Tuesday, May 30, 2023

भिया के तेजस्वी पंखे

स्थानीय तेवरों में व्यंग्य की गुनगुनी मार : भिया के तेजस्वी पंखे 


भूपेंद्र भारतीय के पहले व्यंग्य संग्रह 'भिया के तेजस्वी पंखे' शीर्षक देखकर कोई यह भी समझ सकता है कि भैया यह कौनसा पंखा है जो इतना तेजस्वी है? यदि स्वयं पंखे में इतनी तेजस्विता है तो फिर वह गर्मियों में किसी बंदे को ठंडक किस तरह पहुंचा पाता होगा? दरअसल मालवा के छोटे कस्बों में गली मोहल्ले की भाषा में छूट भैय्या नेताओं के पिछलग्गुओं को कहीं छर्रे और कहीं पंखे संबोधन से भी पुकारा जाता है। ऐसे ही कुछ देशज और बोलचाल में प्रयुक्त होने वाले शब्दों और ठेठ स्थानीय तेवरों में व्यंग्य और हास्य का तड़का लगाना भूपेंद्र भारतीय के लेखन की एक विशिष्ठ पहचान कही जा सकती है। 


भूपेंद्र भारतीय के व्यंग्य संग्रह की पांडुलिपि पढ़ते हुए वर्तमान में बहुतायत से सामने आ रहे व्यंग्य लेखन पर कुछ बातें कहने का मन हो रहा है। इस संग्रह की भूमिका लिखने की पृष्ठभूमि में इनकी चर्चा होना न सिर्फ प्रासंगिक होगा बल्कि वर्तमान दौर में स्तंभ लेखन में आने वाली रचनाओं के संदर्भ में भी संभवतः विमर्श की दृष्टि से भी उपयोगी होगा। 


पत्र पत्रिकाओं में इन दिनों सामान्य पाठकों की रुचि के लेखों को खूब स्थान मिल रहा है। चर्चित विषयों पर रोचक सामग्री को ध्यान में रखकर कुछ पत्रों में हास्य,विनोद और व्यंग्य स्तंभ नियमित रूप से प्रकाशित किए जाते हैं। व्यंग्य,विनोद अथवा किसी अन्य शीर्षक से इन्हे वर्गीकृत किया जाता है। अधबीच, खरी खरी, तिरछी नजर, तरकश,नश्तर,तीखी नजर  आदि कुछ ऐसे ही अखबारी स्तंभ हैं जिनमें दिलचस्प आलेखों को स्थान मिलता रहता है। कई बार इनमें ऐसे लेख भी छपते हैं जो साहित्य की व्यंग्य विधा में गुणवत्ता की कसौटी पर शायद उतने खरे नहीं कहे जा सकते किंतु इन रचनाओं में जो सबसे महत्वपूर्ण बात होती है वह यह कि इनकी विषयवस्तु अधिकांशतः अखबारों की सुर्खियों अथवा किसी चर्चित प्रसंग,तात्कालिक सामाजिक विसंगति पर केंद्रित होती है। इनमें सामयिक घटनाओं और प्रसंगों पर कटाक्षपूर्ण या व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया,टिप्पणी अथवा परिहास सहजता से देखा जा सकता है। 


अखबारों के पाठकों के बीच ये काफी रूचि से पढ़े भी जाते हैं। कुछ पाठक तो सबसे पहले इन्हें ही पढ़ना पसंद करते हैं। इस व्यावसायिक समय में पत्र पत्रिकाओं से साहित्य पृष्ठ भले ही नदारद होते जा रहे हों मगर इन लघु टिप्पणियों की मांग बरकरार है। 


इसका एक अर्थ यह भी है कि सामयिक व्यंग्य लेखों की पठनीयता उनके तात्कालिक सन्दर्भों की वजह से अधिक हैं। यह भी सही है कि इनका पाठक वर्ग भी बड़ा है। कविता की तरह यह तंज यहां लागू नहीं होता कि 'कवि ही कविता पढ़ते हैं और कवि ही कविता लिखते हैं'।  सामयिक सन्दर्भों और विषयों पर लिखे गए की लोकप्रियता आम पाठकों में बहुत ज्यादा होती है। इनकी एक महत्वपूर्ण भूमिका यह भी है कि इन्ही को पढ़ते हुए पाठक गंभीर साहित्य और  व्यंग्य पढ़ने को लालायित होने लगता है।  


नए रचनाकारों के लिए यह स्तंभ लेखन एक कार्यशाला की तरह होता है जिसमे अभ्यास करते हुए वह अपने आपको मांजता है,बेहतर करने का प्रयास करता है। 


युवा रचनाकार भूपेंद्र भारतीय एक संवेदनशील, कस्बाई जीवन में पले बड़े  व्यक्ति हैं। पेशे से वकील हैं, महाविद्यालय में पढ़ाते भी हैं और पत्रकारिता में भी उनकी रुचि रही है। एक नागरिक के तौर पर गांव,कस्बे,देश,प्रदेश और समाज के बीच जो कुछ घटित होता है, उन पर उनकी जागरूक नजर हमेशा बनी रहती है। नीतियों, योजनाओं,घटनाओं, प्रसंगों, नेताओं के बयानों और समाज में जब भी कुछ अटपटा या असंगत महसूस होता है, उनकी कलम व्याकुल हो उठती है। अभिव्यक्ति का सहज माध्यम अखबारों के वही स्तंभ होते हैं जो सामान्य पाठकों में बहुत लोकप्रिय हैं और पढ़े जाते रहे हैं। 


इस संग्रह की ज्यादातर रचनाएं पिछले तीन चार वर्षों में कोरोना महामारी के दौर में लिखी गई हैं, इसलिए इस कालखंड में घटित विषयों पर पर्याप्त रचनाएं इस संकलन में शामिल हैं। कुछ में साहित्य संसार को भी लक्ष्य किया गया है। कुछ रचनाओं में राजनीतिक बेहुदगियों के संदर्भ में चुटीली टिप्पणियां है। कुछ ज्वलंत मुद्दों मसलन  आरक्षण और जातिवाद पर भी युवा लेखक अपने विचार व्यक्त करते हैं। यद्यपि कुछ रचनाओं से पाठकों को वैचारिक असहमति या मतांतर भी हो सकता है, बावजूद इसके लेखक को अपने दृष्टिकोण से विषय को समझने और अपनी तरह से निर्वाह की स्वतंत्रता मिलना ही चाहिए। ज्यादातर रचनाओं में भूपेंद्र विषय को रोचकता से निभाने में सफल हुए हैं। यद्यपि विषयों में कई जगह दोहराव भी हुआ है लेकिन पठनीयता बांधे रखती है। 


मुझे लगता है व्यंग्य विधा के सागर से मोती ढूंढ लाने में कुशल गोताखोरी के लिए तैराकी में इस तरह का नियमित अभ्यास बहुत जरूरी होता है। व्यंग्य लेखन में भूपेंद्र बहुत ईमानदारी से यह प्रयास और अभ्यास करते दिखाई देते हैं। 


जैसा मैंने आरंभ में कहा है उनकी कुछ रचनाओं में देशज शब्दों और स्थानीय लहजे का प्रयोग रचना को अलग पहचान देता है। रचनाओं में कुछ हद तक चुटकियां,हास्य,व्यंजना, कटाक्ष है लेकिन सामान्यतः वे तीखा प्रहार नहीं करते। रंजक टिप्पणियां जरूर करते हैं। 


हमें विश्वास है लेखक व्यंग्य के औजारों पर थोड़ी धार अधिक तेज करेंगे और व्यंग्य भाषा को संवारते रहेंगे। लेखन में सामाजिक सरोकारों और नागरिक बोध से भरी उनकी व्यंग्य दृष्टि लगातार बेहतर रचने की आकांक्षा और संकल्प के साथ व्यंग्य सागर से अनेक मोती चुन लाने में अवश्य सफल होगी। भूपेंद्र भारतीय की यह पहली किताब है। संग्रहित आलेखों को उसी नजरिए से पढ़ा जाना चाहिए। 

इस संग्रह की रचनाएं स्तंभ लेखन की सीमाओं के बावजूद खासा प्रभावित करती हैं। रचनाओं को पढ़कर हमें उनसे और भी शानदार रचनाओं की उम्मीद बंध जाना स्वाभाविक है।  व्यंग्य संग्रह ' भिया के तेजस्वी पंखे ' के लिए उन्हें हार्दिक बधाई और बेहतरीन लेखन के लिए शुभकामनाएं... 


ब्रजेश कानूनगो




Monday, May 29, 2023

पुस्तक चर्चा : रूदादे-सफ़र

पुस्तक चर्चा : 

रूदादे-सफ़र : मार्मिक फ़िल्म सा आनंद

ब्रजेश कानूनगो


कथाकार पंकज सुबीर का नया उपन्यास 'रूदादे-सफ़र' अंत तक पाठक को बाँधे रखता है। इसकी बेहद सहज भाषा ने इस उपन्यास की पठनीयता को इतना बढ़ा दिया है कि किसी फ़िल्म की बेहतरीन पटकथा की तरह हम कहानी में बहते चले जाते हैं। इसके यह मायने कतई नहीं हैं कि आम लोकप्रिय उपन्यासों की तरह इसमें गंभीर साहित्य के तत्व कम दिखाई देते हैं। पठनीयता में लोकप्रिय लेखन की ख़ूबियों के बावजूद इसमें संवेदनाओं की गहराई, समाज के तात्कालिक और समकालीन जीवन के उतार-चढ़ाव, रिश्तों की आत्मीयता को लेकर जो ताना-बाना बुना गया है, उससे साहित्य का गंभीर पाठक लेखक के कहन की गहराई और भावनात्मक अभिव्यक्ति का क़ायल हुए बगैर नहीं रह सकता।


दरअसल, पंकज सुबीर के उपन्यासों में समाज की रोज़मर्रा की कहानी के बावजूद कुछ ऐसा अलग और विशिष्ट भी होता है जिसके विषय में आम पाठक को पहले से ज़्यादा जानकारी नहीं होती। पिछले उपन्यासों में वैश्विक व भारतीय इतिहास, धर्म, सांप्रदायिकता, रीति, नीति और अनेक गूढ़ तथ्य उनकी कहानियों के प्रसंगों में खोजपूर्ण जानकारी के साथ समाविष्ट होते रहे हैं। निश्चित रूप से इन्हें कहानियों में बेवजह नहीं लाया गया होता है, बल्कि कहानी की पृष्ठभूमि से इनका गहरा संबंध और महत्त्व होता है। लेखक को इसके लिए काफी खोज, अध्ययन और सार्थक तारतम्य भी बैठाना होता है। पंकज सुबीर की इस पूर्व तैयारी का मैं बहुत क़ायल हूँ।


'रूदादे-सफ़र' में इस बार चिकित्सा विज्ञान कुछ इसी तरह से कहानी के साथ एकाकार हुआ है। किसी चिकित्सक पात्र के चित्रण में शायद ही कभी इतने विस्तार से और गहनता से कोई हिंदी लेखक तकनीकी विषय के विवेचन सहित पाठकों को भी इतना संपन्न कर पाया होगा। ख़ास तौर से एनोटॉमी, शवदान, शव संरक्षण आदि और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं को संभवतः मेरे जैसे अनेक पाठकों ने पहली बार ही जाना होगा। वह भी मूल कहानी के साथ बहते हुए। लेखक इस श्रम के लिए सचमुच बहुत प्रशंसा के योग्य हैं।


एक बेटी का पिता होने के कारण शायद कई बार मेरी आँखें भर आईं इसे पढ़ते हुए। गला रुँध गया। कई बार किताब अलग रखकर कुछ और काम करके अपने को सहज बनाने का प्रयास किया। थोड़ी देर बाद फिर किताब उठाने से स्वयं को रोक नहीं पाया। पिता-पुत्री के रिश्ते वैसे ही बहुत मार्मिक और समर्पित होते हैं, और जब पुत्री पिता की ही लगभग छाया हो, तो बात कुछ और अधिक संवेदनामय हो जाती है। 'रूदादे-सफ़र' की कहानी के केंद्र में पिता और पुत्री का स्नेह और जिम्मेदारियों का इंद्रधनुष मुस्कुराता रहता है। 


कहानी में कई मार्मिक दृश्य हैं। मेडिकल कॉलेज के प्रसंग हैं। छात्रों और शिक्षक, चिकित्सकों, सहयोगियों के साथ तकनीकी, चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के साथ साथ संबंधों और आत्मीय रिश्तों में स्नेह की, संस्कारों की, गीत, संगीत और कला जगत् की झलकियाँ हैं। प्रेम है, तो त्याग भी है। समर्पण है, तो प्रेम की आकांक्षा भी है इसमें। नया, पुराना भोपाल है, इंदौरी पोहे का आनंद है, बहुत कुछ है इसमें, जो इसे रोचक बनाए रखता है। इस अनुभव को उपन्यास पढ़कर ही समझा जा सकता है।


कई जगह मुझे उपन्यास की प्रस्तुति किसी पुरानी आदर्शवादी फ़िल्म की तरह भी लगती रही। एवीएम या जैमिनी प्रोडक्शन की भावनापूर्ण पुरानी फ़िल्में देखने वाले अनुभव से गुज़रता रहा। सीख और संदेशों को बहुत सुंदर ढंग से संवादों में पिरोया गया है। खासतौर से पिता और पुत्री के संवादों से प्रसंग बहुत मार्मिक हो उठते हैं। अंत तो बिलकुल अप्रत्याशित ही कहा जाएगा। हालाँकि मैंने उसका अनुमान पूर्व में ही लगा लिया था, किंतु पंकज सुबीर ने उसका निर्वाह इतनी ख़ूबसूरती से किया है कि पाठक दंग रह जाता है।


अंतिम पंक्तियों में पूरे उपन्यास की आत्मा जैसे निकलकर आ जाती है, ...हम सभी की जिंदगी की यही हक़ीक़त है कि हमारे रूदादे-सफ़र वही होती है, जो वक़्त तय कर देता है, हमारे पहले से तय करने से कुछ नहीं होता। हम सबकी रूदादे सफर अंततः वक़्त ही लिखता है।

अब जहाँ भी हैं वहीं तक लिखो रूदादे-सफ़र,

हम तो निकले थे कहीं और ही जाने के लिए...!

निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल के इस शेर के साथ पंकज सुबीर का यह उपन्यास समाप्त हो जाता है। आँखें भीगी रह जाती हैं।

बहुत बधाई इस ख़ूबसूरत उपन्यास के लिए। सफ़र ऐसे ही जारी रहे पंकज भाई।


(पुस्तक : रूदादे - सफ़र, लेखक : पंकज सुबीर, प्रकाशक : शिवना प्रकाशन,सीहोर, मूल्य : 300 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो




पुस्तक चर्चा : निठल्लों का औजार सोशल मीडिया

पुस्तक चर्चा :

निठल्लों का औजार सोशल मीडिया : प्रतिरोध की आवाज में व्यंग्यकार का जरूरी सुर

ब्रजेश कानूनगो


'निठल्लों का औजार सोशल मीडिया' व्यंग्यकार राजशेखर चौबे के व्यंग्य आलेखों की तीसरी किताब है। इस संकलन में उनके कुल पचास छोटे छोटे आलेख हैं जो गत चार,पांच वर्षों में घटित प्रसंगों, नीतियों,स्थितियों और विसंगतियों पर उनकी व्यंग्यात्मक टिप्पणियां हैं। कही कहीं उनकी पीड़ा और आक्रोश बहुत सीधे सीधे अभिव्यक्त होने लगता है। शरद जोशी जी ने एक बार निजी बातचीत में कहा भी था कि जब हम किसी विडंबना या मूर्खता पर आक्रोश में खरा खरा भी लिख दें तो वह भी एक तरह का व्यंग्य माना जा सकता है। राजशेखर चौबे की रचनाओं में यह बहुत जगह दिखाई देने लगता है। हालात ही कुछ ऐसे हैं कि हर व्यक्ति अपने मन की बात कहने को उद्यत और व्याकुल होता है।


इस संदर्भ में मुझे एक कविता के अंश बड़े मौजू लगते हैं। कवि के नाम को लेकर भ्रम की स्थिति बनी है लेकिन इसके रचनाकार के रूप में ज्यादातर लोग गोरख पाण्डेय को मान्यता देते रहे हैं। बहरहाल कविता कुछ इस तरह है -

राजा बोला रात है/ रानी बोली रात है/मंत्री बोला रात है/ संत्री बोला रात है/ हर कोई बोला रात है/ यह सुबह सुबह की बात है...


राजशेखर चौबे जी के भीतर कहन की यही व्याकुलता है। ऐसी ही अजीबोगरीब स्थितियों के कारण उनका मन क्षोभ और पीड़ा से भरा हुआ दिखाई देता है। चारों तरफ जी हुजूरी और जय जयकार के बीच गलत और सही के बीच का अंतर ओझल है। सच्चाई के आकर्षक रैपर में जब झूठ की चॉकलेटें प्रस्तुत की जा रही हों तो प्रतिरोध और व्यंग्य में सीधे सीधे हमले स्वाभाविक भी हो जाते हैं। कहीं अधिक तो कहीं ये तेवर व्यंजना और फैंटेसी  के रूप में भी अभिव्यक्त हुए हैं। चौबे जी इसी तेवर को इस संकलन में प्रमाणित करते हैं। संकलन के प्रारंभ  में चौबे जी अपनी बात में इसी चीज को स्वीकारते हैं और रचनात्मक रूप से अपनी रचना 'तोता और आम आदमी ' के माध्यम से प्रभावी रूप से अभिव्यक्त भी करते हैं।


जब सोशल मीडिया नया और झूठा इतिहास रचने में व्यस्त हो, विश्लेषण और तर्कों का अभाव हो और उसे बिना अध्ययन,श्रमहीन,विचारहीन दस्तावेजों से पाट दिया जा रहा हो तो उसे 'निठल्लों का औजार ' ही कहा जाएगा। इस मायने में लेखक ने किताब का शीर्षक ठीक ही दिया है। किंतु यह भी एक तथ्य है कि जब भी इस औजार का विवेकपूर्ण उपयोग हुआ है,साहित्य,समाज और संस्कृति के भले के लिए किसी चिकित्सक के औजारों की तरह इस्तेमाल हुआ है,यही सोशल मीडिया अपनी अलग और सकारात्मक भूमिका में भी दिखाई देता है। झूठ की वाट्स एप यूनिवर्सिटी के प्रपंच को छोड़ दें तो मुख्य मीडिया के समांतर इस वैकल्पिक माध्यम का खासा असर अब सहजता से स्वीकार भी किया जाने लगा है।


इतिहास लेखन में उस समय के साहित्य में इतिहासकार तत्कालीन सच्चाइयों और स्थितियों के सूत्र तलाशते हैं। भविष्य में जब भी नया इतिहास लेखन होगा तब भी पुस्तकें पढ़ी जाएंगी। राजशेखर चौबे जी की किताब में इस दौर की कई ऐसी बातें शामिल हैं जिनसे आज की स्थितियों,परिस्थितियों,नीतियों,मूर्खताओं और विडंबनाओं की झलक अवश्य उपलब्ध होगी।

कोरोना महामारी के दौर के समय के कई प्रसंग, राजनेताओं के आचरण, बेढंगी आर्थिक नीतियां और समाज और प्रशासन में व्याप्त आडंबर, पाखंड और भ्रष्टाचार पर चौबे जी ने अपने तरीके से जन प्रतिरोध की सामूहिक आवाज में अपना ईमानदार सुर भी मिलाया है।

श्री राजशेखर चौबे जी को इस व्यंग्य संग्रह के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।


(व्यंग्य संग्रह : निठल्लों का औजार सोशल मीडिया, लेखक : राजशेखर चौबे, प्रकाशक : वंश पब्लिकेशन,भोपाल, मूल्य : 250 रुपए)


ब्रजेश कानूनगो





पुस्तक चर्चा : भोंगपुर 30 कि. मी

पुस्तक चर्चा :

भोंगपुर 30 कि. मी. : दिलचस्प व्यंग्य उपन्यास

ब्रजेश कानूनगो


मैं यह अपनी पाठकीय चेतना में कोई कमी ही मानता हूं कि श्री विनोद साव जी के वर्ष 2007 में आए व्यंग्य उपन्यास 'भोंगपुर 30 कि. मी.' को  इतने वर्षों बाद पढ़ पाया।


रायपुर में हिंदी साहित्य एवं व्यंग्य संस्थान द्वारा मार्च 2023 में आयोजित परसाई सम्मान कार्यक्रम में दुर्ग निवासी वरिष्ठ व्यंग्यकार विनोद साव जी से आत्मीय भेंट हुई तो इस पुस्तक का स्नेह उपहार दे कर उन्होंने मुझे संपन्न कर दिया।


हमारे हिंदी पाठक जगत में आमतौर पर यह होता रहता है कि किसी भी विधा के चार पांच नाम ही बाजार में तैरते रहते हैं। नए पाठकों द्वारा पुस्तकें भी उन्ही की खरीदी,पढ़ी जाती रहती हैं। चर्चा में भी कुछ ही प्रमुख शीर्षक बने रहते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि अन्य कई प्रतिभा संपन्न रचनाकार अपने बेहतरीन काम में लगे होते हैं।

श्री विनोद साव सदा से एक बेहतरीन व्यंग्यकार रहे हैं। यही कारण है कि 2007 में इस उपन्यास के आने के समय तक ही उनके चार व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। उनकी रचनाएं  पहल, ज्ञानोदय,वागर्थ, अक्षर पर्व,समकालीन भारतीय साहित्य, लोकायत जैसी साहित्य की प्रमुख पत्रिकाओं में लगातार छप रही थीं, पत्र पत्रिकाओं के स्तंभ लेखन से अब भी यह क्रम जारी है। अट्टहास,वागीश्वरी,जगन्नाथ राय शर्मा पुरस्कारों से हुआ सम्मान भी उनकी रचनात्मक गुणवत्ता और श्रेष्ठता का एक ईमानदार प्रमाण भी  है।


यद्यपि हाल ही में मैंने समग्र रूप से 'भोंगपुर...'  पढ़ा है लेकिन बरसों से उनकी व्यंग्य रचनाओं को पढ़ता आया हूं। उनकी वैचारिकी मेरी अपनी समझ से बहुत निकट बैठती है। व्यंग्य के प्रति उनका दृष्टिकोण और सटीक निर्वाह हमें बहुत प्रभावित करता है।


छत्तीसगढ़ के दुर्ग शहर और उससे 30 किलोमीटर दूर भोंगपुर जैसे देहाती क्षेत्र के इर्द गिर्द शिक्षण संस्थाओं और विद्यार्थियों के बीच की रोचक स्थितियों और अटपटे आचरण के माध्यम से पूरा कथाक्रम भले ही चलता है किंतु हर प्रसंग अपने आपमें संक्षिप्त होकर भी सटीक व्यंग्य की पूर्णता का निर्माण करता है। रोजमर्रा की गतिविधियों के निरीक्षण को साव जी ने बहुत ही दिलचस्प शब्दों में, कई जगह ठेठ देशज संदर्भों में बहुत ही खूबसूरती से चित्रित किया है। उनकी अभिव्यक्ति में उनके नाम के अनुरूप विनोद तो होता ही है किंतु व्यंग्य की तीक्ष्णता या धार भी बनी रहती है। चलें गांव की ओर के पथ पर चलते हुए लेखक पाठकों को दुर्ग, भोंगापुर के रास्ते शिक्षण व्यवस्था, विद्यालय के भीतर और वहां के वातावरण के भीतर तक ले जाकर व्यापक मूर्खताओं, चालाकियों,तिकड़मों,बदमाशियों,राजनीतिक कुटिलताओं के आस्वाद से रूबरू करवाने में सफल होता है।


उपन्यास को पढ़ते हुए हम अपने आपको छत्तीसगढ़ के कस्बाई माहौल के बीच पाते हैं,उसे जीने लगते हैं। यही इस उपन्यास की विशेषता कही जा सकती है कि इसे बहुत गहरे उतर कर बहुत मजे लेकर रचा गया है। इसकी भाषा और रोचक निर्वाह ही इसकी वह सहजता भी है जिससे पाठक भी मजे लेकर इसे पढ़ता जरूर है लेकिन व्यंग्य की भीतरी बनावट उसे उद्वेलित करती है।


यदि पाठकों ने इसे अब तक नहीं देखा पढ़ा है तो अवश्य ही इसे ढूंढ कर अवश्य पढ़ लें। मेरे जैसा विलंब न कर दें। वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री विनोद साव जी को इस रचना के लिए बधाई देता हूं। शुभकामनाएं।


( व्यंग्य उपन्यास : भोंगपुर 30 कि. मी., लेखक: विनोद साव, प्रकाशक : पंकज बुक्स,दिल्ली, मूल्य :150 रुपए हार्डबाउंड 2007)


ब्रजेश कानूनगो



पुस्तक चर्चा : तुम चंदन हम पानी

पुस्तक चर्चा :

तुम चंदन हम पानी : व्यंग्य स्प्रिट की रचनाएं

ब्रजेश कानूनगो


'तुम चंदन हम पानी' छत्तीसगढ़ के बोडरा जैसे छोटे से गांव में शिक्षक के रूप में कार्यरत तथा चुपचाप अपने रचनाकर्म में रत श्री वीरेन्द्र सरल का नवीनतम और चौथा संग्रह है। इस संग्रह का विमोचन हाल ही में रायपुर में हिंदी साहित्य एवं व्यंग्य संस्थान द्वारा आयोजित परसाई सम्मान समारोह में हुआ है। व्यक्तिगत रूप से वहीं उनसे भेंट हुई थी, उनकी सादगी और सरलता से परिचित भी हुआ था। उसी कार्यक्रम में मुझे उन्होंने यह व्यंग्य संग्रह स्नेहपूर्वक भेंट किया था। अब संग्रह की रचनाएं पढ़ने के बाद उनकी रचनात्मकता से भी प्रभावित होना स्वाभाविक ही था।


संदर्भित संकलन में उनकी कुल पच्चीस व्यंग्य रचनाएं शामिल हैं। व्यंग्य के विषय निश्चित ही देश दुनिया और समाज की उन्ही तात्कालिक विसंगतियों,आचरण और अटपटे प्रसंगों से निकलकर आते हैं किंतु इन रचनाओं को उस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता जो प्रतिदिन पत्र पत्रिकाओं में मात्र व्यंग्य की खानापूर्ति के लिए लिखा और छापा जाता है।  भले ही संग्रह की कुछ रचनाएं अखबारों के तथाकथित व्यंग्य स्तंभों में प्रकाशित हुई होंगी किंतु इनमें व्यंग्य की वह चमक अलग से नजर आ जाती है, जिसमें मनुष्य और समाज के प्रति लेखक के सरोकार और विडंबनाओं के कारण भीतर का उद्वेलन और आक्रोश,दुख व्यंजना के रूप में रिसता है।


वीरेंद्र सरल की भाषा शैली भी स्तंभ लेखन से अलहदा है। अपनी रचनाओं को वे शब्दों की सीमा में बांधने का प्रयास नहीं करते। खुलकर विस्तार देते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनका विश्वास रचनाओं में व्यंग्य को विधा की बजाए उसे स्प्रिट के रूप में शामिल करने का  रहता है। आलेख की तरह शुरू करते हुए भी वे कहानी की ओर मुड़ जाते हैं। यह गौरतलब और प्रशंसनीय भी है कि निबंध या आलेख की तुलना में किस्सागोई या कहानी पाठक को ज्यादा रुचिकर और ग्राह्य होती है। संग्रह में सरल जी की अधिकांश रचनाएं या तो कहानी की तरह हैं या आगे बढ़ते बढ़ते कहानी में बदलती जाती है। ज्यादातर रचनाएं लंबी हैं लेकिन बांधे रखती हैं। इन्हे पढ़ते हुए लगता है कि वीरेंद्र सरल को उपन्यास की दिशा में भी अपने कदम बढ़ाना चाहिए।


आमतौर पर मैं किसी पुस्तक पर अपनी टिप्पणी में उदाहरण के लिए कोई अंश उद्धृत नहीं करता क्योंकि रचना में निहित संवेदना, अथवा उद्वेलन तो संपूर्ण रचना का आस्वाद लेने के बाद ही महसूस किया जा सकता है।

सरल जी की व्यंग्य रचना के संदर्भ में यह कहना ठीक ही होगा कि जब लेखक कोई स्टेंडअप कॉमेडी या किसी मंच के श्रोता की तालियों के लिए लिख ही नहीं रहा, विसंगतियों और विडंबनाओं,मूर्खताओं के प्रति उसके भीतर आक्रोश है,करुणा और दुख रिस रहा हो तब चुटकियों की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। यद्यपि वीरेंद्र सरल अपनी रचनाओं में चुटकियों, तंज,कटाक्ष और विनोदपूर्ण कथनों से कोई परहेज भी नहीं करते लेकिन वह सब व्यंग्य की रचनात्मक स्प्रिट में बहता चला आता है।

संकलन की रचनाओं में वीरेंद्र सरल ने वर्तमान समय के राजनीतिक और धर्म के नाम पर राजनीति के पाखंड पर भी प्रहार किया है तो सरकारी योजनाओं के भ्रष्टाचार को भी फेंटेसी प्रारूप में रेखांकित करने की कोशिश की है। कुछ रचनाएं इस संदर्भ में महत्वपूर्ण कही जा सकती हैं। वह चाहे योजना बहनजी हो या बाबागिरी के फायदे। एक रचना में  केशलेस की तर्ज पर 'घोपलेस ' शब्द का प्रयोग कर वे चौका देते हैं। आगे पता चलता है उनका आशय  'घोषणा पत्र लेखक संघ' से है। अलग हटकर वे कई रचनाओं में दिखाई देते हैं। पूजा फ्रॉम होम, डाकू की शोक सभा, व्हाट्सएप ज्ञानमृत समूह, इंद्रलोक में नेता जीव आदि आदि।  शीर्षक रचना तुम चंदन हम पानी भी अपने लक्ष्य तक पहुंचती है,इस वक्त में इसे एक जरूरी एवं साहसिक रचना भी कहा जा सकता है।

वीरेंद्र सरल ने अपने व्यंग्य और व्यंग्य के सरोकारी स्वरूप पर विनोदपूर्ण शैली में विनम्रता पूर्वक ' अपनी बात ' ईमानदारी से कही है। यह आलेख भी किसी व्यंग्य रचना से कम नहीं है।

किताब में ख्यात व्यंग्य आलोचक डा रमेश तिवारी जी की भूमिका और श्रवण कुमार उर्मलिया जी के शुभकामना संदेश से संग्रह समृद्ध हुआ है। ये दोनो आलेख सरल जी की रचनाओं तक ठीक से पहुंचने में पाठक की मदद करते हैं।

निश्चित ही वीरेंद्र सरल के इस व्यंग्य संग्रह का हिंदी व्यंग्य पाठक जगत में भरपूर स्वागत होगा। शुभकामनाएं।


(व्यंग्य संग्रह : तुम चंदन हम पानी, लेखक : वीरेंद्र सरल, प्रकाशक : कल्पना प्रकाशन,दिल्ली, मूल्य : 450 रुपए ,हार्ड बाउंड)


ब्रजेश कानूनगो