पुस्तक चर्चा :
भांति भांति के चमचे
ब्रजेश कानूनगो
'भांति भांति के चमचे' व्यंग्यकारों की खास पहचान वाले शहर लखनऊ की सक्रिय व्यंग्यकार वीना सिंह की पहल और उन्ही के संपादन में गुजरात के बहुभाषी ई प्रकाशन संस्थान शोपिजेन से हाल ही में हार्डकॉपी संस्करण में आया व्यंग्य संग्रह है।
इस व्यंग्य संग्रह की खासियत यह है कि कुल तीस रचनाओं में आधे से अधिक याने पंद्रह सोलह शीर्षक के इर्दगिर्द याने चमचे विषय पर केंद्रित हैं। संग्रह में जहां शरद जोशी, सूर्यबाला, सुभाष चंदर, जवाहर चौधरी जैसे जाने माने व्यंग्यकारों के व्यंग्य शामिल हैं वहीं आज भी लगातार लिख रहे मध्य आयु के बेहतरीन लेखकों की रचनाओं के अलावा अलंकार रस्तोगी, मुकेश राठौर और देवेंद्रसिंह सिसौदिया जैसे युवा व्यंग्यकारों की सहभागिता भी हुई है।
इसमें कोई शक नहीं है कि सारी रचनाएं बहुत अच्छी हैं लेकिन यह स्वीकारने में मुझे कोई संकोच नहीं हो रहा कि रचनाकारों के श्रेष्ठतम में से निकलकर ये इस संग्रह में नहीं आई हैं। दरअसल ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि रचनाओं के चयन का आधार विषय केंद्रित रहा। जिसके पास चमचा विषय पर जो उपलब्ध रहा हो या मांग पर लिखा गया हो उसे संकलन में सीधे शामिल करने से व्यंग्य का व्यापक कैनवास थोड़ा सीमित हो गया है। मुझे व्यक्तिगत रूप से ऐसा महसूस हुआ है।
एक ही विषय याने चमचे जैसे लोकप्रिय और बहुलिखित विषय पर व्यंग्यकार के विशिष्ठ निर्वाह और शैली की भिन्नता के अलावा कोई कितना भिन्न हो सकेगा। फिर भी संपादक ने चयन में एकरूपता या अधिक दोहराव को थोड़ा कम अवश्य किया है और शीर्षक विषय से हटकर भी आधी रचनाओं को शामिल कर बोझिलता और एकरसता को कम करने का प्रयास किया है।
यद्यपि संकलित व्यंग्य रचनाओं का मजा तो सारे व्यंग्य पढ़कर ही लिया जा सकता है लेकिन कुछ पंक्तियां यहां देने की कोशिश कर रहा हूं। इससे निश्चित ही रूचिवान पाठक इस किताब को मंगवाकर पढ़ना चाहेंगे और वे निराश भी नहीं होंगे।
निर्मल गुप्त : चाटुकारिता के लिए बहुप्रचारित रूपक चमचा है... यदि इनको शाब्दिक परिभाषा के दृष्टिकोण से व्याख्यायित किया जाए तो स्पष्ट होगा कि वह शब्द बाण से मानव मस्तिष्क को शब्द की गहराई नापने और शब्द भावों से हृदय को स्पर्श की मारक क्षमता की अनुभूति कराता है। व्यंग्य लेखन में वाक्य विन्यास कौशल प्रमुख होता है। (पुस्तक की भूमिका)
शरद जोशी : कल तक जो मंत्री और मुख्यमंत्री थे एकाएक पटरी पर आ जाते हैं। कल तक जो बंगलों में विराजते थे उन्हें आज ढूंढे से रहने के लिए मकान नहीं मिलता। कल तक जिनके आंगन में कार रहती थी, आज गैया भी मुंह नहीं मारती...साया साथ नहीं देता, चमचे चले जाते हैं। (चमचागिरी का यह मुबारक दौर)
सुभाष चंदर: चेले ने मामले की गांठ खोली। पुरस्कार की रेवड़ी बांटी,जरूर चेले की ओर जाएगी। और इसके लिए समिति बनेगी जिसमें गुरु चेले के सभी संगी साथी निर्णायक बनेंगे।पुरस्कार का नाम होगा, गुरु घंटाल गौरव पुरस्कार। (गुरुजी चेला और मेंढक)
सूर्यबाला : ऊंटों के बारे में दो बातें मशहूर हैं, एक तो यह जब तक पहाड़ नहीं चढ़े होते, बहुत बलबलाते हैं और दूसरे जब पहाड़ चढ़ चुके होते हैं तो किस करवट बैठेंगे पता करना बहुत मुश्किल होता है। वैसे ऊंटों की यह पॉलिसी सरकारी, गैर सरकारी, साहित्य, गैर साहित्यक क्षेत्र में बहुत पॉपुलर हो रही है। (चोटी पर न पहुंचे लोग)
पूरन शर्मा : जो लोग चमचे नहीं पालते वे जीवन में दुख पालते हैं। जिन्होंने चमचों की अनदेखी की है वह परेशान हुआ है। (इति चमचा पुराण)
सुभाष काबरा : यह हमारे दौर का दुर्भाग्य ही तो है कि यहां जिसने चार पंक्तियां लिख लें,वह लेखक हो गया,जिसने आठ पंक्तियां पढ़ लीं वह पाठक हो गया और जिसने न कुछ लिखा,न पढ़ा वह संपादक हो गया। ( अपना अपना बसंत)
डा स्नेहलता पाठक : चमचा नेता के लिए उस आधार कार्ड की तरह होता है जिसके बिना राजनीति का चारागाह दूर की कौड़ी बन जाता है। (जग घुमया थारे जैसा न कोई )
शशांक दुबे : बड़ा मौलिक होता है बचत के मामले में हिंदुस्तानी। पेट्रोल बचाने के लिए वह सुबह दस बजे चौराहे पर जेब में हाथ डाल कर खड़ा हो जाएगा और किसी भी दोस्त या अनजान लेकिन शरीफ से दिखाई देते आदमी की फटफटी पर सवार होकर रास्ते भर हाथ हिला हिला कर बात करते हुए आसपास से गुजर रहे ट्रैफिक को भ्रमित करते हुए मंजिल तक पहुंच जाएगा। ( कंजूस के आगे हर कोई हारा )
जवाहर चौधरी : सोचता हुआ आदमी अक्सर खामोशी अख्तियार कर लेता है। अपना देवीलाल याद है... जिसने पिछले साल आत्महत्या कर ली थी... लेकिन किसी के चाहने भर से क्या होता है भले ही वह कोई आयोग फायोग ही क्यों ना हो। सभाएं और भोंगे बंद हो जाते हैं लेकिन टीवी चालू रहता है, और आप जानते हैं कि अपने आगे वह किसी को सोचने कहां देता है, एंकर का जलवा इतना कि वह चुनाव आयोग के सर पर भी चीखती रहती है। नतीजा यह कि न वोटर सोच पाता है नहीं आयोग। लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट है कि जनता को कोई भी सोचने नहीं देता है। ( चिकना सोचो, चिकना बोलो, चिकना लिखो )
ब्रजेश कानूनगो : जब समय सूचक घड़ियां नहीं होती थी, तब मुर्गियों से ज्यादा मुर्गे का महत्व हुआ करता था। उसकी आवाज उसी तरह सुनी जाने की परंपरा रही है जैसे आज लाल किले की प्राचीर से हम भारतीय प्रधानमंत्री को सुनते हैं। किसी ऊंचे टीले पर चढ़कर लाल कलगी वाला मुर्गा रात भर सूरज के निकलने की टोह लिया करता था। जब उसे आभास होता कि बस अब उजाला होने को ही है, वह तुरंत जोरदार बांग लगा देता ताकि सब जाग जाएं। (महंगाई का मुर्गा और पॉपकॉर्न)
अख्तर अली : चमचे खड़े भी होते हैं तो ऐसा लगता है कि सजदे में हैं। ये भैया से जाने की अनुमति भी ऐसे मांगते हैं मानों अल्लाह से दुआ मांग रहे हों। ( चमाचम चमकते चमचे )
मुकेश नेमा : मर्तबान तभी खास होता है जब वह लोगों की पहुंच से दूर हो। ऊंचे ताक पर रखा हो। वहीं वर्तमान इज्जत पाता है जिस तक समझदार लंबे हाथ पहुंच सके और आजकल उन्हीं हाथों को समझदार माना जाता है जो वाया चमचा ही मर्तबान तक पहुंचने का कायदा जानते हैं। चमचों को राजी कर लेना ही घी तक पहुंच पाना है। (चमचा संस्कृति)
प्रभा शंकर उपाध्याय : कुशल यस मैन कभी नुकसान में नहीं रहता। वह अपने सरपरस्त का मूड देखता है और उसके अनुरूप व्यवहार करता है। सदा प्रिय वचन बोलने वाला, हवा का रुख देख अपनी छतरी सेट करने वाला, यस मैन हमेशा मजे में रहता है। आदर्श यस मैन का स्वर होता है, मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा। (फिर तेरे हाथ में सोने के निवाले होंगे)
अर्चना चतुर्वेदी : प्रभु , आपने प्रकृति बनाई, पेड़ पौधे बनाए, रंग बिरंगे फूल फल बनाए, सुंदर पक्षी, जानवर, तितलियां, नदियां, झरने….. सच में आप की बनाई दुनिया तो बहुत ही खूबसूरत और नयनाभिराम है.... नयनाभिराम और खूबसूरत बस तभी तक है जब तक हमने मनुष्य नहीं बनाया था, पार्वतीजी बोलीं । ( आत्मघाती मानव जाति)
राजेंद्र वर्मा : चमचे का विनियोजित व्यवहार सत्ता की चादर का ताना है तो उसके दैनंदिनी कार्यकलाप उसका बाना। इसलिए चमचे के बिना सत्ता के ताने-बाने की कल्पना नहीं की जा सकती। सत्ता नहीं तो लोककल्याण नहीं। अतः लोक कल्याण के लिए चमचे का होना परम आवश्यक है। (च से चमचा )
बुलाकी शर्मा : चमचागिरी करना खाला का घर नहीं है। बहुत रिस्की कला है या इसके लिए चतुराई और काइयांपन का होना बहुत आवश्यक है। सामने वाले को इसका अहसास ही नहीं होना चाहिए कि आप उसकी चमचागिरी कर रहे हैं वरन यह लगना चाहिए कि आप समर्पित भाव से उसके अनुयाई हैं और सच्चे मन से उसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा करते रहे हैं। ( चमचागीरी और चाणक्य नीति )
प्रभात गोस्वामी : सीमेंट के बने पुल की ढहने या दरारें पड़ने की संभावनाएं बनी रहती हैं लेकिन जीभ से बांधे जाने वाले तारीफ के पुल चट्टानों से भी ज्यादा मजबूत होते हैं, ऐसा चमचा मंडली का दावा है। (चमचों की जीभ पर सवार अफसरान )
सुनील जैन राही : केबिन में ठंड बढ़ जाती है तब गरम मुद्दे की बात होती है। मुद्दा अभी बार में था। बार जहां मुवक्किल नहीं जा सकता। बार में वे ही जाते हैं जिनके पास मुद्दे को ठंडा करने की बर्फ होती है। (फैसला बार में होगा)
डा पंकज साहा : हिंदी आलोचना को गड्ढे में गिराने में चमचों की बहुत बड़ी भूमिका है। बेचारे आलोचक महोदय अपने चमचों को जितना ऊपर उठाते हैं,उतना ही वे नीचे गिरते जाते हैं। (चम्मच महिमा )
डा प्रदीप उपाध्याय : चमचा सर्वगुण संपन्न होता है। अपने नाम के अनुरूप चरितार्थ होता है। वक्त और हालात के हिसाब से वह अपने को बदल लेता है। (अगले जनम मोहे चमचा ही कीजै)
सुनीता सानू : चमचा कुछ करे न करे,गुणगान इतना कर देता है कि पतीली के भीतर क्या पक रहा है,जग जाहिर कर सकता है। ( सभ्यता के प्रतीक चमचे)
मुकेश राठौर : विधायक जी उनतीस फरवरी की तरह हर चौथे साल अपने इलाके में आधे बुलावे पर हर छोटे बड़े कार्यक्रमों में पहुंचते। नाले में पानी हो तो जुगाड की नाव में बैठकर, गांव में बिजली न हो तो टॉर्च जलाकर,गलियों में कीचड़ हो तो पजामा खोसकर, जूते हाथ में उठाकर...लेकिन आते जरूर। (गुमशुदा माननीय की तलाश)
हनुमान मुक्त : यदि हड्डियों पर चिपके मांस को चूसना है तो आपको भेड़िए का चमचा बनना होगा। (चमचे पर शोध)
अनूप शुक्ल : मार्क्सवादी आदमी रिपेयर होकर आया तो उसके दिमाग से दास कैपिटल गायब हो गई उसकी जगह एक के बदले चार फ्री तथा सीमित आफर,जल्दी करें की तमाम स्कीमें भर गई हैं। (आदमी रिपेयर सेंटर)
वीना सिंह : लोकतंत्र है तो सरकार है। सरकार है तो विपक्ष है। विपक्ष है तो असहमति है।असहमति है तो विवाद है। विवाद है तो विरोध है। धरना,प्रदर्शन है,रैली है। रैली चमचों की भीड़ से ही बनती है। (चमचे हैं तो रैली है)
कुछ व्यंग्यकारों की रचनाओं से मैं उद्धरण नही चुन पाया क्योंकि कुछ पंक्तियों से बात बन नही पाती क्योंकि उनके कहन में विस्तार है। पैराग्राफ बड़े होते हैं लेकिन समग्रता से प्रभावित करते हैं।
बहरहाल, सभी शामिल रचनाकारों और संपादक सुश्री वीना सिंह को हार्दिक बधाई। निश्चित ही यह संग्रह पाठकों द्वारा खूब पढ़ा जाएगा।
(व्यंग्य संग्रह : भांति भांति के चमचे, संपादक : वीना सिंह, प्रकाशक : शोपिजेन,अहमदाबाद, मूल्य : 245 रुपए। )
ब्रजेश कानूनगो