैन राही का नवीनतम संग्रह ' काबुल की कठोर भूमि ' जयपुर के बोधि प्रकाशन से हाल ही में (2023) आया है. इस छोटी सी पुस्तक में राही जी की पच्चीस छोटी छोटी रचनाएं हैं. रचनाओं की संक्षिप्तता के बावजूद इनके विषयों में पर्याप्त विविधता के साथ राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय विषयों पर गहरा निरीक्षण, सामाजिक दृष्टिकोण, सरोकारी विवेचन और सटीक व्यंजना देखी जा सकती है.
सुनीलजी स्वयं को व्यंग्य के उद्दंड विद्यार्थी के रूप घोषित करते रहते हैं, उनमें कितनी उद्दंडता है इस पर टीका तो नहीं कर सकता लेकिन वे केवल व्यंग्य विधा ही नहीं बल्कि साहित्य, समाज और जीवन संस्कृति को सीखने समझने के उपक्रम में सदैव एक विनम्र और कुशाग्र छात्र के रूप में प्रमाणित तो अवश्य ही करते रहते हैं. उनकी कई पुस्तकों, लेखों और रचनाओं में इसका सहज आकलन किया जा सकता है.
यह मुझे अतिरिक्त अवसर उपलब्ध है कि सोशल मीडिया के समूहों में उनकी एक विशिष्ठ और आलोचनात्मक दृष्टि और टिप्पणियां देखने पढ़ने को मिलती रहती हैं. अपने मन की बात और प्रतिक्रिया में यदि वे खरा खरा कहने का साहस रखते हैं तो अन्य विचारों पर असहमति के साथ उसको समझने और अपनी समझ को ठीक कर लेने की विनम्रता और बढप्पन भी उनके एक बेहतर विद्यार्थी होने को सिद्ध करता है. इसी सीखने समझने के क्रम में व्यंग्य की आलोचना विधा में उनकी दो किताबें प्रकाशित और काफी चर्चित हुई हैं.
बहरहाल, यहां बात व्यंग्य संग्रह ' काबुल की कठोर भूमि ' की ही करते हैं. संग्रह की पहली आठ रचनाओं में अफगानिस्तान के हालातों, तालिबानी संस्कृति के परिणामों और वहां के समाज की बदलती स्थितियों में बंदूक की नोक पर पसरी विवशता, कठोरता, स्त्रियों की प्रताड़ना पर व्यंग्यकार उद्वेलित होकर सजग टिप्पणी करता है. कई जगह पाठक के भीतर तक दुख और करुणा का संचार होने लगता है. इन्ही रचनाओं के कारण संकलन का शीर्षक ' काबुल की कठोर भूमि ' बहुत सार्थक बन पड़ा है.
संग्रह की अन्य रचनाएं भीं सुनील जैन राही की व्यंग्य विधा की गहरी समझ और व्यंग्य के औजारों के उपयोग यथा भाषा, विट, पंच,उपमा, व्यंजना आदि की प्रभावशीलता को भी स्वीकृति देती हैं. सियासत बदलने से खुश हैं जंगल की अवाम, हंसी का मोहताज जैसी अनेक रचनाओं को पढ़कर इसे आसानी से समझा जा सकता है.
इस संकलन में व्यक्तिगत तौर पर मुझे 'गड्ढे में गद्दा डालकर बैठा व्यंग्यकार ' श्रेष्ठतम और राही जी की व्यंग्य लेखन पर व्यापक पकड़ की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण लगी. रचना में जैसे वे व्यंग्य विधा के सारे औजारों का उपयोग करते हुए अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता और लेखकीय सरोकारों के साथ विसंगतियों, विडंबनाओं के विशाल गड्ढे में देशहित का झंडा फहराते किसी आंदोलनकारी के रूप में जा बैठे हों. यह रचना व्यंग्यकार को उसके वास्तविक धर्म और कर्म का स्मरण भी कराती है और संकल्पित होने को बाध्य भी करती है. संपूर्ण रचना रोचकता से बात तो कहती ही है, उद्वेलित भी करती है. राही जी सच ही लिखते हैं,
' व्यंग्यकार विसंगति को देखकर चुप नहीं रह सकता. समाज, राजनीति, धर्म, मजहब से विसंगति की सड़ांध की गंध से वह विचलित होता है, ऐसी सड़क की खोज में जुट जाता है जहां से सरकार की कार गुजरती हो, आराम परस्त रईसों की बग्गियां निकलती हो, हुक्मरानों के शाही जनाजे का इंतजार करती रियाया रिरियायती हो. इसलिए व्यंग्यकार सत्ता, राजनीति, धर्म, मजहब की आंखों में सबसे ज्यादा चुभने वाली चीज है. वह आइना है, जिसमें भद्दी सूरत भद्दी नजर आती है, चेहरे की चालाकियां आंखों का कमीनापन और रहम की झूठी नजरे स्पष्ट दिखाई देती हैं.'
ऐसी ही सार्थक रचनाओं से गुजरना चाहने वाले पाठकों को सुनील जैन राही का व्यंग्य संग्रह 'काबुल की कठोर भूमि ' अवश्य पढ़ना चाहिए. लेखक को बहुत बधाई और शुभकामनाएं.
( व्यंग्य संग्रह : काबुल की कठोर भूमि, लेखक : सुनील जैन राही, प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर, मूल्य : 150 रुपए)
ब्रजेश कानूनगो