Saturday, January 6, 2024

व्यंग्य के वायरस

व्यंग्य के वायरस :

वायरस नहीं लंबी रेस का घोड़ा है व्यंग्यकार

युवा व्यंग्यकार ऋषभ जैन की रचनाएं यद्यपि पत्र पत्रिकाओं में पढ़ने को मिलती रही हैं किंतु हाल ही में भावना प्रकाशन से आया उनका नवीनतम व्यंग्य संकलन 'व्यंग्य के वायरस' हाथ में आया है। ऋषभ की व्यंग्य दृष्टि और उनकी व्यंग्य भाषा ने खासा प्रभावित किया है।


मेरा मानना रहा है कि भाषा के विद्यार्थी या अध्येता की बजाय विज्ञान अथवा अन्य तकनीकी क्षेत्रों से लेखन में आए व्यक्तियों में व्यंग्य दृष्टि और उसके निर्वाह की क्षमता अपेक्षाकृत अधिक संभव होती है। ऐसा भी नहीं है कि भाषा से आए लोगों ने अच्छा सृजन नहीं किया है किंतु अन्य क्षेत्रों विशेषकर विज्ञान,चिकित्सा,तकनीकी क्षेत्रों में कार्यरत लेखकों को एक विशेष नजरिया और अभिव्यक्ति का खास कौशल अतिरिक्त रूप से मिल जाता है। वे परीक्षण, विश्लेषण के बाद अभिव्यक्ति का जो तरीका या या शैली का चुनाव करते हैं उससे पाठक अधिक चमत्कृत होकर व्यंजना को सहज अनुभव करता है, प्रभावित होता है।

ऋषभ विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं। लेखा और लेखा परीक्षण उनकी आजीविका क्षेत्र है। संग्रह को पढ़ते हुए मेरी अपनी उक्त मान्यता को बल मिला कि उनका संग्रह मुझे इतना क्यों प्रभावित कर रहा।


'व्यंग्य के वायरस ' से पहले उनका एक संग्रह 'रंग रंगीला प्रजातंत्र' आ चुका है। लगातार अभ्यास और सीखते हुए निश्चित ही नवीनतम संग्रह को पिछले संकलन से बेहतर होना ही था। इस नए संकलन में कोराेना महामारी के दौर की विसंगतियों से संबंधित रचनाओं का आधिक्य है किंतु वे हमेशा प्रासंगिक इसलिए रहेंगी कि उनके भीतर जो कथ्य की आत्मा और समय का सच है उनमें सार्वकालिकता दिखाई देती है।


ऋषभ के लिखे में विविध विषयों मसलन इतिहास, दर्शन,राजनीति और प्रशासन तंत्र के अध्ययन और समझ का आलोक उसमें चमक और रोशनी पैदा करता है।


कुछ रचनाओं में ऋषभ जैन किस्सागोई करते नजर आते हैं। कुछ में विक्रम बेताल प्रारूप में भी अच्छी रचनाएं लाते हैं। निश्चित ही उनमें लंबी रचनाओं के सृजन की बड़ी संभावनाएं हैं। पहला व्यंग्य 'अतिशय रगड़ करें यदि नृप भी..' ही इस बात को पुष्ट कर देता है। ' परफ्यूम की सुडौल शीशी' जैसी अनेक रचनाएं ऋषभ जैन के कौशल को प्रमाणित करती हैं।


'फाड़ना मनुष्य का मूलभूत गुण', 'लो आकाश भी बिक गया', 'मंदी मंद होने की उम्मीद 'आदि जैसी कुछ रचनाएं अखबारों के सीमित स्पेस के लिए प्रकाशन के मोहवश भले लिखीं गई हों परंतु वे भी भीड़ से अलग तो हैं ही। फिर भी ऋषभ ऐसे मोह में न पड़ेंगे तो हिंदी व्यंग्य की दौड़ में बहुत आगे तक पहुंचने की ऊर्जा अर्जित कर अपनी पताका फहराने में निश्चित ही कामयाब होंगे। 


बहरहाल, 'व्यंग्य के वायरस' को पढ़ते हुए हिंदी व्यंग्य विकास और बेहतर भविष्य के संकेत मिलते हैं। हरेक रचना बहुत रोचक,पठनीय है और विडंबनाओं और समय की मूर्खताओं पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करने में सफल हुई है। व्यंग्यकार श्री ऋषभ जैन को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।




(पुस्तक : व्यंग्य के वायरस, लेखक : ऋषभ जैन, प्रकाशक : भावना प्रकाशन दिल्ली, कीमत: 425 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो

कहानी संग्रह ‘वसंत का उजाड़’ पढ़ने के बाद

कहानी संग्रह ‘वसंत का उजाड़’ पढ़ने के बाद

 

वरिष्ठ कथाकार डॉ प्रकाश कान्त के कहानी संग्रह ‘वसंत का उजाड़’ को एक बैठक में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। प्रत्येक कहानी स्वाध्याय की मांग करती है। जो कुछ पढ़ते हैं उसको महसूस करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। मैंने कुछ ऐसा ही किया और तेरह कहानियां अलग अलग तेरह दिनों में पढ़कर वास्तविक सुख की अनुभूति की। यही कारण है कि कहानियों को पढ़ते हुए थोड़ा बहुत जो मुझे महसूस हुआ, एक विद्यार्थी पाठक की तरह यहाँ कहने की कोशिश की है। 


प्रत्येक कहानी से गुजरने के  बाद मन पर उसका देर तक गहरा प्रभाव बने रहने के कारण उस कथा समय से लौटने का मन ही नहीं करता। जैसे कहानीकार मेरी अपनी, मेरे अपने अतीत की बात कर रहा हो। अतीत कैसा भी क्यों न रहा हो,अपने में जकड़ लेता है। और कहानी का देशकाल और जीवन चित्रण, पात्र, मुझे अपनी ही स्मृतियों का हिस्सा लगने लगे तो थोड़ा रुकने का मन करता है। अनुभूतियों को फिर फिर प्राप्त करने को जी चाहता है। 


पहली कहानी 'एक नदी-समय के बाद' और आज 'मरुस्थलों के विरुद्ध' पढ़ीं तो ऐसा ही महसूस हुआ। पत्नी,घर,परिवार और साधारण मध्यमवर्गीय व्यक्ति की मनः स्थिति व जीवन शैली की छोटी छोटी बातों, आदतों को इस संवेदनशीलता से कहा गया है कि पाठक भावुक हुए बिना रह ही नहीं सकता। कई जगह तो लेखक और नायक लगभग एक ही लगने लगते हैं। नायक का समय हमारा समय हो जाता है। नायक की संवेदनाएं और संवाद जैसे हमारे ही हो गए हों। वे सामने घटित होते नजर आने लगते हैं। स्वाभाविक,सहज चित्रण जैसे घर में ही सब कुछ चल रहा हो। अद्भुत है। कहानियों से जो रिस कर भीतर उतरता है, उसके लिए फिलहाल कोई उचित शब्द ही नहीं सूझ रहा। वह स्पंदन तो बस पढ़कर ही महसूस किया जा सकता है। 


आमतौर पर मालवी,निमाड़ी में किसी खास औरत के लिए 'सिड़ली' शब्द का प्रयोग बहुत होता है। आदमी के लिए 'सिड़ला' चलन में है। अब इसे खप्ति या सनकी जैसे शब्दों के नजदीक भले रखा जा सके, किन्तु फिर भी इनसे वह बहुत अलग है। यह 'बावला' या 'बावली' से भी अलग है। 'बेंडा' भी ठीक नहीं बैठता। इस प्रकृति या स्वभाव के व्यक्ति को यदि ठीक से समझना है तो आपको डॉ प्रकाशकान्त की कहानी 'सिड़ली' को पढ़ना होगा।


'वसंत का उजाड़' संग्रह की तेरह कहानियों में से 'सिड़ली' कहानी बहुत अनोखी है। अनोखी इसलिए कि यह कहानी मुख्य पात्र के माध्यम से निम्नमध्यम वर्ग की औरत के स्वभाव और मनःस्थिति में आई कर्कशता, कठोरता के पीछे के कारणों पर से बिना किसी बौद्धिक प्रपंच के, बिना किसी नाटकीयता से पर्दा उठाती है। बहुत संभव है ये कहानी आज के महानगरीय पाठकों को अतिशयोक्ति की तरह लगे लेकिन जिन्होंने कस्बों,छोटे शहरों की मिलीजुली बस्तियों को नजदीक से देखा और जिया होगा उनके लिए यह अजूबा नहीं है। वास्तविकता है। बहुत से लोगों ने बचपन के मोहल्लों में ऐसे पात्रों को रोज रोज देखा होगा,अनुभव किया होगा।

कहानी की औरत के अपने दुख हैं, जवान होती दो बेटियां हैं,संताप हैं, अशिक्षा है, लगभग निष्क्रिय सा मर्द है। बेटियों को लेकर शादी की चिंताएं हैं। शक है,असुरक्षा है। कई कारण हैं जो व्यक्ति को चिड़चिड़ा, आक्रामक, गुस्सैल,अशिष्ट,असभ्य बना देते हैं। कहानी की नायिका को इन्ही सब विशेषताओं की वजह से 'सिड़ली' कहा गया है। ऐसे में नायिका को भी समाज की बहुत बड़े वर्ग की स्त्रियों की तरह ही ईश्वर का सहारा और धार्मिकता में समस्याओं का रास्ता नजर आने लगता है। लेकिन यहां भी तो बहुत सारी असुरक्षा व्याप्त है, शक से छुटकारा नहीं। परिवार की तबाही के बाद 'हरे राम हरे कृष्णा' कहती दोहराती 'सिड़ली' अपना संतुलन पूरी तरह खो बैठती है। कहानी समाज के निम्न वर्ग के जीवन को मनोविज्ञानिक दृष्टिकोण से सूक्ष्मता से अभिव्यक्त करती है। 


कहानी के लिए मुख्य पात्र को चुनना बहुत महत्वपूर्ण होता है। प्रकाश कांत जी का इस चयन में किसी से कोई मुकाबला ही नहीं। एक तरफ दबंग और लड़ाकू प्रकृति की 'सिड़ली' जैसी अपने ही दुखों में डूबी औरत है तो दूसरी ओर 'बाबू बिगुलवाला' जैसा सामान्य कांस्टेबल भी है जो पुलिस गतिविधियों में बस 'बिगुल' बजाने की नौकरी करता है। 

'बिगुल' कहानी पढ़ते हुए बरबस मुझे देवास के कलाकार बशीरखां याद आए। वे एक दुर्लभ वाद्य 'नसतरंग' बजाया करते थे। बजाया क्या करते थे,उन्होंने इस वाद्य के वादन में अपना जीवन होम कर दिया था। वाद्य को गले की नस पर रखकर अपनी धमनियों में हवा भरकर कम्पन करके इसे बजाते थे। बाद में फेफड़ों ने जवाब दे दिया। बीमारी का इलाज करवाते हुए ही चल बसे। कहानी का नायक बिगुल बजाता है। शंख फूंकने जैसा ही कष्ट साध्य काम। पर यही तो रोजी रोटी है बाबू बिगुलवाले की। पुलिस विभाग की ड्यूटी के दौरान पुलिस लाइन की हर रोलकाल में ,सलामी,श्रद्धांजलि के वक्त जरूरी वादन, बिगुल की गूंज। इसके अपने राग,अपनी खास धुने। जैसे बाबू बिगुलवाले के जीवन की लय, उसकी अपनी खांसी। 


कहानीकार बिगुल के माध्यम से कहानी में बड़े अच्छे रूपक रचते हैं। जिनमें व्यंग्य है,जमाने की व्यथा है। करुणा है। फैंटेसी भी कहीं कहीं। बापू भी बिगुल बजाते हैं। कृष्ण और शिव भी बिगुल फूंकते हैं शंख है उनका बिगुल यहां। शंख फूंकना, बिगुल फूंकना। जन जागरण और इंकलाब का बिम्ब। पर गांधी के बिगुल फूंकने से अब कोई नहीं जुटता। पुलिस वाले जमा होते हैं तो वे भी अपनी नौकरी की वजह से। गांधी का बिगुल प्रभावहीन हो जाता है। कहानी की ध्वनि में यही संकेत है । सांकेतिकता में बड़ी बातें हैं यहां।

हर मय्यत में दूसरों के लिए बिगुल बजाने वाले बाबू की हत्या हो जाती है। दंगों में एक बेबस लड़की की आबरू बचाने में दंगाइयों के चाकुओं से घायल बाबू बिगुलवाला शहीद हो जाता है। 

श्रद्धांजलि स्वरूप बिगुल यहां भी बजाया जाता है। बाबू की जगह अब यह जिम्मेदारी ओंकार के पास है।


कथासंग्रह की पांचवी कहानी है 'कोंडवाड़ा'। शीर्षक पहली बार में एकदम से समझ में नहीं आया लेकिन एकाध पेरा पढ़ते ही पता चल जाता है कि यह कहानी नगर प्रशासन के 'काँजी हाउस' जैसे विभाग के एक अदने कर्मचारी बशीर खाँ पर केंद्रित है। मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि मैं 'कोंडवाड़ा' शब्द से अब तक परिचित नहीं था। 'काँजी हाउस' को ही जानता,समझता था। शीर्षक के साथ साथ कहानी के निर्वाह को पढ़कर ही समझा जा सकता है कि कहानीकार प्रकाश कांत जी विषय से सम्बंधित समूचे वातावरण और जीवन से कितनी शिद्दत से जुड़कर कहानी रचते हैं। रचते ? शायद यह कहना उचित नहीं होगा। कहना चाहिए विषयवस्तु को जीते हैं और अपनी अभिव्यक्ति से पाठक को भी वहां ले कर चले आते हैं। लेखक के साथ साथ पाठक भी कहानी के पात्र बशीर खां का ही हिस्सा होकर दृश्य और उन्ही मनःस्थितियों से गुजरने लगता है।


हिंदी फिल्मों के चरित्र अभिनेता प्राण साहब के बारे में कहा जाता था कि वे किसी चरित्र को निभाने से पूर्व कुछ समय उसी परिवेश और उस तरह के व्यक्ति के साथ बिताते थे। बताते हैं शबाना आजमी ने भी 'मंडी' जैसी फ़िल्म में तवायफ की भूमिका के पहले किसी कोठे के वातावरण को कुछ दिन महसूस किया था।  स्वाभाविक और ईमानदार अभिव्यक्ति की यही एप्रोच मुझे प्रकाशकान्त जी की रचना में भी अनुभव होती है। निश्चित ही 'कोंडवाड़ा' जैसी रचना लिखते हुए बहुत संभव है उन्होंने काँजी हाउस के इंचार्ज और अदने कर्मचारी से दोस्ती की होगी। इस कहानी में उनके बारीक निरीक्षणों से यह बहुत आसानी से समझा जा सकता है। चाहे वह काँजी हाउस दफ्तर का बरसों पुराना 'इंक पेड' हो या रसीद कट्टे हों अथवा फटा पुराना खाकी कागज का इंद्राज रजिस्टर। 

बशीर खाँ बहुत सीधा सादा लेकिन अपने काम के प्रति बहुत निष्ठावान और ईमानदार है। मुस्लिम है। नमाजी है। रोजे भी रखने की कोशिश करता है। लेकिन काम के आगे नमाजें और रोजे भी छूट जाएं तो छूट जाएं। इसके बावजूद या इसके कारण भी उसका शोषण है। ईमानदारी और कर्मठता के बावजूद सस्पेंड होता है। दंडित किया जाता है। यही कारण है कि कहानी के अदृश्य पात्र 'पाठक मास्टर' की बात ठीक लगती है, 'बशीर मियां,जब तुम्हारी यहां से रसीद कटेगी न प्यारे,तो बिना तुम्हारे दस्तखत या अंगूठा निशानी लिए ही कटेगी।'

कहानी के पाठक के भीतर भी यह बात उतार देने में प्रकाश कांत सफल होते हैं।

कहानीकार ने बशीर खाँ, उसकी पत्नी,बेटे,खाला आदि के जरिये घनी तंग बस्तियों के जीवन और खासतौर से निम्न वर्गीय गरीब,परेशान मुस्लिम परिवारों की कठिनाइयों व जीवन शैली की बड़ी मार्मिक तस्वीर 'कोंडवाड़ा' में चित्रित की है। कहानी तब और भीतर तक उतर जाती है जब संकेत होता है, यह दुनिया भी तो किसी बड़े 'कोंडवाड़ा' से कम नहीं।


‘भीतर बाहर से बंद इतिहास’, संग्रह की अपेक्षाकृत थोड़ी लम्बी कहानी है। संग्रहालय, पुरातत्व और इतिहास जैसे कर्कटी और प्रायः बोझिल विषय को प्रकाशकान्त जी ने संवेदनाओं की बूंदों से ऐसी स्निग्धता प्रदान की है कि पता ही नहीं चलता कि कब इतने सारे पन्ने पढ़ लिए गए। यह इस कहानी की खास विशेषता है। 'कोंडवाड़ा' कहानी के मुख्य किरदार बशीर खाँ की तरह ही इस कहानी का मुख्य पात्र भी एक साधारण सा समय की मार खाया  आम कर्मचारी और संग्रहालय का अदना इंचार्ज है। प्रकाशकान्त जी के ज्यादातर पात्र समाज या व्यवस्था की निचली पायदान से ही निकलकर आते हैं। बरसों से नगर निगम के उपेक्षित से संग्रहालय का कामकाज देखने वाला बुजुर्ग व्यक्ति खुद भी किसी खंडित मूर्ति या शिल्प की तरह ही होते जाता है। यहां तक कि उसी की बेटी के शब्दों में उनके कपड़ों से ही इतिहास की गंध आती है। इतिहास को लेकर कहानी में कई विचार पूर्ण संदर्भ बहुत प्रभावी रूप से किन्तु बहुत सहजता से बहते रहते हैं।


हमारा पूर्वाग्रह यही रहा है कि इतिहास आदि जैसे विषय में नीरसता होगी ही, कहानी से गुजरते हुए इसके ठीक उलट, बहुत से हिस्से में खासकर बेटी विनी के साथ के प्रसंगों को पढ़ते हुए हम बहुत हल्के हो जाते हैं। जगह जगह बहुत विनोदपूर्ण संवादों के कारण मुस्कुराने के साथ मन भाव विह्वल हो जाता है। चाहे गंदे अक्षरों को सुधारने में विनी की अनेक बहाने बनाने की आदत हो। उसी विनी की शादी के बाद माँ पिता को उसके द्वारा लिखे खत मिलने पर उसे बार बार पढ़ना और भीग भीग जाना हो।

बेटी कहती है, पिताजी आपके जूते लार्ड क्लाइव के हैं। घड़ी सुभाषचन्द्र बोस की। चश्मा चर्चिल का। फाउंटेन पेन भगतसिंह का और साइकिल वही जिसका इस्तेमाल सांडर्स को मारने के लिए लाहौर के पुलिस थाने के सामने किया गया था...। पिता कहते हैं, तब तो मुझे संग्रहालय में रख देना चाहिए! तो फिर अभी आप कहाँ हैं। वहीं तो हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आपको घर आने जाने की सुविधा मिली हुई है। बेटी हंसती है।

कितना निर्मल लेकिन कितना विचारित, सांकेतिक विनोद। ऐसे कई मार्मिक प्रसंग कहानी की स्निग्धता है। पाठक के भीतर करुणा का संचार करती अद्भुत रचना जो मूल विषयवस्तु का सूत्र प्रारम्भ से अंत तक थामे हुए रहती है।

'आपका 'आज' हमेशा बीते हुए कल में रहता है। आपका 'आज' कभी भी अपने में नहीं रहे।अब निकलो इस बीते हुए कल से और जितने 'आज' बचे हों, आज की तरह ही जी लो। आखिर कब तक मरे हुए कल में रहोगे।' 

इन शुरुआती और सारगर्भित पंक्तियों से शुरू हुई यह कहानी अंत में दंगों का इतिहास दोहराती है। संग्रहालय का बूढा इंचार्ज अपने को खंडित मूर्तियों की ओट में छुपाते हुए स्वयं इतिहास हो जाता है। भीतर इतिहास बन्द होता है। बाहर संग्रहालय के गेट पर कोई ताला जड़ जाता है। इतिहास बाहर,भीतर दोनों तरफ से बंद हो जाता है।


'आजाद अटालेवाला' कहानी में लेखक का सूक्ष्म अवलोकन पुनः हमारा ध्यान खींचता है। अटालेवाला या वह कबाड़ी किस तरह सोता बैठता है,रहता है सब कुछ। उसका बोलना,टॉवेल लपेटकर कुल्ला करना। इसमें सबसे बढ़िया है अटाले में आई वस्तुओं से अपने जीवन की जरूरतों के लिए किया गया जुगाड़। जुगाड़ भी ऐसा जैसे किसी देह की शल्यक्रिया। बहुत रोचक चित्रण है। उसके द्वारा की जाने वाली चीजो की सर्जरी का चित्रण पढ़ने में बड़ा आनन्द आता है। टूटी फूटी बेकार वस्तुओं की हार्ट सर्जरी, किडनी ट्रांसप्लांट। अद्भुत है। जुगाड़ के रेडियो का बजना। पढ़कर ही आनन्द लिया जा सकता है। मैंने तो इस तरह का बारीक और सटीक चित्रण किसी व्यंग्य रचना में भी अब तक नही पढा है। बहुत खास और अद्भुत है यह वर्णन। 'आजाद अटालेवाला।


समाज के मामूली आदमी को अपनी कहानी का मुख्य पात्र बनाने की खास पसंद को आगे बढाते हुए जहां डॉ प्रकाशकान्त ने 'आजाद अटालेवाला' लिखी है वहीं 'अब इस तरह' में उनका नायक अपने ही कस्बे में बरसों बाद अपनी पोस्टिंग के दौरान लोहारी का काम करने वाले बुजुर्ग 'रहमत खाँ' से मिलकर बचपन के उस दौर की मार्मिक स्मृतियों को याद करके भीग भीग जाता है। इस कहानी में 'आधार कार्ड' जैसा मुद्दा भी अर्थपूर्ण सन्दर्भों  के साथ नजर आता है। संस्थाओं में बुजुर्ग लोगों की परेशानियों के बीच नायक का उनके साथ संवेदनशील रवैया आशा जगाता है। 


शीर्षक कथा 'वसंत का उजाड़' में लेखक छोटे कस्बे की एक संगीत गोष्ठी के आयोजन का सजीव चित्र खींचते हैं। बरसों बाद अपने ही कस्बे में लौटा एक सामान्य गायक पंडित रामप्रसाद शास्त्री अपने ही लोगों के बीच अपने हुनर  से उस गोष्ठी को यादगार बना देने के स्वप्न के साथ शानदार प्रदर्शन करते हैं किंतु इस खास 'वसंत गोष्ठी' में अचानक एसडीएम साहब जैसे माननीय के आ जाने से गोष्ठी और रसिको में 'उजाड़' की स्थिति बन जाती है। अपने शहर में अपनों के बीच हर सफल व्यक्ति को अपने श्रेष्ठतम प्रदर्शन और मान पाने की जैसी मानवीय तमन्ना रहती है.  इस कहानी में यही भावना सफलता से रेखांकित हुई है।


'लिपियों के तहखाने' कहानी हमें एक बार फिर ऐसे अतीत में ले जाती है जहां 'आजूबा' जैसे खास किरदार के बहाने कहानीकार मराठी में बने दस्तावेजो में 'मोड़ी' जैसी लुप्त लिपि की बात करते हैं। उस जीवन की भी बात करते हैं जो प्रायः अब लुप्त ही है। मोड़ी जानने समझने वाले आजूबा याने टी जी नान्देड़कर जैसे चरित्र भी अब दिखाई नहीं देते। मोड़ी लिपि की तरह ही स्मृतियों के तहखाने में न जाने कहाँ दबे पड़े हैं। सम्भव है यह कहानी लेखक के वास्तविक जीवन से नजदीक का रिश्ता रखती हो। यही कारण है कि यह कहानी नहीं एक तरह से 'दृश्यनवीसी' है। एक एक दृश्य इस तरह लिखा गया है जैसे लेखक स्मृतियों के तहखाने में चाबियों का गुच्छा लेकर उतर पड़ा हो।


'आजादी का प्रसाद' का बूढा व्यक्ति हो या  'उजाड़ की तरफ' का पिता और उसकी की व्यथा, कहानियां मामूली आदमी की थकान और निराशा को ही करुणा के साथ बयान करती हैं। कहानी 'उजाड़ की उस तरफ'  का मुख्य पात्र जीवन में उदासी और ऐसे ही अंधेरों और परेशानी से घिरा है। घर,दफ्तर,जीवन में हर तरफ अंधेरे में डूबा एक पिता किस तरह अखबारों में छपने वाले भविष्यफल देखता उजाले की आशा में जी रहा होता है। अद्भुत है। इसी तरह मुंहबोले रिश्तों के निर्वाह और सुख दुख में रक्त संबंधों से बेहतर साथ निभाने वाले आत्मीय मामाजी हैं संग्रह की अंतिम कहानी 'सूखते हुए दरख्त' में। 


इस संग्रह की सभी कहानियां समाज के बहुत मामूली लोगों के जीवन,उनकी मुश्किलों और उनके संघर्षों के सजीव चित्र कहे जा सकते हैं। उनकी निष्ठा, ईमानदारी और सहज जीवन ही उनके कष्टों का कारण किस तरह बन जाता है यह सब बहुत संवेदनाओं के साथ ज्यादातर कहानियों में अभिव्यक्त हुआ है। आलोचना के शब्दों में कहें तो करुणा,आक्रोश, सुख,दुःख सब कुछ कहीं भीतर ही भीतर बहता, रिसता रहता है. बिना किसी उद्घोष के लोगों की छोटी छोटी लड़ाइयों के बिगुल बनती ये कहानियां मामूली लोगों की उम्मीदों और सपनों के पूरा होने की आकांक्षा को भी रेखांकित करती हैं।   



(पुस्तक : वसंत का उजाड़, लेखक : प्रकाश कान्त, प्रकाशक : अंतिका प्रकाशन प्रा. लि., गाजियाबाद, कीमत : रु 350 )


ब्रजेश कानूनगो

Wednesday, January 3, 2024

सुना है आप बड़े उल्लू हैं! प्रतीकों में व्यंग्य की चौरंगी छटा

सुना है आप बड़े उल्लू हैं!

प्रतीकों में व्यंग्य की चौरंगी छटा


सुना है आप बड़े उल्लू हैं! मैं यह पाठकों को नहीं सुना रहा. दरअसल यह डा तीरथ सिंह खरबंदा के पहले व्यंग्य संग्रह का दिलचस्प शीर्षक है जो हाल ही में इंडिया नेटबुक्स प्रा. लि. नोएडा से प्रकाशित होकर आया है. इस संग्रह में कुल बावन रचनाएं हैं जो अपने शीर्षक की तरह ही रोचक हैं और प्रभावित करती हैं.


व्यंग्य लेखन में तीरथ जी का प्रवेश यद्यपि देर से हुआ है लेकिन पूरी तैयारी और जीवन के तमाम अनुभवों को प्राप्त करने के बाद परिपक्वता के साथ हमारे सामने आता है. लेखक विधि विषय में पी एच डी हैं, चालीस वर्षों का बैंकिंग अनुभव रखते हैं, कर्मचारी संगठनों में काम किया है, शिक्षण और सामाजिक सक्रियता ने उन्हें चीजों को समझने का खास नजरिया दिया है. इसलिए बीते समय और वर्तमान समय के सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक वातावरण के बीच से उनकी सहज व्यंग्य दृष्टि रचनाओं में परिलक्षित होती है.


खरबंदा जी की प्रस्तुत रचनाओं में पशु पक्षियों व अन्य प्राणियों के प्रतीकों का खूब इस्तेमाल हुआ है. पंचतंत्र की कहानियों से प्रेरित होकर उस  प्रारूप में कई लेखकों ने व्यंग्य लिखे हैं लेकिन खरबंदा जी के व्यंग्य उनसे बिलकुल अलग हैं. उनकी रचनाओं में पंचतंत्र की कथाओं की तरह ये पात्र बनकर ये प्रतीक नहीं आते बल्कि व्यंजना और उपमा या लक्षणा के तौर पर व्यंग्य और उलटबांसी के रूप में शामिल होते हैं. उल्लू, तोते,घोड़े,चिड़िया,गधे,भैंस,कुत्ते आदि का प्रयोग दिलचस्प अंदाज में हुआ है. उनके रचना शिल्प में ये प्रतीक बड़े उपयोगी बन पड़े हैं. इसके अलावा वर्तमान दौर के विभिन्न क्षेत्रों में खासतौर से राजनीति के बलशाली और दबंग चरित्रों के लिए लेखक ने ' गब्बर सिंह ' जैसे लोकप्रिय खल प्रतीक का बहुत उम्दा उपयोग किया है. पाठक के समक्ष व्यंग्य का प्रयोज्य इन प्रतीकों से सहज अनुभूत होता चला जाता है.


ताश के बावन पत्तों की तरह इनमें व्यंग्य की चौरंगी छटा बिखेर दी गई है जिनमे कुछ में राजनीति का लाल रंग है, कुछ में सामाजिकता की ईंटे हैं, कुछ लेखों में साहित्य की चिड़ियाएं उड़ रही हैं तो कहीं कहीं काले पान की लताओं द्वारा तंत्र को हो रहे नुकसान पर प्रहार किया गया  है. व्यंग्यकार का विषय चयन विविधता से भरा है और भाषा में सहज प्रवाह और लय है. वह विषय से भटकते नहीं हैं. गैर जरूरी विवरण और दृश्य उनकी रचनाओं की पठनीयता को बाधित नहीं करता.

इस मायने में डा तीरथ सिंह खरबंदा का पहला ही व्यंग्य 'संग्रह सुना है आप बड़े उल्लू हैं!' एक परिपक्व और संतोष देने वाली कृति कही जाने में मुझे संकोच नहीं होता. भविष्य में भी उत्कृष्ट व्यंग्य रचनाओं का इंतजार प्रबुद्ध पाठकों को अवश्य रहेगा. बधाई और शुभकामनाएं.






(पुस्तक : सुना है आप बड़े उल्लू हैं!, लेखक : तीरथ सिंह खरबंदा, प्रकाशक : इंडिया नेट बुक्स, नोएडा, मूल्य : ₹250 मात्र)


समीक्षक : ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, January 2, 2024

मज़ाक : विडंबनाओं पर व्यंग्य करती किस्सागोई

मज़ाक : विडंबनाओं पर व्यंग्य करती किस्सागोई


विधा कुछ भी हो, लेखक की दृष्टि महत्वपूर्ण होती है। कोई विषय कितना ही महत्वहीन मान लिया जाए किंतु वही जब किसी खास दृष्टि से विवेचित या वैचारिक विमर्श के साथ रचना से गुजरता है तो पाठक अचंभित होने को बाध्य हो जाता है। हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि कुमार अंबुज चाहे कविता में कहें या गद्य में, हर विधा में अपनी उक्त खूबी से कभी बेराह नहीं होते।


हाल ही में कुमार अंबुज का दूसरा कहानी संग्रह 'मज़ाक' आया है। इससे पहले 'इच्छाएं' शीर्षक से एक कहानी संग्रह पूर्व में प्रकाशित हुआ था। तब मैंने उनकी कहानियों को पढ़ते हुए कहा था कि ये एक तरह से कविताएं ही हैं। ' मजाक' की कहानियों से गुजरने के बाद मेरे स्वीकार्य में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है।


कुमार अंबुज की कहानियां बहुप्रचलित मुहावरे से अलग हैं। परंपरागत शैली पर अतिक्रमण करने की कोशिश सी लगती है,बल्कि कई जगह उसे ढहाने का उपक्रम करती दिखाई देती हैं। उनकी कहानियों में प्रसंगों और घटनाओं का क्रम होते हुए भी वह नहीं है। घटनाओं में भौतिकता से अधिक मन के भीतर का उद्वेलन है। वहां कहन में चमत्कार नहीं है बल्कि उनका अव्यक्त  बुद्धिमान पाठक को चमत्कृत करता है। कविता से निकलती ध्वनि की तरह इन रचनाओं से निकलती ध्वनि को हम आसानी से समझ सकते हैं। उनकी रचनाओं में उदासी है,निराशा है,दुख है, बेबसी की पीड़ा है लेकिन स्मृतियों से निकलती छोटी छोटी राहतें हैं। शायद वे इस तरह अपने आपको दिलासा भी देते हैं कि अभी उम्मीद बची हुई है।


प्रस्तुत संग्रह की रचनाओं के भीतर थोड़ा अधिक उतरकर समालोचक की तरह कहूं तो मैं इन कहानियों को कुछ ऐसे व्यंग्य निबंधों की तरह भी देखता हूं जिनमें अपने समय की विडंबनाओं  और औसत आदमी के जीवन में आई नई पेचदगियों की मार्मिक किस्सागोई है। ज्यादातर या बल्कि सभी रचनाओं में करुणा का ऐसा संचार होता है जिससे हम भीगते चले जाते हैं। व्यंग्यकार का काम भी यही होता है कि वह समाज में आई इन असहजताओं को रेखांकित करे। अंबुज यही करते हैं बल्कि वे अधिक बौद्धिकता के साथ सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक संदर्भों में विवेकशील रचनात्मक टिप्पणी प्रत्यक्ष या परोक्ष तरीके से कर रहे होते हैं।


संग्रह की सभी कहानियां बहुत प्रभावित करती हैं। खासतौर से मज़ाक, जीभी, गुम होने की जगह, मुझे किसी पर विश्वास नहीं रहा, स्फटिक,एक और जोड़ी जैसी कहानियां बहुत हद तक कुमार अंबुज के कथाकार और उनकी विशिष्टता को रेखांकित करती हैं। हिंदी का कथा साहित्य 'मज़ाक' संकलन की कहानियों से समृद्ध हुआ है। कवि,कथाकार,निबंधकार,विचारक मित्र कुमार अंबुज को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं!







(पुस्तक : मज़ाक, कथाकार : कुमार अंबुज, प्रकाशक : राजपाल एंड संस, दिल्ली, कीमत : 235/ रुपए )


ब्रजेश कानूनगो

रूदादे-सफ़र : मार्मिक फ़िल्म सा आनंद

रूदादे-सफ़र : मार्मिक फ़िल्म सा आनंद


कथाकार पंकज सुबीर का नया उपन्यास 'रूदादे-सफ़र' अंत तक पाठक को बाँधे रखता है। इसकी बेहद सहज भाषा ने इस उपन्यास की पठनीयता को इतना बढ़ा दिया है कि किसी फ़िल्म की बेहतरीन पटकथा की तरह हम कहानी में बहते चले जाते हैं। इसके यह मायने कतई नहीं हैं कि आम लोकप्रिय उपन्यासों की तरह इसमें गंभीर साहित्य के तत्व कम दिखाई देते हैं। पठनीयता में लोकप्रिय लेखन की ख़ूबियों के बावजूद इसमें संवेदनाओं की गहराई, समाज के तात्कालिक और समकालीन जीवन के उतार-चढ़ाव, रिश्तों की आत्मीयता को लेकर जो ताना-बाना बुना गया है, उससे साहित्य का गंभीर पाठक लेखक के कहन की गहराई और भावनात्मक अभिव्यक्ति का क़ायल हुए बगैर नहीं रह सकता।


दरअसल, पंकज सुबीर के उपन्यासों में समाज की रोज़मर्रा की कहानी के बावजूद कुछ ऐसा अलग और विशिष्ट भी होता है जिसके विषय में आम पाठक को पहले से ज़्यादा जानकारी नहीं होती। पिछले उपन्यासों में वैश्विक व भारतीय इतिहास, धर्म, सांप्रदायिकता, रीति, नीति और अनेक गूढ़ तथ्य उनकी कहानियों के प्रसंगों में खोजपूर्ण जानकारी के साथ समाविष्ट होते रहे हैं। निश्चित रूप से इन्हें कहानियों में बेवजह नहीं लाया गया होता है, बल्कि कहानी की पृष्ठभूमि से इनका गहरा संबंध और महत्त्व होता है। लेखक को इसके लिए काफी खोज, अध्ययन और सार्थक तारतम्य भी बैठाना होता है। पंकज सुबीर की इस पूर्व तैयारी का मैं बहुत क़ायल हूँ।


'रूदादे-सफ़र' में इस बार चिकित्सा विज्ञान कुछ इसी तरह से कहानी के साथ एकाकार हुआ है। किसी चिकित्सक पात्र के चित्रण में शायद ही कभी इतने विस्तार से और गहनता से कोई हिंदी लेखक तकनीकी विषय के विवेचन सहित पाठकों को भी इतना संपन्न कर पाया होगा। ख़ास तौर से एनोटॉमी, शवदान, शव संरक्षण आदि और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं को संभवतः मेरे जैसे अनेक पाठकों ने पहली बार ही जाना होगा। वह भी मूल कहानी के साथ बहते हुए। लेखक इस श्रम के लिए सचमुच बहुत प्रशंसा के योग्य हैं।


एक बेटी का पिता होने के कारण शायद कई बार मेरी आँखें भर आईं इसे पढ़ते हुए। गला रुँध गया। कई बार किताब अलग रखकर कुछ और काम करके अपने को सहज बनाने का प्रयास किया। थोड़ी देर बाद फिर किताब उठाने से स्वयं को रोक नहीं पाया। पिता-पुत्री के रिश्ते वैसे ही बहुत मार्मिक और समर्पित होते हैं, और जब पुत्री पिता की ही लगभग छाया हो, तो बात कुछ और अधिक संवेदनामय हो जाती है। 'रूदादे-सफ़र' की कहानी के केंद्र में पिता और पुत्री का स्नेह और जिम्मेदारियों का इंद्रधनुष मुस्कुराता रहता है। 


कहानी में कई मार्मिक दृश्य हैं। मेडिकल कॉलेज के प्रसंग हैं। छात्रों और शिक्षक, चिकित्सकों, सहयोगियों के साथ तकनीकी, चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के साथ साथ संबंधों और आत्मीय रिश्तों में स्नेह की, संस्कारों की, गीत, संगीत और कला जगत् की झलकियाँ हैं। प्रेम है, तो त्याग भी है। समर्पण है, तो प्रेम की आकांक्षा भी है इसमें। नया, पुराना भोपाल है, इंदौरी पोहे का आनंद है, बहुत कुछ है इसमें, जो इसे रोचक बनाए रखता है। इस अनुभव को उपन्यास पढ़कर ही समझा जा सकता है।


कई जगह मुझे उपन्यास की प्रस्तुति किसी पुरानी आदर्शवादी फ़िल्म की तरह भी लगती रही। एवीएम या जैमिनी प्रोडक्शन की भावनापूर्ण पुरानी फ़िल्में देखने वाले अनुभव से गुज़रता रहा। सीख और संदेशों को बहुत सुंदर ढंग से संवादों में पिरोया गया है। खासतौर से पिता और पुत्री के संवादों से प्रसंग बहुत मार्मिक हो उठते हैं। अंत तो बिलकुल अप्रत्याशित ही कहा जाएगा। हालाँकि मैंने उसका अनुमान पूर्व में ही लगा लिया था, किंतु पंकज सुबीर ने उसका निर्वाह इतनी ख़ूबसूरती से किया है कि पाठक दंग रह जाता है।


अंतिम पंक्तियों में पूरे उपन्यास की आत्मा जैसे निकलकर आ जाती है, ...हम सभी की जिंदगी की यही हक़ीक़त है कि हमारे रूदादे-सफ़र वही होती है, जो वक़्त तय कर देता है, हमारे पहले से तय करने से कुछ नहीं होता। हम सबकी रूदादे सफर अंततः वक़्त ही लिखता है।

अब जहाँ भी हैं वहीं तक लिखो रूदादे-सफ़र,

हम तो निकले थे कहीं और ही जाने के लिए...!

निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल के इस शेर के साथ पंकज सुबीर का यह उपन्यास समाप्त हो जाता है। आँखें भीगी रह जाती हैं।

बहुत बधाई इस ख़ूबसूरत उपन्यास के लिए। सफ़र ऐसे ही जारी रहे पंकज भाई।




(पुस्तक : रूदादे - सफ़र, लेखक : पंकज सुबीर, प्रकाशक : शिवना प्रकाशन,सीहोर, मूल्य : 300 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो

तुम चंदन हम पानी : व्यंग्य स्प्रिट की रचनाएं

तुम चंदन हम पानी : व्यंग्य स्प्रिट की रचनाएं


'तुम चंदन हम पानी' छत्तीसगढ़ के बोडरा जैसे छोटे से गांव में शिक्षक के रूप में कार्यरत तथा चुपचाप अपने रचनाकर्म में रत श्री वीरेन्द्र सरल का नवीनतम और चौथा संग्रह है। इस संग्रह का विमोचन हाल ही में रायपुर में हिंदी साहित्य एवं व्यंग्य संस्थान द्वारा आयोजित परसाई सम्मान समारोह में हुआ है। व्यक्तिगत रूप से वहीं उनसे भेंट हुई थी, उनकी सादगी और सरलता से परिचित भी हुआ था। उसी कार्यक्रम में मुझे उन्होंने यह व्यंग्य संग्रह स्नेहपूर्वक भेंट किया था। अब संग्रह की रचनाएं पढ़ने के बाद उनकी रचनात्मकता से भी प्रभावित होना स्वाभाविक ही था।


संदर्भित संकलन में उनकी कुल पच्चीस व्यंग्य रचनाएं शामिल हैं। व्यंग्य के विषय निश्चित ही देश दुनिया और समाज की उन्ही तात्कालिक विसंगतियों,आचरण और अटपटे प्रसंगों से निकलकर आते हैं किंतु इन रचनाओं को उस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता जो प्रतिदिन पत्र पत्रिकाओं में मात्र व्यंग्य की खानापूर्ति के लिए लिखा और छापा जाता है।  भले ही संग्रह की कुछ रचनाएं अखबारों के तथाकथित व्यंग्य स्तंभों में प्रकाशित हुई होंगी किंतु इनमें व्यंग्य की वह चमक अलग से नजर आ जाती है, जिसमें मनुष्य और समाज के प्रति लेखक के सरोकार और विडंबनाओं के कारण भीतर का उद्वेलन और आक्रोश,दुख व्यंजना के रूप में रिसता है।


वीरेंद्र सरल की भाषा शैली भी स्तंभ लेखन से अलहदा है। अपनी रचनाओं को वे शब्दों की सीमा में बांधने का प्रयास नहीं करते। खुलकर विस्तार देते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनका विश्वास रचनाओं में व्यंग्य को विधा की बजाए उसे स्प्रिट के रूप में शामिल करने का  रहता है। आलेख की तरह शुरू करते हुए भी वे कहानी की ओर मुड़ जाते हैं। यह गौरतलब और प्रशंसनीय भी है कि निबंध या आलेख की तुलना में किस्सागोई या कहानी पाठक को ज्यादा रुचिकर और ग्राह्य होती है। संग्रह में सरल जी की अधिकांश रचनाएं या तो कहानी की तरह हैं या आगे बढ़ते बढ़ते कहानी में बदलती जाती है। ज्यादातर रचनाएं लंबी हैं लेकिन बांधे रखती हैं। इन्हे पढ़ते हुए लगता है कि वीरेंद्र सरल को उपन्यास की दिशा में भी अपने कदम बढ़ाना चाहिए।


आमतौर पर मैं किसी पुस्तक पर अपनी टिप्पणी में उदाहरण के लिए कोई अंश उद्धृत नहीं करता क्योंकि रचना में निहित संवेदना, अथवा उद्वेलन तो संपूर्ण रचना का आस्वाद लेने के बाद ही महसूस किया जा सकता है।

सरल जी की व्यंग्य रचना के संदर्भ में यह कहना ठीक ही होगा कि जब लेखक कोई स्टेंडअप कॉमेडी या किसी मंच के श्रोता की तालियों के लिए लिख ही नहीं रहा, विसंगतियों और विडंबनाओं,मूर्खताओं के प्रति उसके भीतर आक्रोश है,करुणा और दुख रिस रहा हो तब चुटकियों की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। यद्यपि वीरेंद्र सरल अपनी रचनाओं में चुटकियों, तंज,कटाक्ष और विनोदपूर्ण कथनों से कोई परहेज भी नहीं करते लेकिन वह सब व्यंग्य की रचनात्मक स्प्रिट में बहता चला आता है।

संकलन की रचनाओं में वीरेंद्र सरल ने वर्तमान समय के राजनीतिक और धर्म के नाम पर राजनीति के पाखंड पर भी प्रहार किया है तो सरकारी योजनाओं के भ्रष्टाचार को भी फेंटेसी प्रारूप में रेखांकित करने की कोशिश की है। कुछ रचनाएं इस संदर्भ में महत्वपूर्ण कही जा सकती हैं। वह चाहे योजना बहनजी हो या बाबागिरी के फायदे। एक रचना में  केशलेस की तर्ज पर 'घोपलेस ' शब्द का प्रयोग कर वे चौका देते हैं। आगे पता चलता है उनका आशय  'घोषणा पत्र लेखक संघ' से है। अलग हटकर वे कई रचनाओं में दिखाई देते हैं। पूजा फ्रॉम होम, डाकू की शोक सभा, व्हाट्सएप ज्ञानमृत समूह, इंद्रलोक में नेता जीव आदि आदि।  शीर्षक रचना तुम चंदन हम पानी भी अपने लक्ष्य तक पहुंचती है,इस वक्त में इसे एक जरूरी एवं साहसिक रचना भी कहा जा सकता है।

वीरेंद्र सरल ने अपने व्यंग्य और व्यंग्य के सरोकारी स्वरूप पर विनोदपूर्ण शैली में विनम्रता पूर्वक ' अपनी बात ' ईमानदारी से कही है। यह आलेख भी किसी व्यंग्य रचना से कम नहीं है।

किताब में ख्यात व्यंग्य आलोचक डा रमेश तिवारी जी की भूमिका और श्रवण कुमार उर्मलिया जी के शुभकामना संदेश से संग्रह समृद्ध हुआ है। ये दोनो आलेख सरल जी की रचनाओं तक ठीक से पहुंचने में पाठक की मदद करते हैं।

निश्चित ही वीरेंद्र सरल के इस व्यंग्य संग्रह का हिंदी व्यंग्य पाठक जगत में भरपूर स्वागत होगा। शुभकामनाएं।






(व्यंग्य संग्रह : तुम चंदन हम पानी, लेखक : वीरेंद्र सरल, प्रकाशक : कल्पना प्रकाशन,दिल्ली, मूल्य : 450 रुपए ,हार्ड बाउंड)


ब्रजेश कानूनगो

पांचवा स्तम्भ : व्यंग्य विधा का ध्वज फहराने योग्य है

पांचवा स्तम्भ :  व्यंग्य विधा का ध्वज फहराने योग्य है


हिंदी साहित्य में इन दिनों कुछ विधाओं में रचनाओं में एक तरह का उछाल सा महसूस किया जा रहा है। साहित्य की विशिष्ट पत्रिकाओं को छोड़कर खासतौर पर लोकप्रिय पत्रिकाओं और अखबारों में प्रकाशित रचनाओं की बात करें तो लघुकथा और व्यंग्य विधा के जरिए साहित्य संसार में प्रवेश के बड़े द्वार खुल गए हैं।


आधुनिक टेक्नोलॉजी से सम्पन्न और अभ्यस्त अनेक नए लेखक बारास्ता सोशल मीडिया भी कविता के बाद व्यंग्य और लघुकथा के क्षेत्र में ही अधिक सक्रिय नजर आ रहे हैं। ऐसे में व्यंग्य विधा में जो बहुतायत से लिखा हुआ आ रहा है उस पर कई सवाल भी खड़े किए जाते रहे हैं। विधा की लोकप्रियता और लेखकों की भीड़ के बीच रचनाओं की गुणवत्ता के पतन की बात भी उठती रही है।


व्यंग्य विधा के मानक सौंदर्यशास्त्र के अभाव में परसाई जी और शरद जोशी या अन्य विशिष्ठ व्यंग्यकारों द्वारा स्थापित व्यंग्य के मानकों पर आज भी नई रचनाओं को परखने की विवशता दिखाई देती है। प्रेमचंद के बाद कहानी और परसाई के बाद हिंदी गद्य व्यंग्य की कई पीढ़ियाँ तो निर्धारित की गईं किन्तु रचना की श्रेष्ठता का कोई मानक पैमाना तय नहीं है और न ही हो सकता है। यह अवश्य है कि रचना की विषय वस्तु के निर्वाह में किसी लेखक के जो विचार व  सरोकार दिखाई देते हैं वे निश्चित ही महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इसके बाद भाषा,शैली और व्यंग्य रचना के प्रारूप पर भी ध्यान जाता है।


युवा पत्रकार और व्यंग्यकार जयजीत ज्योति अकलेचा की पहली किताब 'पांचवा स्तम्भ' पर बात करने से पहले मुझे उपर्युक्त चर्चा जरूरी इसलिए भी लगती है कि जयजीत ने व्यंग्य विधा की अब तक कि परंपराओं को नए और अपने  तौर तरीकों से आगे बढ़ाने का साहस किया है। यद्यपि कई बार अखबारी लेखन को साहित्यिक पत्रकारिता भी कहा गया है। मुझे याद आता है शरदजी के कॉलम लेखन को साहित्यिक पत्रकारिता कहा गया था और उन्हें पद्मश्री भी पत्रकारिता वर्ग में प्रदान किया गया। खबरों और अखबारों की सुर्खियों पर ही ज्यादातर कॉलमी व्यंग्य रचनाएं आ रही हैं जो तात्कालिक संदर्भों के होने से पाठकों को आकर्षित तो करती ही हैं पर संपादकों को भी उन्हें प्रकाशित करने में सुविधा हो जाती है।


थोक में लिखी जा रही ऐसी रचनाओं से इतर जयजीत अकलेचा की रचनाएं इसलिए अलग हो जाती हैं कि पत्रकार होने के कारण खबरों और सुर्खियों के भीतर उतरकर उसकी आत्मा तक पहुंच जाने की योग्यता उनमें पेशागत रूप से है। दूसरे वे जोखिम लेकर अपनी रचनाओं का प्रारूप बदलकर विधा के विकास में अगला महत्वपूर्ण कदम बढ़ा देते हैं।


जयजीत की किताब 'पांचवां स्तम्भ' की सबसे बड़ी खूबी यही है जैसा कि ब्लर्ब में चर्चित व्यंग्यकार आलोक पुराणिक ने कहा भी है, इनमें व्यंग्य विधा में नए प्रयोगों का साहस सचमुच स्पष्टतः परिलक्षित होता है। आवरण पर इसे व्यंग्य रिपोर्टिंग की पहली किताब कहा गया है। निसंदेह व्यंग्य रिपोर्टिंग पहले भी इक्का दुक्का देखने पढ़ने को मिलती रही है। जयजीत के अलावा भी कई पूर्ववर्ती लेखको नें इस प्रारूप को आजमाया है। जयजीत स्वयं 'हिंदी सेटायर' जैसे डिजिटल मंच पर इस तरह लिखते रहे हैं। पुस्तक में ज्यादातर तात्कालिक खबरों और प्रसंगों पर लेख, रिपोर्टिंग किस्से तो हैं हीं साथ ही 'इंटरव्यू' प्रारूप में भी बड़ी दिलचस्प रचनाएं देनें में वे सफल हुए हैं।


मैं इस पुस्तक की हर पंक्ति से ध्यानपूर्वक गुजरा हूँ और कह सकता हूँ कि हर शब्द और वाक्य पाठक को रोमांचित करता है और बहुत प्रभावी रूप से बांधे रखता है। पहले सोच रहा था कुछ पंक्तियों के उदाहरण देकर अपनी बात को पुष्टि दूँ किन्तु यह बिल्कुल भी सम्भव नहीं। हर पंक्ति देकर समीक्षा को लंबा खींचना न सिर्फ लेखक की प्रतिभा के प्रति बल्कि संभावित पाठकों की जिज्ञासा के प्रति भी गलत होगा। पाठक इस किताब को मंगवाकर अवश्य पढ़ें। लेखक की गहरी व्यंग्य समझ और रोचक, मारक प्रस्तुति के कायल हुए बगैर नहीं रहेंगे।

यद्यपि लेखक बड़ी विनम्रता से इब्ने इंशा के कथन को उद्धरित कर कहते हैं, हमने इस किताब में कोई नई बात नहीं लिखी है,वैसे भी आजकल किसी भी किताब में कोई नई बात लिखने का रिवाज़ नहीं है। परंतु मेरा मानना है नया और मौलिक तो कुछ दुनिया में होता ही नही है, हर नई बात एक लंबी परंपरा का नए तरीके से विकास होता है। जयजीत इस किताब में विधा के विकास में एक नया और सार्थक प्रयोग करते हैं। हिंदी व्यंग्य शैली में इन दिनों आई बोझिलता और एकरसता को तोड़ते हैं।

देश दुनिया में प्रजातंत्र के चार स्तंभों की स्थिति कुछ भी चल रही हो, जयजीत अकलेचा का 'पांचवां स्तम्भ' निसंदेह व्यंग्य विधा का ध्वज फहराने योग्य है। बहुत बधाई।





(पुस्तक: पांचवां स्तम्भ, लेखक :जयजीत ज्योति अकलेचा, प्रकाशक : मेंड्रेक पब्लिकेशन भोपाल, कीमत : 199 रुपये)


ब्रजेश कानूनगो