बाजार से गुजरा हूं
समय के अटपटेपन और विडंबनाओं से सजा है बाजार
लेखक,चिंतक, सामाजिक, सांस्कृतिक और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता श्री सुरेश उपाध्याय की नई किताब 'बाजार से गुजरा हूं' भले ही व्यंग्य लेखों के संग्रह के रूप में आई है लेकिन एक तरह से इसे उनके वैचारिक आलेखों की पिछली दो पुस्तकों 'हाशिये की आवाज' और 'अति सर्वत्र विराजिते' की वैचारिक श्रृंखला की व्यंग्य विनोद भाषा में लिखी अगली कड़ी के रूप में भी देखा जा सकता है।
इस संग्रह में वर्तमान समय के विभिन्न प्रसंगों,आर्थिक, सामाजिक,राजनैतिक स्थितियों के पीछे के सवालों और विडंबनाओं पर सहज सरल विनोदपूर्ण भाषा में लेखक अपनी पीड़ा भी व्यक्त करते हैं और अतीत की सुखद स्मृतियों को भी पाठक के समक्ष रखने की तुलनात्मक कोशिश करते हैं।
हिंदी व्यंग्य के प्रचलित लोकप्रिय मुहावरे में उनके ये लेख पाठक को आपबीती सी महसूस होते हैं और वह उनसे जुड़ता चला जाता है।
बाजार से गुजरा हूं संग्रह इसलिए भी दृष्टव्य है कि ये आलेख समाज में उपस्थित और घटित विविध विषयों पर एक जागरूक नागरिक की टिप्पणी की तरह आते हैं। और जब ट्रेड यूनियन, साहित्य-कला और सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र से लम्बे समय से गहराई से संलग्न सुरेश उपाध्याय जैसा विचारवान कार्यकर्ता अपना नजरिया प्रस्तुत करता है या वक्रोक्ति करता है तो उसके निश्चित ही कुछ मायने होते हैं,उसके पीछे क्षोभ और पीड़ा की छटपटाहट भी महसूस की जा सकती है।
संग्रह में लेखक के नए,पुराने,छोटे,बड़े,कुल छत्तीस व्यंग्य लेख संकलित हैं। किताब में विषयों का एक ऐसा विविधतापूर्ण बाजार सजा है जहां समय और समाज के हर क्षेत्र के अटपटेपन और विसंगतियों पर टॉर्च की खोजी और व्यंग्यात्मक रोशनी डालने की कोशिश लेखक ने की है।
संग्रह की अधिकांश रचनाएं पत्र पत्रिकाओं के हास्य,व्यंग्य,वक्रोक्ति जैसे विविध स्तंभों में प्रकाशित हुई हैं। इन रचनाओं में समुचित चुटकियां हैं, वक्रोक्तियां हैं,खरी खरी है,देशज जुमलों,बोलचाल के शब्दों और लोकोक्तियों के संदर्भ हैं। भाषा पाठक को रुचिकर और सहज लगती है परंतु विषयवस्तु के भीतर उतरते ही पाठक के मन को उद्वेलित करती है,विचार करने को विवश भी करने लगती है। यही इन व्यंग्य रचनाओं की खूबी और पहचान है। इसे लेखक की रचनात्मक सफलता भी कहा जा सकता है। लेखक श्री सुरेश उपाध्याय को बहुत बधाई और शुभकामनाएं।
(व्यंग्य संग्रह : बाजार से गुजरा हूं ,लेखक : सुरेश उपाध्याय, प्रकाशक : ऋषि मुनि प्रकाशन, उज्जैन, मूल्य : ₹ 250 हार्ड बाउंड )
समीक्षक -
ब्रजेश कानूनगो